इस कहानी मुंबई के डॉन Manya Surve से जुडी है। पहली ये की मुंबई का नाम पहले बॉम्बे था। लोग कहते है कि बॉम्बे में पहले भी भी एनकाउंटर हुआ था मगर ऑफिसियल में ये पहला एनकाउंटर था। दूसरी ये कि ये कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड से भी जुड़ी हुई है। जब हम अंडरवर्ल्ड कि बात करते है तो आजकल लोग दाऊद इब्राहिम का ही नाम लेते है। लेकिन जब मुंबई में डॉन नाम चला था ये जब कि बात है। लोग कहते है कि Haji Mastan मुंबई का पहला डॉन है। बहुत से लोग Karim Lala, वरदा राजन का नाम लेते है। लेकिन हकीकत में अगर पुरे इतिहास को देखा जाये तो हिस्दुस्तान में डॉन शब्द जो शख्स लेकर आया वो Karim Lala था। करीम लाला को शेरखान के नाम से भी जाना जाता है। करीम लाला मुंबई का ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान का भी पहला डॉन था। जबकि करीम लाला का हिंदुस्तान से कोई लेना देना नहीं था वो तो अफगानिस्तान में पैदा हुआ था।

करीम लाला अफगानिस्तान में रईस घराने में पैदा हुआ था।लेकिन 1940 के आस पास पेशावर को होते हुए कारोबार करने के लिए मुंबई आ गया था। लेकिन वो कम वक्त में ज्यादा पैसे कमाना चाहता था। धीरे-धीरे उसमे मुंबई में अपना कारोबार शुरू कर दिया लेकिन कारोबार कि आड़ में उसने 2 नंबर का  धंदा भी शुरू कर दिया जिससे जी उसे ज्यादा आमदनी हो। जिसमे वो हीरे, सोने कि स्मगलिंग कर रहा था। इस धंदे स उसे काफी पैसा मिला इसलिए उसने शराब, जुआ वगैरह का धंदा भी शुरू कर दिया । उस का वो कारोबार भी चल पड़ा।

इस दौरान मुंबई में एक और शख्स था जिसका नाम हाजी मस्तान था। वो भी इस तसकरी के कारोबार में अपना हाथ आजमाना चाह रहा था। लेकिन हाजी मस्तान को पता था कि यहाँ करीम लाला का काफी दबदबा है। उस वक्त अंडरवर्ल्ड में खून खराबा कम हुआ करता था। इस लिए हाजी मस्तान ने सोचा क्यों न आपस में मिल कर काम किया जाये। इसके बाद उसने करीम लाला से दोस्ती कर ली और अपना अपना इलाका बाँट लिया।

इस बीच एक तीसरा नाम भी था वरदा राजन जो साउथ से मुंबई आया था। वो भी इस तरह के कारोबार में शामिल था। वरदा राजन को भी लगा कि वो इन सब से लड़ाई मोल लेकर कारोबार नहीं कर सकता । इसलिए उसने भी करीम लाला से हाथ मिलाया और अब ये सभी तीन इलाको में अपना अपना काम कर रहे थे।

लेकिन इन तीनो में करीम लाला सबसे ज्यादा दबदबा था। ये सब चलता रहा और करीम लाला ज्यादा ताकतवर होता चला गया। करीम लाला का बॉलीवुड में भी काफी दबदबा था। जंजीर फिल्म में प्राण ने शेरखान का जो रोल किया था वो किसी हद तक करीम लाला का ही रोल था। एक बार किसी ने हैलना के पैसे देने से मना कर दिया था, तब दिलीप कुमार ने एक खत करीम लाला को लिखा था जो हैलना लेकर गयी थी। उसके बाद करीम लाला के जरिये हैलना के पैसे वापस मिल गए।

एक बात ये भी है, कि Karim Lala ने किसी घर पर कब्ज़ा किया था जिसके बाद उसे अदालत से समन आ गए थे। इसके बाद जब करीम लाला को कोर्ट में पेश किया गया तो जब वो कोर्ट पहुंचा तो उस वक्त कोर्ट की जज एक महिला थी। उस वक्त जितने भी लोग अदालत में बैठे हुए थे यहाँ तक कि वकील भी करीम लाला को देखकर खड़े हो गए। उसके बाद जज ने करीम लाला को विटनेस बॉक्स में बुलाया। जज का पहला सवाल ये था कि आप कौन है। करीम लाला ने जज कि तरफ देखा और कहा ये काला कोर्ट पहने हुए ये महिला कौन  है जो उसे नहीं जानती। इस पर सभी लोग जो वहां मौजूद थे हंस पड़े।

लेकिन इन तीनो (करीम लाला, हाजी मस्तान,वरदा राजन ) के बाद 80 के दसक में एक शख्स की एंट्री होती है जो अंडरवर्ल्ड का डॉन बनने जा रहा था। जिसका नाम शाबिर कास्कर था। ये दाऊद इब्राहिम का बड़ा भाई था। लेकिन अब वक्त बदल चुका था। जैसे पहले सभी इलाको को बाँट कर काम किया करते थे। शाबिर कास्कर ऐसा नहीं था। वो ये मानता था की अगर हमें आगे निकलना निकलना है तो हमें इन सबसे लड़ कर निकलना होगा। हालाँकि हाजी मस्तान ने बीच में इनकी सुलह कराने की कोशिस की थी। लेकिन करीम लाला का जो गैंग था वो पठान गैंग के नाम से मशहूर था। मुंबई में एक तरह से पठान गैंग का ही राज था। लेकिन उस वक्त इतना खून ख़राबा नहीं था। मगर 80 के दशक में जब शाबिर कास्कर की एंट्री होती है, तो फिर गैंग वॉर शुरू हो जाती है। फिर वे एक दूसरे के लोगो को मारने लगते है। एक वक्त ऐसा आया करीम लाला को लगा की ये ऐसे नहीं मानेंगे । करीम लाला ने एक बार दाऊद इब्राहिम को अगवा कराकर बहुत मार दी थी।

उसके बाद इनकी दुश्मनी चलती रही। अब पठान गैंग और कास्कर Family में लड़ाई चलती रही। दाऊद उस वक्त पुरे मुंबई का डॉन बनना चाहता था। हाजी मस्तान ने एक बार इनकी आपस में सुलह भी करा दी थी। मगर पठान गैंग दाऊद बढ़ते दबदबे से खुश नहीं था और वो दाऊद को सबक सीखना चाहता था।

इसी दौरान एक चौथे चेहरे की एंट्री होती है। जिसका नाम मनोहर अर्जुन सुर्वे था जो महाराष्ट्र के रत्नागिरी में पैदा हुआ था। वो मुंबई में अपने ताऊ के पास रहता है। उसने B.A में एडमिशन लिया हुआ था। जो मुंबई के कॉलेज में पढ़ रहा था और उसने 75 % के साथ B.A पास किया था। लेकिन उसका एक सौतेला भाई जो क्राइम की दुनिया से ताल्लुक रखता था तो मनोहर अर्जुन सुर्वे भी धीरे-धीरे क्राइम के रास्ते पर चल पड़ा। इसी दौरान वो अपने सौतेले भाई के साथ मिल कर कही पर लड़ाई कर लेता है। जिससे वहाँ पर एक शख्स की मौत हो जाती है। उसके क़त्ल के जुर्म में पुलिस मनोहर और उसके भाई को गिरफ्तार कर लेती है। अदालत इस जुर्म में इनको उम्र कैद की सजा सुना देती है। उस वक्त उम्र कैद की सजा 14 साल की हुआ करती थी। इन लोगो को मुंबई की जेल में नहीं रखा जाता बल्कि  पुणे की ‘Yerawada Central Jail’ में रखा जाता है।

लेकिन उस जेल में और भी गैंग थी जिसकी वजह से से मनोहर की वहाँ पर मार पीट हो जाती है, और इनको वहाँ से निकाल कर रत्नागिरी जेल में भेज दिया जाता है। 9 साल जेल में बिताने के बाद एक बार मनोहर अर्जुन सुर्वे को वहाँ से भागने का मौका मिल जाता है, और वो वहाँ से भाग निकलता है। जेल से भागने के बाद वो सीधे मुंबई पहुँच जाता है । अब वो मुंबई में अपना गैंग बनाना चाहता है। वो दाऊद की गैंग में शामिल होना चाहता था मगर उसे शामिल नहीं किया गया। यही जवाब उसे पठान गैंग की तरफ से मिला। मगर ये छोटी-छोटी वारदात करता रहा और ये कुछ लोगो को मार भी देता है। बैंक में चोरी, यहाँ तक के सरकारी खजाने को भी नहीं छोड़ता। अब मनोहर सुर्वे का नाम होने लगा। अब उसके दोस्त उसे मानिया सुर्वे के नाम से बुलाने लगे और उसका नाम मानिया सुर्वे ही पड़ गया। Manya Surve के किस्से जब पठान गैंग तक पहुंचते है तो पठान गैंग उस वक्त दाऊद से समझौता तो कर चुकी थी। मगर वो दाऊद को सबक सिखाना चाहती थी। पठान गैंग सोचती है कि हाजी मस्तान से हमारा वादा हो चुका है तो क्यों न किसी नए बन्दे को काम शोम्पा जाये जो दाऊद के बड़े भाई शब्बीर कास्कर को ठिकाने लगा सके। इसके बाद मानिया सुर्वे को शब्बीर कास्कर को मारने की सुपारी दे दी गयी। Manya Surve अंडरवर्ल्ड में अपनी पहचान बनाने के लिए फौरन तैयार हो जाता है, और वो दाऊद के भाई की सुपारी ले लेता है।

शब्बीर कास्कर मुंबई में एक सिद्धि विनायक मंदिर के पास जाया करता था और वो कभी-कभी पास के ही पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाया करता था। इसी के बाद 12 फरवरी 1981 को मानिया सुर्वे अपने आदमी को लेकर उस पेट्रोल पंप पर चला जाता है, और वहाँ पर शब्बीर कास्कर का इंतजार करता है। कुछ देर बाद शब्बीर कास्कर वहाँ पर आ जाता है। तभी Manya Surve और उसके आदमी शब्बीर को घेर लेते है और उस पर अँधा धुंद फायरिंग शुरू कर देते है। शब्बीर कास्कर कि वही पर मौत हो जाती है। सुबह में ये खबर पुरे मुंबई में आग कि तरह फेल जाती है।

जाहिर सी बात है कि दाऊद का पहला शक पठान गैंग पर ही जाता है, इस पर पठान गैंग भी घबरा जाता है। मगर धीरे-धीरे पता चलता है कि ये काम मानिया सुर्वे नाम के किसी नए आदमी ने किया है। अब यहाँ से मानिया और दाऊद कि दुश्मनी शुरू हो जाती है। लेकिन मानिया इसके बाद काफी हावी हो चुका था और उसका कद बढ़ चुका था। अब उसने पुलिस वालो पर भी हमला करना शुरू कर दिया और उसने अपना अलग गैंग बना लिया। इस गैंग ने अब उन दोनों Gango को पीछे छोड़ना शुरू कर दिया। अब इन दोनों Gango को लगा कि अब उनकी जमीन कम होती जा रही है। मानिया ने ज्यादा ही खून ख़राब शुरू कर दिया था। जिस वजह से मुंबई पुलिस भी परेशान आ गयी थी।

इससे पहले पुलिस 80-81 दशक के बीच दाऊद और पठान गैंग के बीच होने वाले खून खराबे से भी परेशान थी। अब Manya Surve ने भी जगह ले ली थी। अब पुलिस तीन तरफ से घिर चुकी थी। इन सब से बचने के लिए पुलिस ने कड़े कदम उठाए और सभी गैंग के पास अपना सन्देश भेज दिया।

सबसे पहले Manya Surve को ठिकाने लगाने कि प्लानिंग बनाई गयी। इसके बाद एक स्पेशल टीम तैयार कि गयी। इस टीम को लीड करने वाल Isaque Bagwan थे। प्लानिंग ये थी कि मानिया का एनकाउंटर किया जाये। इसके बाद मानिया सुर्वे के लोगो को उठाना शुरू कर दिया गया और कुछ को मारा भी गया। लेकिन मानिया सुर्वे गायब हो गया और वो मुंबई छोड़ कर भाग गया। बाद में मानिया मुंबई में आया मगर अलग अलग जगह पर रहने लगा।

खतरनाक इतना था कि अगर उसको पता चल जाता था कि उस पर हमला होने वाला है तो वो पुलिस वालो पर भी हमला कर देता था। लेकिन दाऊद के भाई के क़त्ल को लगभग एक साल बीत चुका था। Manya Surve के काफी लोग पकडे गए। लेकिन मानिया का कोई सुराग नहीं मिल रहा था। दाऊद अपने भाई का बदला लेने के लिए बेताब था। उसे सबूत के साथ पता चल गया था कि उसके भाई को मारने वाला मानिया है और मरवाने वाला पठान गैंग है। इसी बीच दाऊद और पठान गैंग के बीच मुठभेड़ भी हुई  जिसमे दर्जनों लोग मारे गए। जिन लोगो पर भी दाऊद को शक था वो एक-एक  करके सब को मारता गया। लेकिन मानिया उसके हाथ नहीं लग रहा था। लोग ये भी कहते है कि उस वक्त दाऊद कि मुंबई पुलिस में काफी अच्छी जान पहचान थी। पठान गैंग का दबदबा बढ़ रहा था और पुलिस इस दबदबे को काम करना चाहती थी। यहाँ पर एक खेल शुरू होता है। मुंबई पुलिस दाऊद के जरिये पठान गैंग को ख़तम करना चाहती थी। इसी लिए पुलिस ने दाऊद कि गैंग को प्रमोट करना शुरू कर दिया। यही पर पुलिस ने गलती कि थी।पठान गैंग का तो धीरे-धीरे खात्मा हो गया मगर दाऊद अब पुलिस के लिए सर दर्द बन चुका था।

अब क्योंकि दाऊद कि मुंबई पुलिस में अच्छी पकड़ थी और दाऊद को किसी भी कीमत पर Manya Surve चाइये था। इसी बीच दाऊद के एक मुखबिर ने 11 जनवरी 1982 मुंबई पुलिस को एक खबर दी कि आज मानिया सुर्वे दोपहर 1:30 बजे वाडला एरिया में अम्बेडकर जक्सन के पास एक कार से आयगा और वो वह पर अपनी गर्ल फ्रेंड को लेने आ रहा है उसे लेकर वो चला जायगा। उसकी गर्ल फ्रेंड एक ब्यूटी पॉर्लर में काम करती है। पुलिस को मानिया कि गर्ल फ्रेंड का तो पता था मगर ये नहीं पता था कि वो कौन है।

Manya Surve की मौत-

खबर मिलते ही क्राइम ब्रांच की पुरी टीम तीन हिस्सों में वह पर फेल जाती है और वक्त का इंतजार करती है। करीब 1:30 बजे के करीब मानिया सुर्वे वहाँ पर आता है। चूँकि पुलिस के पास उसकी तस्वीर मौजूद थी तो पुलिस उसे देखते ही पहचान लेती है। मगर Manya Surve पुलिस वालो को सादी वर्दी में देखकर फौरन पहचान लेता है कि ये उसी के लिए आई है। इससे पहले कि वो अपना रिवाल्वर निकलता Isaque Bagwan और उसके आदमी उस पर गोली चला देते है।  उसके सीने पर 5 गोली लगती है और एक गले पर लगती है। मानिया वही पर ढेर हो जाता है। पुलिस उसको उठाकर वैन में डाल लेती है।

वही पर 12 मिनट कि दूरी पर एक हॉस्पिटल था।मगर पुलिस वह तक पहुंचने में 30 मिनट लगा देती है। शायद पुलिस भी नहीं चाहती थी कि मानिया कि हॉस्पिटल में जाकर जान बच जाये । मानिया कि हॉस्पिटल पहुंचने से पहले मौत हो जाती है। मानिया सुर्वे कि मौत से सबसे ज्यादा फायदा दाऊद को हुआ । क्योंकि दाऊद को लग रहा थी कि कही मानिया आगे चल कर उसके लिए कोई मुशीबत न बन जाये।

अब मानिया कि मौत के बाद पठान गैंग और दाऊद कि गैंग में खून ख़राब बढ़ चुका था और यही से दाऊद का कद बढ़ने लगा क्योंकि दाऊद एक-एक करके पठान गैंग के आदमी को मरने लगा। हाजी मस्तान बीच में आया मगर दाऊद ने उसकी भी न सुनी अब हाजी मस्तान भी इससे दूर हो गया। करीम लाला कि उम्र करीब 70 साल कि हो गयी थी। अब करीम के भाई ही सब सम्भाल रहे थे। दाऊद ने अपने भाई का बदला लेने के लिए करीम लाला के छोटे भाई को भी मार दिया। अब इनमे दुश्मनी तेज़ हो गयी थी और खून ख़राबा बढ़ चुका था। करीब 90 साल कि उम्र में सन 2002 में करीम लाला कि मौत हो गयी। दाऊद इब्राहिम 1993 में इंडिया को छोड़  कर भाग गया था अब उसका सही से कुछ पता नहीं है।

3 Replies to “Manya Surve जिससे Dawood भी डरता था, भारत का पहला Encounter

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