ये इसरायली ख़ुफ़िया एजेंसी Mossad के Operation Diamond की एक कहानी है। यह कहानी 1960 की है। रूस एक ऐसा लड़ाकू विमान बनाने में लगा हुआ था। जिसकी दुनिया में कोई मिशाल ना हो। इसी कोशिश में 1956 में आखिरकार रूस एक फाइटर प्लेन बनाने में कामयाब हो गया। जो फाइटर प्लेन रूस ने बनाया वह MIG-21 था।

जब MIG-21 आसमान में उड़ान भरी तो दुनिया उस पर रश करने लगी। धीरे-धीरे इसकी खासियत सबके सामने आने लगी। रूस की अमेरिका और पश्चिमी देशों से दुश्मनी थी।

रूस ने प्लेन बनाने के बाद अपने दोस्त मुल्कों को बेचना भी शुरू कर दिया। इसने अरब के देशों और एशिया के कई देशों को मिग-21 बेंचा। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों को नहीं बेंचा। तब तक अमेरिका और इजराइल को भी इस प्लेन के बारे में पता चलना शुरू हो गया। वह कमाल का फाइटर प्लेन है। वे चाहते थे कि इस प्लेन को देखा जाए कि ये इतना खतरनाक क्यों है।

रूस ने जिन देशों को मिग-21 बेंचा था। उनके साथ एक एग्रीमेंट किया था। तुम पश्चिमी देशों को मिग-21 नहीं दोगे और ना ही उनके रक्षा के किसी भी आदमी को मिग-21 के बारे में कुछ बताओगे।

क्योंकि वह सभी देश रूस के दोस्त थे। उन्होंने भी इस बात का पालन किया और इस फाइटर प्लेन के बारे में किसी भी पश्चिमी देशों को कुछ भी नहीं बताया।

उधर पश्चिमी देशों को इस बात की चिंता थी। इसमें उनके बारे में कैसे पता किया जाए। इसके काट कैसे बनाई जाए लेकिन उसके लिए मिग-21 तक पहुंचना उसको उड़ाना यह नामुमकिन था।

इसी दौरान में इजराइल की जो खुफिया एजेंसी मोसाद है। उसके लीडर को चेंज करने का वक्त आ गया था। इन्होंने भी अपने वक्त में काफी कोशिश की थी कि मिग-21 को किसी तरह से हासिल किया जा सके। चाहे किसी तरीके से भी हासिल किया जाए। वह कानूनी हो या गैरकानूनी हो।

उनकी जगह नए चीफ Meir Amit को बनाया गया। Meir Amit इजराइल की फ़ौज में थे। उनकी काबिलियत को देखते हुए मोसाद का चीफ बनाया गया। उनकी इजराइल के आर्मी चीफ से मुलाकात चल रही थी। पता किया जा रहा था कि तुम्हें किस किस चीज की जरूरत है।

इसी दौरान मोसाद के चीफ की मुलाकात इजरायली एयर फोर्स के चीफ से होती है। बातचीत करने के बाद जब वह चलने के लिए रुखसत होते हैं। तभी इजराइल के मोसाद के चीफ कहते हैं। अगर कोई भी मेरे लिए काम हो तो जरूर बताइए। वो कहते है की हमें MIG-21 लाकर दे दो।

जब मोसाद के चीफ ने यह सुना तो वह वहीं पर रुक गए और उन्होंने सोचा कि इन्होंने यह क्या मांग लिया कि जो नामुमकिन है। इसके बाद वह मुस्कुराए क्योंकि उन्हें पता था कि मोसाद के पहले चीफ ने काफी कोशिश की थी मिग-21 को लाने के लिए।

मोसाद के चीफ ने एयरफोर्स के चीफ से पूछा कि तुम सीरियस हो तो एयरफोर्स के चीफ ने कहा कि हां मैं सीरियस हूं। अगर हो सके तो तुम MIG-21 लाकर दे दो। उसके लिए मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूं।

अब मोसाद के चीफ ने इस बात को अपने दिल पर ले लिया। उन्होंने तय कर लिया कि मुझे अब एक मिग-21 को इजराइल की सर जमीन पर लैंड कराना ही है। अब वह कैसे होगा या आगे की बात है। इसके बाद वह प्लानिंग शुरू कर देते हैं। वह अपने खास आदमी को इकट्ठा करते हैं और कहते हैं मुझे किसी कीमत पर भी मिग-21 चाहिए।

तमाम बातें सोचने के बाद मोसाद के चीफ ने तय कि किसी तरीके से जिन देशों को भी उसने मिग-21 भेजा है। उस मिग-21 के पायलट के साथ सेटिंग की जाए और उससे कहा जाए कि तुम मिग-21 को इजरायल की सर जमीन पर लेकर आओ और यह एक ही सूरत में मुमकिन था कि पायलट देश से गद्दारी करें।

या फिर पायलट पर किसी और तरीके से दबाव बनाया जाए। इसी थ्योरी पर मोसाद के चीफ काम करना शुरू कर देते हैं। उन्होंने सोचा कि अरब के जिन देशों के पास मिग-21 है। उनके साथ गैरकानूनी तरीके से कोई सौदा किया जाए।

उस वक्त इजरायल के एक मशहूर जासूस थे जिनका नाम Jean Thomas था। Jean Thomas को यह काम दे दिया गया। कि वह मिस्र जाए क्योंकि मिस्र के पास भी एक मिग-21 है। वहां जाकर वह किसी तरीके से किसी पायलट से कोई डील करें और एक मिग-21 इजराइल लेकर आ जाए।

Jean Thomas मिस्र पहुंच जाते हैं। वहां पहुंचकर काफी वक्त गुजारते हैं। करीब 1 साल बीत जाता है। इसी दौरान वे मिग-21 के एक पायलट से दोस्ती भी कर लेते हैं। आखिर में उसका भरोसा जीतने के बाद उसको यह डील बताते हैं। उसको एक मिलियन अमेरिकी डॉलर का तोहफा देते हैं। साथ में उसको सुरक्षा की भी बात बताते हैं।

शर्त यह थी कि वह मिस्र से MIG-21 को उड़ा कर इजराइल में ले आए। जीन थॉमस यहां पर मार खा गए। वह जिस पायलट के साथ डील कर रहे थे। उन्हें लगा कि यह मेरे चंगुल में आ चुका है और यह काम कर देगा। उस पायलट ने मिस्र के साथ गद्दारी करने की सोची ही नहीं थी।

उसने यह बात सुनते ही कि इजरायल का एक आदमी उसको यह ऑफर दे रहा है। उसने यह सारी बात अपने सीनियर ऑफिसर को बता दी । जैसे ही सीनियर अफसरों को इस बात का पता चला तभी फौरन जीन थॉमस और उसके परिवार को मिस्र में गिरफ्तार कर लिया गया।

उस पर मुकदमा चलाया गया। 1962 में Jean Thomas को फांसी दे दी गई। और Jean Thomas के पिता और उसके परिवार को एक लंबी सजा दी गई। जिसके बाद उनको रिहा कर दिया गया।

पर मोसाद के चीफ Meir Amit ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कहा कि हमारी कोशिश जारी रहेगी। अब इसके बाद इन्होंने मिश्री के बाद इराक का रुख किया। क्योंकि उन्हें लगा कि इराक के पायलट उनके शिकंजे में आसानी से आ जाएंगे।

मोसाद के जासूसों ने इराक के अंदर काफी मेहनत की और इराक के दो ऐसे पायलट को पकड़ा उनके साथ दोस्ती की और उनको अगवा भी किया गया। सब कुछ करने के बाद उनको भी बड़ा ऑफर दिया गया। उन्हें भी यही कहा गया कि MIG-21 पहुंचाना है।

लेकिन वह दोनों पायलट आखिरी वक्त में डर गए। उन्हें लगा की जान खतरे में है और काम नहीं हो पाएगा। जब मोसाद के जासूसों को लगा कि यह भी हमारी मेहनत पर पानी फेर देंगे। आगे किसी भी देश के पायलट से हम डील नहीं कर सकेंगे। उन्होंने इस खतरे को देखते हुए इराक के उन दोनों पायलट को मार डाला। अब लगा कि यह काम नहीं हो पाएगा और मोसाद के चीफ Meir Amit इस काम को लेकर आगे बढ़ते रहे।

1964 में कुछ ऐसा हुआ कि लगा कि शायद यह काम हो जाएगा। ईरान के अंदर तेहरान जो ईरान की राजधानी है। वहां पर इजराइली दूतावास में एक कर्मचारी काम किया करता था जो यहूदी था। वह कर्मचारी इजराइल के लिए कुछ काम करना चाहता था।

उसी की एक गर्लफ्रेंड थी। उसकी गर्लफ्रेंड की दोस्त कि जिससे शादी हुई वह एक ईसाई था। जिसका नाम मुनीर रेड्फा था। वह इराक की एयरफोर्स में काम किया करता था। यह बात उस कर्मचारी ने अपने एक सीनियर अफसर को बताइ। यह बात इजराइली दूतावास के जरिए मोसाद तक पहुंच गई।

अब मोसाद को लगा कि शायद उनका काम हो जाएगा। सबसे मजे की बात यह थी। वह जो Munir Redfa इराक की एयर फोर्स में काम किया करता था। वह मिग-21 भी उड़ाता था। Munir Redfa इराक की एयर फोर्स के कैप्टन मैं से एक था।

मगर Munir Redfa इराक की एयर फोर्स से नाराज चल रहा था। उसकी वजह यह थी उसका यह कहना था कि वह एक काबिल कैप्टन है। मगर उसको ईसाई होने की वजह से वह जगह नहीं दी जाती जो और कैप्टन को दी जाती है।

इसका पता मोसाद को चल गया था। वह इस बात का पूरा फायदा उठाना चाहती थी। इसके बाद मोसाद ने अमेरिका से अपनी एक एजेंट को टूरिस्ट वीजा पर इराक में भेज दिया। उस वक्त इराक और अमेरिका में अच्छे रिश्ते थे।

उस इजराइल की जासूस ने Munir Redfa से दोस्ती बढ़ाई। धीरे-धीरे उसके करीब पहुंच गई। यहां तक कि उसके साथ घूमने के लिए कई विदेश दौरों पर भी गई। जब उसको लगा कि यह मेरी बातों में आ चुका है।

उसने मोसाद को खबर पहुंचा दी कि यह मेरी बातों में पूरी तरीके से यकीन करता है। अब मौका है कि उसको डील के लिए कहा जाए। मोसाद ने कहा कि इस बार कोई चूक नहीं होनी चाहिए। इसलिए पहले ही एक बार उसको टटोल लिया जाए। इसके बाद उसको यह ऑफर दिया जाए।

क्योंकि मोसाद को उसकी हर बात का पता चल चुका था। उस जासूस ने Munir Redfa से इस बात का फायदा उठाते हुए। उसके कान भरने शुरू कर दिए। मौका देख कर उसके सामने इस ऑफर की पेशकश रख दी। Munir Redfa ने इस ऑफर को कुबूल कर लिया। पर उसकी एक शर्त थी कि उसके पूरे परिवार को यहां तक कि उसके मां-बाप को भी सही सलामत यहां से निकाला जाए।

मोसाद ने मुनीर रेड्फा के सामने जो ऑफर रखी थी। वह यह थी कि उसको एक मिलियन अमेरिकी डॉलर दिए जाएंगे। उसको इजराइल की नागरिकता भी दी जाएगी। इसके बाद मुनीर रेड्फा ने मोसाद के प्लान के मुताबिक काम करना शुरू कर दिया।

मगर एक दिक्कत थी मुनीर रेड्फा के पूरे परिवार को एक साथ इराक से निकालना मुश्किल था। इससे इराक की एजेंसी को उस पर शक हो जाता और वह पकड़ा जाता।

इसके लिए मोसाद ने एक प्लान तैयार किया। उसने मुनीर रेड्फा के मां-बाप को बीमार का बहाना बनाकर इराक में ही कई मेडिकल टेस्ट कराएं और यह साबित कर दिया कि इनकी तबीयत ज्यादा खराब है। इनको विदेश के किसी हॉस्पिटल में ले जाना पड़ेगा।

इस बहाने से वे मुनीर रेड्फा के मां-बाप को इराक से निकाल कर ले गए। इसके बाद मुनीर रेड्फा के बीवी और बच्चे को टूरिस्ट वीजा पर इराक से निकाल दिया गया। यह काम कुछ समय-समय के बाद हुआ।

अब मुनीर रेड्फा अकेला इराक में बचा था। उसको MIG-21 इजराइल लेकर जाना था। इसमें एक परेशानी थी। इराक और इजरायल के बीच में कई और देशों की सरहद पड़ती है। जिसमें सीरिया, जॉर्डन वगैरह भी शामिल है।

यह रास्ता काफी लंबा था। जब रूस ने मिग-21 एक को बेचा था। उसमें एक शर्त यह भी थी कि इस फाइटर प्लेन में एक हद तक ही तेल भरा जाएगा। वह तेल इतना था कि उस तेल के जरिए इराक से इजराइल तक का सफर करना नामुमकिन था।

बीच में किसी दूसरे देश में उतर कर तेल भरवाने भी नामुमकिन था। इसके लिए मोसाद ने एक चाल चली। उसमें यह था की  मुनीर रेड्फा कभी-कभी इराक के जो तेल भरने वाले कर्मचारी थे। उनको पहले भी बहका बहका चुका था। कि तुम रूस के कहने पर चलते हो। जबकि यह फाइटर प्लेन अब हमारे हैं। तुम इसमें तेल पूरा क्यों नहीं भरते।

जाहिर सी बात है, इस जोश में आकर कभी-कभी मुनीर रेड्फा के फाइटर प्लेन में थोड़ा तेल ज्यादा भर दिया करते थे। इसी का फायदा उठाते हुए 16 August, 1966 को जिस दिन मुनीर रेड्फा का प्लेन उड़ाने का नंबर था। उसने यही मौका देखा और उसने उस दिन भी तेल भरने वाले कर्मचारियों से MIG-21 के टैंक को फुल करने की फरमाइश की।

उसने कहा की तुम कितने डरपोक हो जो रूस की बातों में आते हो।  दूसरे देश की बात का कहना मानते हो। इस बात से गुस्सा होकर इराक के तेल भरने वाले कर्मचारियों ने उसके टैंक को फुल कर दिया।

अब वह MIG-21 लेकर उड़ चुका था। क्योंकि जब भी कोई कैप्टन ट्रेनिंग में होता है। उसको एक रूट दिया जाता है। अगर वह उस रूट से भटकता है, तो उसको वार्निंग दी जाती है, कि वह अपने रूट पर आए नहीं तो उसके हवाई जहाज को उड़ा दिया जाएगा।

जब मुनीर रेड्फा फाइटर प्लेन लेकर उड़ा। उड़ने के बाद वह अपने रूट से हट गया। इसके बाद वहां की जो रडार की टीम थी। उसने मुनीर रेड्फा को वार्निंग दी कि वह अपने रूट से हट चुका है। वह अपने रूट पर आए।

मगर दो-तीन वार्निंग देने के बाद वह रूट पर नहीं आया और इराक की सरहद को पार कर गया। उधर जब वह जॉर्डन की सरहद में पहुंचा तो वहां पर वार्निंग दी गई। मगर इसका फायदा मोसाद ने यह उठाया कि उसने सीरिया के ATC के पूरे सिस्टम को हैक कर लिया था। इसलिए जो  जानकारी जॉर्डन को वहां से भेजें भेजी की उनका एक मिग-21 ट्रेनिंग के इरादे से उनकी सरहद में आया है। क्योंकि सीरिया के पास भी उस वक्त मिग-21 था।

इसी वजह से जॉर्डन ने मुनीर रेड्फा के उस मिग-21 को नहीं उड़ाया। मुनीर रेड्फा मिग-21 को लेकर रात के समय में इजराइल के सरहद पर उतर गया। इस बात की खबर जब इजरायल की एयर फोर्स और मोसाद के चीफ को मिली तो खुशी के मारे उनकी आंखों में पानी आ गया।

इसके बाद वहां जाकर मिग-21 की एक-एक चीज को बारीकी से देखें गया। इसके बाद इजराइल की एयरफोर्स के जो ट्रेनिंग के कैप्टन थे उसको बुलाया गया। उससे कहा गया कि अब तुम्हारा काम है कि मिग-21 की एक-एक खासियत को समझना और उसको बाहर लेकर आना।

मुनीर रेड्फा ने इजराइली एयर फोर्स के उस कैप्टन को 1 घंटे में सब कुछ समझा दिया। वह कैप्टन मिग-21 को इजराइल के स्पेस में लेकर उड़ पड़ा और सही सलामत उसकी लैंडिंग कराई। इसके बाद उन्होंने कहा कि हम अब सब कुछ कर सकते हैं। कि मिग-21 को चलाना इतना मुश्किल नहीं है। जितना कि उसको बताया जा रहा था। अब उनके हाथ में MIG-21 की पावर थी।

इसके बाद उसको अच्छी तरह से समझने के बाद कुछ ही दिनों बाद क्योंकि अरब के साथ तनाव चल ही रहा था तो उनकी लड़ाई शुरू हो जाती है। इस बीच क्योंकि उन्हें मिग-21 के बारे में सब कुछ पता चल चुका था तो उन्होंने अपने फाइट का प्लेन से अरब देशों के 6 MIG-21  को उड़ा दिया।

यह जंग करीब 6 दिन तक चली थी। इसमें Israel का कुछ नुकसान नहीं हुआ था। इस बात की खबर रूस को भी चल रही थी। जिसकी वजह से उसने इजराइल को धमकी भी दी थी।

दूसरी तरफ अमेरिका MIG-21 को देखना चाहता था। क्योंकि पश्चिम के किसी देश पर भी मिग-21 नहीं था। इधर इजरायल और अमेरिका के बीच कुछ फाइटर प्लेन की डील चल रही थी। उसमें अमेरिका ने एक शर्त रख दी कि अगर वह मिग-21 को हमें दे तो हम उनको यह फाइटर प्लेन देंगे। इस वजह से Israel ने मिग-21 को अमेरिका को भी सौंप दिया। इस वजह से पश्चिम देशों के पास भी मिग-21 पहुँच गया।

मोसाद ने मुनीर रेड्फा के साथ दो शर्त की रखी थी। उसको अशरफ को पूरा किया और मुनीर रेड्फा के पूरे परिवार को इजराइल की नागरिकता दी। उसको एक मिलियन डॉलर भी दिए। इसके बावजूद उसको वहां पर सरकारी नौकरी भी दी गई।

अब वह जो ईरान के दूतावास में कर्मचारी था। उसको भी इजराइल ने नागरिकता देने के लिए कहा था। मगर उसने मना कर दिया कि वह यहीं पर रहकर इजराइल के लिए काम करेगा। इसी वजह से  उसकी पहचान को भी गुप्त रखा।

यह कहानी थी कि किस तरीके से मोसाद में मिग-21 को इराक के अंदर से चुराया।