आज की कहानी Umakant Mishra पर चले Robbery के Case की है। क्योंकि इस कहानी में एक शख्स पर चोरी का इल्जाम लगाया जाता है। 29 साल तक वह शख्स यह मुकदमा अदालत में लड़ता है। 29  साल बाद उसे वहां से बाइज्जत बरी कर दिया जाता है। यह कहानी एक ऐसी ही कहानी यह सोचकर आदमी यकीन भी नहीं कर सकता। मगर यह एक हकीकत है क्योंकि यह कागजात में लिखी हुई बात है।

यह कहानी 1994 की है। उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर में डाकघर में एक शख्स डाकिया के जॉब किया करता था। उसका नाम उमाकांत मिश्रा था। वह उमाकांत मिश्रा के दो बच्चे और बीवी थी।

उमाकांत मिश्रा लोगों के घर चिट्ठियां पहुंचाया करता था। क्योंकि उस दौर में इंटरनेट डिजिटल मार्केटिंग वगैरह कोई चीज नहीं थी। उस दौर में लोगों के घर पैसे मनी ऑर्डर के जरिए भेजे जाया करते थे। उमाकांत मिश्रा चिट्ठी पहुंचाने के अलावा लोगों के मनीआर्डर भी पहुंचाया करता था।

उमाकांत मिश्रा पर जब भी मनी ऑर्डर आया करते थे। वह उनको लोगों के घर पहुंचा दिया करता था। उसका पूरा हिसाब पोस्ट ऑफिस में आकर अपने सीनियर को दे दिया करता था। एक बार उमाकांत मिश्रा को ₹697. 60 के मनीआर्डर लोगों तक पहुंचाने थे। उमाकांत मिश्रा यह पैसे लेकर मनीआर्डर पहुंचाने के लिए डाक ऑफिस से निकल गया। वह लोगों के घर पैसे पहुंचाने चला गया।

umakant misra robbery story
Umakant Mishra

उन रुपयों में से ₹300 तो उसने लोगों के घर पहुंचा दिया। मगर जो लोग वक्त पर नहीं मिले। उनके पैसे लेकर वह वापस डाकघर में आ गया। जो बचे हुए पैसे थे वह ₹397.60 थे।

उन रुपयों को वह डाक ऑफिस में अपने सीनियर को देकर और कागज में लिखवा कर वापस आ गया। मगर अगले दिन जब वह डाकघर गया तो वहां मौजूद दो उसको देखने लगे। उनमें से सीनियर ने कहा कि तुमने कल ₹57.60 कम जमा किए थे। तुमने सिर्फ ₹340 ही जमा किए थे।

क्योंकि कागज में तो पूरे पैसे लिखे हुए थे। मगर उसने कहा कि गिनती में ₹57.60 पैसे कम है।

इसके बाद डाक घर वालों ने उमाकांत मिश्रा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा दी। इसके बाद उमाकांत मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया। और उनको जेल भेज दिया गया। क्योंकि मामला ज्यादा बड़ा नहीं था।

इसलिए वह जल्दी ही जेल से वापस आ गया। मगर उसको नौकरी से हटा दिया गया था। क्योंकि उस पर चोरी का इल्जाम लगा हुआ था। वह जेल से तो छूट गया था। मगर उस पर यह मुकदमा लगातार चलता रहा।

उमाकांत मिश्रा इस मुकदमे को अदालत में लड़ता रहा। क्योंकि उस पर चोरी का इल्जाम लगा हुआ था तो गांव में भी उसकी काफी बदनामी हो गई थी। इसी वजह से उसे अपने गांव को छोड़ कर आना पड़ा था। कहीं दूसरी जगह पर रहकर वह इस मुकदमे को लड़ रहा था। वह अपने सर से इस चोरी के कलंक को मिटाना चाहता था।

क्योंकि मुकदमे में काफी पैसा खर्च हो रहा था। इस वजह से उसने अपनी कानपुर के घर की जमीन बेच दी। जिससे कुछ साल तक मुकदमे का खर्च, घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलता रहा।

जब वे पैसे भी खत्म हो गए तो उसको अपनी खेती की जमीन भी बेचनी पड़ी क्योंकि उसकी नौकरी चली गई थी और पैसों की काफी किल्लत हो रही थी। इसी वजह से वह अपने बच्चों की पढ़ाई भी सही से नहीं कर पा रहा था।

इसी दौरान उसके 1 एक लड़के और लड़की की बीमारी की वजह से मौत हो गई क्योंकि वो उनका सही से इलाज नहीं कर पाया।

मगर वह अपना यह मुकदमा लड़ता रहा। इसके बाद उसने अपनी एक लड़की की शादी की। जो उसने पैसा लोगों से लिया था। क्योंकि अब वह काफी गरीब हो चुका था। उसके पास पैसे की बहुत कमी थी। क्योंकि वह पहले ही नौकरी से हटाया जा चुका था। मुकदमे में और घर के खर्चे में उसका काफी खर्च हो रहा था।

उसका जो छोटा लड़का था। उसको उसने प्राइवेट जॉब में लगवा दिया। क्योंकि उसकी अच्छी पढ़ाई तो करवा नहीं सका था। तो इसलिए उसको अफसर नहीं बना सका। मगर हर बाप की एक तमन्ना होती है, कि वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर एक अच्छा आदमी बनाये। मगर पैसों की कमी होने की वजह से वह अपने बच्चों को नहीं पड़ा पाया था।

पैसे की वजह से उसने लोगों के घर मजदूरी भी करनी शुरू कर दी थी। जहां पर जो काम मिलता वह कर लिया करता था। आखिर हर किसी को करना ही पड़ता है। मजबूरी हर किसी से हर कोई काम करवा देती है।

इसके बाद सन् 2010 में उसके रिटायरमेंट का वक्त आ गया और वह मुकदमे को लड़के हुए रिटायर हो गया।

उमाकांत मिश्रा हिम्मत नहीं आ रहे थे। वह मुकदमा लड़ रहे थे। ताकि उनको इंसाफ मिले। इसी वजह से लगभग 348 बार वह अदालत में तारीख पर गए। अब सोचने वाली बात यह है, कि इतनी दफा अगर कोई अदालत में तारीख पर जाएगा। उसका कितना खर्च होगा। इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। हम और तुम तो सिर्फ कह ही सकते हैं। मगर जिस आदमी पर यह बीत रही हो उसका अनुमान वही लगा सकता है।

एक तरफ उमाकांत मिश्रा की नौकरी चली गई दूसरी तरफ बच्चों का खर्च और घर का खर्च और मुकदमे का खर्च जिससे आदमी टूट जाता है। मगर उमाकांत मिश्रा हिम्मत नहीं हारा था।

इसके बाद सन 2013, 25 नवंबर को 29 साल बाद उमाकांत मिश्रा को अदालत में इंसाफ दिया। अदालत ने यह फैसला सुनाया की उमाकांत मिश्रा ने उन पैसों की चोरी नहीं की थी। क्योंकि इसका कोई गवाह मौजूद नहीं था। यह बात सिर्फ उन दो आदमियों के बीच मौजूद थे। एक उमाकांत मिश्रा और दूसरा उसका सीनियर अफसर।

मगर सोचने वाली बात है। उमाकांत मिश्रा का चोर ना होना तो अदालत ने मान लिया। मगर उसके 29 साल जो अदालत के चक्कर काटते हुए गुजरे और किस परेशानी में उसने यह वक्त गुजारा उसका हिसाब कौन देगा। कोई भी इस चीज का बदला नहीं दे सकता। अदालत ने तो सिर्फ अपना फैसला सुना दिया। मगर जिस आदमी पर यह बात बीती होगी यह वही जान सकता है।

उमाकांत मिश्रा की जो 29 साल की जिंदगी अदालत के चक्कर काटते हुए गुजर गई उसका हिसाब कौन देगा।

इसके बाद अदालत ने उमा उमा कांत मिश्रा को बेकसूर माना और उसकी जो सर्विस के दिन थे। उनको काउंट कर लिया गया। जब से उसको नौकरी से हटाया गया था। जब से लेकर और जब तक उसका रिटायरमेंट का वक्त था। जब तक उसको नौकरी पर माना गया। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी। उमाकांत मिश्रा की जिंदगी बर्बाद हो चुकी थी।

मगर उमाकांत मिश्रा को इंसाफ मिला था। अब वह शान से लोगों में घूम सकता था। जिस बेज्जती का सामना उसने 29 साल तक किया उससे उससे निजात मिल गई।

इसके बाद उमाकांत मिश्रा ने अदालत में याचिका दायर की थी। उसको जब से नौकरी से हटाया गया और अब तक की तनख्वाह का पैसा दिया जाए। उसका PF और DA जो बनता है। वह भी उसको दिया जाए। जाहिर सी बात है, या उसका हक भी है। क्योंकि अदालत ने उसको बेकसूर माना तो उसका यह हक बनता है कि उसको नौकरी का तमाम पैसा दिया जाए। जब से उसको नौकरी से हटाया गया था।

यह कहानी थी एक ऐसे आदमी की जिस पर 29 साल मुकदमा चलता रहा और 29 साल बाद मुकदमा जीता आखिरकार उमाकांत मिश्रा को इंसाफ मिल गया। मगर उसकी पिछली जिंदगी तो बर्बाद  हो गई। जिसका हिसाब अब कोई नहीं दे सकता।

यह कहानी इजिप्ट यानी मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद अनवर सादात के कत्ल (Assassination) की है। मिस्र दुनिया का ऐसा देश है जिसका क्षेत्रफल काफी बड़ा है। यहां की 80 फीसद आबादी मुस्लिम है। बाकी 20 फीसद ईसाई वगैरह है। Anwar Sadat मिश्र के तीसरे राष्ट्रपति थे।

1970 में अनवर सादात मिस्र के राष्ट्रपति बने थे। शुरू में लगा कि शायद यह ज्यादा कामयाब नहीं हो पाएंगे। मगर अनवर सादात की अलग सोच थी। इजराइल के साथ लड़ते हुए लगभग 25 साल हो चुके थे। अनवर सादात एक अलग किस्म के आदमी थे। उन्होंने मिस्र की अर्थव्यवस्था सही करने का इरादा किया और धीरे-धीरे इजराइल की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया। मिस्र एक ऐसा देश था जिसने अरब देशों में से सबसे पहले इजराइल को मान्यता दी थी।

इजराइल और अरब देशों में लड़ाई चल रही थी। जिसकी वजह से अरब देशों ने एक संगठन बनाया जिसका नाम अरब लीग रखा गया। इस लड़ाई में मिस्र अरब देशों में सबसे आगे था। उस वक्त नासिर मिस्र के राष्ट्रपति थे। इजराइल और अरब देशों की तीन लड़ाई हो चुकी थी। जिनमें तीन लड़ाई इजराइल ही जीता था।

Anwar Sadat का राष्ट्रपति बनना:-

राष्ट्रपति नासिर के मरने के बाद अनवर सादात वहाँ के राष्ट्रपति बने थे। अनवर सादात शुरू से ही अपने पास कोई सिक्योरिटी नहीं रखा करते थे। कई बार सलाहकारों के कहने की वजह से वे बॉडीगार्ड रख लिया करते थे। मगर वे एक आम आदमी की तरह जिंदगी बिता रहे थे। जिसकी वजह से वह मिस्र में खूब चर्चित थे।

मगर उनकी एक बात मिस्र के लोगों को पसंद नहीं आई। वह यह थी के अनवर सादात ने इजराइल के साथ संबंध बनाने शुरू कर दिए थे। जिसकी वजह से वहां के लोग और जो कट्टरपंथी समूह है। उनके खिलाफ होते जा रहे थे।

इजराइल के साथ समझौता:-

इसके बाद अमेरिका ने भी इन दोनों के बीच में टांग अड़ाना शुरू कर दी और जिसके बाद मिस्र ने इजराइल को एक देश के तौर पर मान्यता दे दी। जिसकी वजह से अरब लीग उसके खिलाफ हो गया और उसको अरब लीग से निकाल दिया गया।

इजराइल के साथ शांति समझौते की वजह से अनवर सादात को शांति नोबेल पुरस्कार भी दिया गया। अनवर सादात मुस्लिम शासकों में से पहले ऐसे शासक बने जिन को नोबेल पुरस्कार दिया गया।

जिस वक्त नासिर मिस्र के राष्ट्रपति थे तो उन्होंने मिस्र के कट्टरपंथी समूह के जो नेता थे उनको जेल में डाल दिया गया था। मगर जब अनवर सादात मिस्र के राष्ट्रपति बने और उन्होंने इजराइल के साथ समझौता किया। जिसकी वजह से अरब लीग और मिश्री के कट्टरपंथी लोग उनके खिलाफ हो गए तो उन्होंने सोचा कि जो कट्टरपंथी समूह के नेता जेल में बंद है। उनको आजाद करके उनकी सोच बदली जाए। उनको अपनी तरफ किया जाए। जिसकी वजह से उनकी ताकत में इजाफा हो जाएगा।

assassination of anwar sadat
President Anwar Sadat

अनवर सादात में उन कट्टरपंथी समूह के नेता को आजाद कर दिया। मगर उनके सोच नहीं बदली और वह अनवर सादात के खिलाफ हो गए।

इस बीच अनवर सादात ने इजरायल का दौरा भी किया था। जिसकी वजह से अरब लीग उसके और मुखालिफ हो गया था। इस मिश्री के लोग भी उसके मुखालिफ हो गए थे। इस बात पर अनवर सादात की पत्नी कहती है। जब से उन्होंने इजरायल का दौरा किया है। तब से मुझे डर लगता है, कि जब भी वह बाहर जाते हैं। उनके वापस आने तक उन्हें डर लगा रहता है।

इसके बाद वहां के जो कट्टरपंथी समूह थे। उन्होंने मिस्र की सेना में कट्टरपंथी सोच के लोगों को भर्ती करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने सेना के एक लेफ्टिनेंट जिनका नाम खालिद इस्लाम बोली था। उनका जहन तब्दील किया। उनके जरिये वह सेना में अपनी सोच के लोगों को भर्ती करने लगे थे।

उनके भर्ती करने का मकसद यह था कि वक्त आने पर इनका इस्तेमाल किया जा सके। इसके लिए उन्होंने सेना में अपने लोगों को भर्ती करना शुरू कर दिया।

उनका जो प्लान था वह यह था कि सेना के मुख्यालय, स्टेट सिक्योरिटी का मुख्यालय और टेलीफोन एक्सचेंज के मुख्यालय को अपने कब्जे में लिया जाए। उसी वक्त मिस्र के राष्ट्रपति का भी कत्ल किया जाए। उसके लिए इन्होंने एक दिन चुना वह दिन 6 अक्टूबर 1981 था।

इसकी वजह यह थी कि 6 अक्टूबर को मिस्र का विजय परेड दिवस होता है। उस दिन आर्मी के सभी हेड वहां पर होते हैं। बाकी सिक्योरिटी के हेड भी वहां पर मौजूद होते हैं। यहां तक कि मिस्र के राष्ट्रपति भी उस परेड में मौजूद होते हैं। इसी वजह से इन्होंने 6 अक्टूबर का दिन चुना था।

मगर परेड के मैदान में राष्ट्रपति को मारना मुश्किल था। क्योंकि उस वक्त बहुत ज्यादा सैनिक वहां पर मौजूद होंगे और यहां तक कि आर्मी के तमाम चीफ और सिक्योरिटी की भी वहां पर मौजूद होंगे। इस बीच राष्ट्रपति का कत्ल करना मुश्किल था। लेकिन ते यह किया गया की उसी परेड में राष्ट्रपति का कत्ल करना है।

उस परेड के लिए राष्ट्रपति अनवर सादात ने इंग्लैंड के एक दर्जी से अपनी ड्रेस सिलाई थी। जिसको वह उस परेड में पहन कर जाते। जब उन्होंने वो ड्रेस पहनी तो उसके अंदर उन्होंने बुलेट प्रूफ जैकेट नहीं पहनी थी। इस पर उनकी पत्नी ने उन्हें टोका भी था कि वह बुलेट प्रूफ जैकेट पहने।

मगर उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि उनकी ड्रेस की शो बिगड़ जाएगी। वह मोटे लगेंगे। क्योंकि जब वह इजराइल के दौरे पर गए थे तो उस वक्त भी वे बुलेट प्रूफ जैकेट में मोटे लग रहे थे। उनका लुक बिगड़ रहा था।

अनवर सादात बिना बुलेट प्रूफ जैकेट के ही परेड में चले गए। वहां पर बीच में कुर्सी पर बैठ गए। उनके चारों तरफ बाहर के देशों से आए हुए लोग भी मौजूद थे। वहां के सिक्योरिटी की चीफ भी उनके पास ही बैठे हुए थे। मिस्र के उपराष्ट्रपति Hosni Mubarak भी उन्हीं के पास बैठे हुए थे। कई मुल्कों से आए हुए मेहमान भी वहीं मौजूद थे।

इसके बाद परेड में सभी अपने-अपने करतब दिखाने लगे। उस वक्त आसमान में लड़ाकू विमानों का करतब चल रहा था। उसके बाद तोपों की कला दिखानी थी। मगर अचानक से कुछ ट्रक मैदान में आ गए। ट्रक भी इसी शो का हिस्सा थे। ट्रक अपने रुट पर चलने लगे मगर अचानक एक ट्रक उनमें से अपने रास्ते से हट कर अनवर सादात की तरफ बढ़ने लगा।

वो ट्रक आगे आते-आते अचानक से रुक गया। वहां बैठे हुए तमाम लोग घबरा गए। क्योंकि वह ट्रक इसी अंदाज में रुका था। बल्कि उस ट्रक को रोका गया था।

लेफ्टिनेंट इस्लाम बोली थी उसी ट्रक में मौजूद थे। उन्होंने ही ट्रक के ड्राइवर के सर पर बंदूक लगाकर उस ट्रक को रुकवाया था।

Anwar Sadat की हत्या (Assassination):-

ट्रक के रुकने के बाद 3 गोले अनवर सादात की तरफ फेंके गए। जिनमें से दो गोले फट गए और एक नहीं फटा। इसके बाद उस ट्रक में से लेफ्टिनेंट खालिद उतरे और उन्हीं के साथ ट्रक के पीछे से 15 आदमी और उतरे और वह अनवर सादात के स्टेज की तरफ बढ़ने लगे।

अनवर सादात ने सोचा कि शायद यह भी इस परेड का हिस्सा है। वह लोग अनवर सादात की तरफ बढ़ते रहे। उन्होंने फिर 3 गोले छोड़े जिनमें से दो फटे और एक नहीं फटा। इसके बाद उन्होंने अनवर सादात पर गोली चलाना शुरु कर दी। लेफ्टिनेंट खालिद सबसे आगे गोली चला रहे थे।

30 सेकंड तक तो किसी को मालूम ही नहीं हुआ कि आखिर यह क्या हो रहा है। 30 सेकंड के बाद जब देखा कि राष्ट्रपति अनवर सादात जख्मी हालत में नीचे पड़े हुए हैं। तब जाकर वहां की सिक्योरिटी फोर्स ने एक्शन लिया और उन लोगों में से जो गोली चला रहे थे कुछ लोग जख्मी हो गए।

क्योंकि वहां की सिक्योरिटी फोर्स यह समझ रही थी कि शायद यह गोली चलाना में परेड का ही हिस्सा है। वहां के जो चीफ लोग बैठे हुए थे। उनकी बंदूक खाली थी। वो सिर्फ फॉर्मेलिटी के लिए वहां पर अपनी गन लेकर बैठे हुए थे।

इसके बाद फौरन राष्ट्रपति अनवर सादात को अस्पताल ले जाया गया। मगर उनकी वहां पर मौत हो गई। उसी अस्पताल में लेफ्टिनेंट खालिद इस्लाम बोली को भी ले जाया गया। क्योंकि वह भी गोली लगने से जख्मी हो गए थे।

इसके बाद लेफ्टिनेंट खालिद से पूछा गया कि इसके पीछे कौन है और क्या क्या मकसद है। उनको यह बता कर पूछा गया कि अनवर सादात अभी जिंदा है। वह सही होते ही इस पर एक्शन लेंगे। मगर लेफ्टिनेंट खालिद ने यह कहकर टाल दिया की 34 गोली तो मैंने ही अनवर सादात के मारी है। उनका बचना नामुमकिन है।

इसके बाद पता चलता है कि इसके पीछे मुस्लिम ब्रदर हुड वगैरा का हाथ है। उन्होंने इस वजह से अनवर सादात को मारा है कि अनवर सादात ने इजरायल के साथ समझौता किया था।

मगर इस कत्ल के बाद वहां की सेना एक्टिव हो जाती है। इन लोगों का जो अगला मिशन था। उसको नाकाम बना दिया जाता है। इस गोलीबारी में बाहर के आए हुए मेहमान भी जख्मी हो गए थे। इसमें कुछ लोगों को पकड़ा भी गया और उनसे बाद में पूछताछ की गई।

इस तरह से मिस्र के एक राष्ट्रपति Anwar Sadat का उसी की सेना के सामने हत्या (assassination) हो जाना एक सनसनीखेज हत्या से कम नहीं है।

ये इसरायली ख़ुफ़िया एजेंसी Mossad के Operation Diamond की एक कहानी है। यह कहानी 1960 की है। रूस एक ऐसा लड़ाकू विमान बनाने में लगा हुआ था। जिसकी दुनिया में कोई मिशाल ना हो। इसी कोशिश में 1956 में आखिरकार रूस एक फाइटर प्लेन बनाने में कामयाब हो गया। जो फाइटर प्लेन रूस ने बनाया वह MIG-21 था।

जब MIG-21 आसमान में उड़ान भरी तो दुनिया उस पर रश करने लगी। धीरे-धीरे इसकी खासियत सबके सामने आने लगी। रूस की अमेरिका और पश्चिमी देशों से दुश्मनी थी।

रूस ने प्लेन बनाने के बाद अपने दोस्त मुल्कों को बेचना भी शुरू कर दिया। इसने अरब के देशों और एशिया के कई देशों को मिग-21 बेंचा। लेकिन अमेरिका और पश्चिमी देशों को नहीं बेंचा। तब तक अमेरिका और इजराइल को भी इस प्लेन के बारे में पता चलना शुरू हो गया। वह कमाल का फाइटर प्लेन है। वे चाहते थे कि इस प्लेन को देखा जाए कि ये इतना खतरनाक क्यों है।

रूस ने जिन देशों को मिग-21 बेंचा था। उनके साथ एक एग्रीमेंट किया था। तुम पश्चिमी देशों को मिग-21 नहीं दोगे और ना ही उनके रक्षा के किसी भी आदमी को मिग-21 के बारे में कुछ बताओगे।

क्योंकि वह सभी देश रूस के दोस्त थे। उन्होंने भी इस बात का पालन किया और इस फाइटर प्लेन के बारे में किसी भी पश्चिमी देशों को कुछ भी नहीं बताया।

उधर पश्चिमी देशों को इस बात की चिंता थी। इसमें उनके बारे में कैसे पता किया जाए। इसके काट कैसे बनाई जाए लेकिन उसके लिए मिग-21 तक पहुंचना उसको उड़ाना यह नामुमकिन था।

इसी दौरान में इजराइल की जो खुफिया एजेंसी मोसाद है। उसके लीडर को चेंज करने का वक्त आ गया था। इन्होंने भी अपने वक्त में काफी कोशिश की थी कि मिग-21 को किसी तरह से हासिल किया जा सके। चाहे किसी तरीके से भी हासिल किया जाए। वह कानूनी हो या गैरकानूनी हो।

उनकी जगह नए चीफ Meir Amit को बनाया गया। Meir Amit इजराइल की फ़ौज में थे। उनकी काबिलियत को देखते हुए मोसाद का चीफ बनाया गया। उनकी इजराइल के आर्मी चीफ से मुलाकात चल रही थी। पता किया जा रहा था कि तुम्हें किस किस चीज की जरूरत है।

इसी दौरान मोसाद के चीफ की मुलाकात इजरायली एयर फोर्स के चीफ से होती है। बातचीत करने के बाद जब वह चलने के लिए रुखसत होते हैं। तभी इजराइल के मोसाद के चीफ कहते हैं। अगर कोई भी मेरे लिए काम हो तो जरूर बताइए। वो कहते है की हमें MIG-21 लाकर दे दो।

जब मोसाद के चीफ ने यह सुना तो वह वहीं पर रुक गए और उन्होंने सोचा कि इन्होंने यह क्या मांग लिया कि जो नामुमकिन है। इसके बाद वह मुस्कुराए क्योंकि उन्हें पता था कि मोसाद के पहले चीफ ने काफी कोशिश की थी मिग-21 को लाने के लिए।

मोसाद के चीफ ने एयरफोर्स के चीफ से पूछा कि तुम सीरियस हो तो एयरफोर्स के चीफ ने कहा कि हां मैं सीरियस हूं। अगर हो सके तो तुम MIG-21 लाकर दे दो। उसके लिए मैं कुछ भी करने के लिए तैयार हूं।

अब मोसाद के चीफ ने इस बात को अपने दिल पर ले लिया। उन्होंने तय कर लिया कि मुझे अब एक मिग-21 को इजराइल की सर जमीन पर लैंड कराना ही है। अब वह कैसे होगा या आगे की बात है। इसके बाद वह प्लानिंग शुरू कर देते हैं। वह अपने खास आदमी को इकट्ठा करते हैं और कहते हैं मुझे किसी कीमत पर भी मिग-21 चाहिए।

तमाम बातें सोचने के बाद मोसाद के चीफ ने तय कि किसी तरीके से जिन देशों को भी उसने मिग-21 भेजा है। उस मिग-21 के पायलट के साथ सेटिंग की जाए और उससे कहा जाए कि तुम मिग-21 को इजरायल की सर जमीन पर लेकर आओ और यह एक ही सूरत में मुमकिन था कि पायलट देश से गद्दारी करें।

या फिर पायलट पर किसी और तरीके से दबाव बनाया जाए। इसी थ्योरी पर मोसाद के चीफ काम करना शुरू कर देते हैं। उन्होंने सोचा कि अरब के जिन देशों के पास मिग-21 है। उनके साथ गैरकानूनी तरीके से कोई सौदा किया जाए।

उस वक्त इजरायल के एक मशहूर जासूस थे जिनका नाम Jean Thomas था। Jean Thomas को यह काम दे दिया गया। कि वह मिस्र जाए क्योंकि मिस्र के पास भी एक मिग-21 है। वहां जाकर वह किसी तरीके से किसी पायलट से कोई डील करें और एक मिग-21 इजराइल लेकर आ जाए।

Jean Thomas मिस्र पहुंच जाते हैं। वहां पहुंचकर काफी वक्त गुजारते हैं। करीब 1 साल बीत जाता है। इसी दौरान वे मिग-21 के एक पायलट से दोस्ती भी कर लेते हैं। आखिर में उसका भरोसा जीतने के बाद उसको यह डील बताते हैं। उसको एक मिलियन अमेरिकी डॉलर का तोहफा देते हैं। साथ में उसको सुरक्षा की भी बात बताते हैं।

शर्त यह थी कि वह मिस्र से MIG-21 को उड़ा कर इजराइल में ले आए। जीन थॉमस यहां पर मार खा गए। वह जिस पायलट के साथ डील कर रहे थे। उन्हें लगा कि यह मेरे चंगुल में आ चुका है और यह काम कर देगा। उस पायलट ने मिस्र के साथ गद्दारी करने की सोची ही नहीं थी।

उसने यह बात सुनते ही कि इजरायल का एक आदमी उसको यह ऑफर दे रहा है। उसने यह सारी बात अपने सीनियर ऑफिसर को बता दी । जैसे ही सीनियर अफसरों को इस बात का पता चला तभी फौरन जीन थॉमस और उसके परिवार को मिस्र में गिरफ्तार कर लिया गया।

उस पर मुकदमा चलाया गया। 1962 में Jean Thomas को फांसी दे दी गई। और Jean Thomas के पिता और उसके परिवार को एक लंबी सजा दी गई। जिसके बाद उनको रिहा कर दिया गया।

पर मोसाद के चीफ Meir Amit ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कहा कि हमारी कोशिश जारी रहेगी। अब इसके बाद इन्होंने मिश्री के बाद इराक का रुख किया। क्योंकि उन्हें लगा कि इराक के पायलट उनके शिकंजे में आसानी से आ जाएंगे।

मोसाद के जासूसों ने इराक के अंदर काफी मेहनत की और इराक के दो ऐसे पायलट को पकड़ा उनके साथ दोस्ती की और उनको अगवा भी किया गया। सब कुछ करने के बाद उनको भी बड़ा ऑफर दिया गया। उन्हें भी यही कहा गया कि MIG-21 पहुंचाना है।

लेकिन वह दोनों पायलट आखिरी वक्त में डर गए। उन्हें लगा की जान खतरे में है और काम नहीं हो पाएगा। जब मोसाद के जासूसों को लगा कि यह भी हमारी मेहनत पर पानी फेर देंगे। आगे किसी भी देश के पायलट से हम डील नहीं कर सकेंगे। उन्होंने इस खतरे को देखते हुए इराक के उन दोनों पायलट को मार डाला। अब लगा कि यह काम नहीं हो पाएगा और मोसाद के चीफ Meir Amit इस काम को लेकर आगे बढ़ते रहे।

1964 में कुछ ऐसा हुआ कि लगा कि शायद यह काम हो जाएगा। ईरान के अंदर तेहरान जो ईरान की राजधानी है। वहां पर इजराइली दूतावास में एक कर्मचारी काम किया करता था जो यहूदी था। वह कर्मचारी इजराइल के लिए कुछ काम करना चाहता था।

उसी की एक गर्लफ्रेंड थी। उसकी गर्लफ्रेंड की दोस्त कि जिससे शादी हुई वह एक ईसाई था। जिसका नाम मुनीर रेड्फा था। वह इराक की एयरफोर्स में काम किया करता था। यह बात उस कर्मचारी ने अपने एक सीनियर अफसर को बताइ। यह बात इजराइली दूतावास के जरिए मोसाद तक पहुंच गई।

अब मोसाद को लगा कि शायद उनका काम हो जाएगा। सबसे मजे की बात यह थी। वह जो Munir Redfa इराक की एयर फोर्स में काम किया करता था। वह मिग-21 भी उड़ाता था। Munir Redfa इराक की एयर फोर्स के कैप्टन मैं से एक था।

मगर Munir Redfa इराक की एयर फोर्स से नाराज चल रहा था। उसकी वजह यह थी उसका यह कहना था कि वह एक काबिल कैप्टन है। मगर उसको ईसाई होने की वजह से वह जगह नहीं दी जाती जो और कैप्टन को दी जाती है।

इसका पता मोसाद को चल गया था। वह इस बात का पूरा फायदा उठाना चाहती थी। इसके बाद मोसाद ने अमेरिका से अपनी एक एजेंट को टूरिस्ट वीजा पर इराक में भेज दिया। उस वक्त इराक और अमेरिका में अच्छे रिश्ते थे।

उस इजराइल की जासूस ने Munir Redfa से दोस्ती बढ़ाई। धीरे-धीरे उसके करीब पहुंच गई। यहां तक कि उसके साथ घूमने के लिए कई विदेश दौरों पर भी गई। जब उसको लगा कि यह मेरी बातों में आ चुका है।

उसने मोसाद को खबर पहुंचा दी कि यह मेरी बातों में पूरी तरीके से यकीन करता है। अब मौका है कि उसको डील के लिए कहा जाए। मोसाद ने कहा कि इस बार कोई चूक नहीं होनी चाहिए। इसलिए पहले ही एक बार उसको टटोल लिया जाए। इसके बाद उसको यह ऑफर दिया जाए।

क्योंकि मोसाद को उसकी हर बात का पता चल चुका था। उस जासूस ने Munir Redfa से इस बात का फायदा उठाते हुए। उसके कान भरने शुरू कर दिए। मौका देख कर उसके सामने इस ऑफर की पेशकश रख दी। Munir Redfa ने इस ऑफर को कुबूल कर लिया। पर उसकी एक शर्त थी कि उसके पूरे परिवार को यहां तक कि उसके मां-बाप को भी सही सलामत यहां से निकाला जाए।

मोसाद ने मुनीर रेड्फा के सामने जो ऑफर रखी थी। वह यह थी कि उसको एक मिलियन अमेरिकी डॉलर दिए जाएंगे। उसको इजराइल की नागरिकता भी दी जाएगी। इसके बाद मुनीर रेड्फा ने मोसाद के प्लान के मुताबिक काम करना शुरू कर दिया।

मगर एक दिक्कत थी मुनीर रेड्फा के पूरे परिवार को एक साथ इराक से निकालना मुश्किल था। इससे इराक की एजेंसी को उस पर शक हो जाता और वह पकड़ा जाता।

इसके लिए मोसाद ने एक प्लान तैयार किया। उसने मुनीर रेड्फा के मां-बाप को बीमार का बहाना बनाकर इराक में ही कई मेडिकल टेस्ट कराएं और यह साबित कर दिया कि इनकी तबीयत ज्यादा खराब है। इनको विदेश के किसी हॉस्पिटल में ले जाना पड़ेगा।

इस बहाने से वे मुनीर रेड्फा के मां-बाप को इराक से निकाल कर ले गए। इसके बाद मुनीर रेड्फा के बीवी और बच्चे को टूरिस्ट वीजा पर इराक से निकाल दिया गया। यह काम कुछ समय-समय के बाद हुआ।

अब मुनीर रेड्फा अकेला इराक में बचा था। उसको MIG-21 इजराइल लेकर जाना था। इसमें एक परेशानी थी। इराक और इजरायल के बीच में कई और देशों की सरहद पड़ती है। जिसमें सीरिया, जॉर्डन वगैरह भी शामिल है।

यह रास्ता काफी लंबा था। जब रूस ने मिग-21 एक को बेचा था। उसमें एक शर्त यह भी थी कि इस फाइटर प्लेन में एक हद तक ही तेल भरा जाएगा। वह तेल इतना था कि उस तेल के जरिए इराक से इजराइल तक का सफर करना नामुमकिन था।

बीच में किसी दूसरे देश में उतर कर तेल भरवाने भी नामुमकिन था। इसके लिए मोसाद ने एक चाल चली। उसमें यह था की  मुनीर रेड्फा कभी-कभी इराक के जो तेल भरने वाले कर्मचारी थे। उनको पहले भी बहका बहका चुका था। कि तुम रूस के कहने पर चलते हो। जबकि यह फाइटर प्लेन अब हमारे हैं। तुम इसमें तेल पूरा क्यों नहीं भरते।

जाहिर सी बात है, इस जोश में आकर कभी-कभी मुनीर रेड्फा के फाइटर प्लेन में थोड़ा तेल ज्यादा भर दिया करते थे। इसी का फायदा उठाते हुए 16 August, 1966 को जिस दिन मुनीर रेड्फा का प्लेन उड़ाने का नंबर था। उसने यही मौका देखा और उसने उस दिन भी तेल भरने वाले कर्मचारियों से MIG-21 के टैंक को फुल करने की फरमाइश की।

उसने कहा की तुम कितने डरपोक हो जो रूस की बातों में आते हो।  दूसरे देश की बात का कहना मानते हो। इस बात से गुस्सा होकर इराक के तेल भरने वाले कर्मचारियों ने उसके टैंक को फुल कर दिया।

अब वह MIG-21 लेकर उड़ चुका था। क्योंकि जब भी कोई कैप्टन ट्रेनिंग में होता है। उसको एक रूट दिया जाता है। अगर वह उस रूट से भटकता है, तो उसको वार्निंग दी जाती है, कि वह अपने रूट पर आए नहीं तो उसके हवाई जहाज को उड़ा दिया जाएगा।

जब मुनीर रेड्फा फाइटर प्लेन लेकर उड़ा। उड़ने के बाद वह अपने रूट से हट गया। इसके बाद वहां की जो रडार की टीम थी। उसने मुनीर रेड्फा को वार्निंग दी कि वह अपने रूट से हट चुका है। वह अपने रूट पर आए।

मगर दो-तीन वार्निंग देने के बाद वह रूट पर नहीं आया और इराक की सरहद को पार कर गया। उधर जब वह जॉर्डन की सरहद में पहुंचा तो वहां पर वार्निंग दी गई। मगर इसका फायदा मोसाद ने यह उठाया कि उसने सीरिया के ATC के पूरे सिस्टम को हैक कर लिया था। इसलिए जो  जानकारी जॉर्डन को वहां से भेजें भेजी की उनका एक मिग-21 ट्रेनिंग के इरादे से उनकी सरहद में आया है। क्योंकि सीरिया के पास भी उस वक्त मिग-21 था।

इसी वजह से जॉर्डन ने मुनीर रेड्फा के उस मिग-21 को नहीं उड़ाया। मुनीर रेड्फा मिग-21 को लेकर रात के समय में इजराइल के सरहद पर उतर गया। इस बात की खबर जब इजरायल की एयर फोर्स और मोसाद के चीफ को मिली तो खुशी के मारे उनकी आंखों में पानी आ गया।

इसके बाद वहां जाकर मिग-21 की एक-एक चीज को बारीकी से देखें गया। इसके बाद इजराइल की एयरफोर्स के जो ट्रेनिंग के कैप्टन थे उसको बुलाया गया। उससे कहा गया कि अब तुम्हारा काम है कि मिग-21 की एक-एक खासियत को समझना और उसको बाहर लेकर आना।

मुनीर रेड्फा ने इजराइली एयर फोर्स के उस कैप्टन को 1 घंटे में सब कुछ समझा दिया। वह कैप्टन मिग-21 को इजराइल के स्पेस में लेकर उड़ पड़ा और सही सलामत उसकी लैंडिंग कराई। इसके बाद उन्होंने कहा कि हम अब सब कुछ कर सकते हैं। कि मिग-21 को चलाना इतना मुश्किल नहीं है। जितना कि उसको बताया जा रहा था। अब उनके हाथ में MIG-21 की पावर थी।

इसके बाद उसको अच्छी तरह से समझने के बाद कुछ ही दिनों बाद क्योंकि अरब के साथ तनाव चल ही रहा था तो उनकी लड़ाई शुरू हो जाती है। इस बीच क्योंकि उन्हें मिग-21 के बारे में सब कुछ पता चल चुका था तो उन्होंने अपने फाइट का प्लेन से अरब देशों के 6 MIG-21  को उड़ा दिया।

यह जंग करीब 6 दिन तक चली थी। इसमें Israel का कुछ नुकसान नहीं हुआ था। इस बात की खबर रूस को भी चल रही थी। जिसकी वजह से उसने इजराइल को धमकी भी दी थी।

दूसरी तरफ अमेरिका MIG-21 को देखना चाहता था। क्योंकि पश्चिम के किसी देश पर भी मिग-21 नहीं था। इधर इजरायल और अमेरिका के बीच कुछ फाइटर प्लेन की डील चल रही थी। उसमें अमेरिका ने एक शर्त रख दी कि अगर वह मिग-21 को हमें दे तो हम उनको यह फाइटर प्लेन देंगे। इस वजह से Israel ने मिग-21 को अमेरिका को भी सौंप दिया। इस वजह से पश्चिम देशों के पास भी मिग-21 पहुँच गया।

मोसाद ने मुनीर रेड्फा के साथ दो शर्त की रखी थी। उसको अशरफ को पूरा किया और मुनीर रेड्फा के पूरे परिवार को इजराइल की नागरिकता दी। उसको एक मिलियन डॉलर भी दिए। इसके बावजूद उसको वहां पर सरकारी नौकरी भी दी गई।

अब वह जो ईरान के दूतावास में कर्मचारी था। उसको भी इजराइल ने नागरिकता देने के लिए कहा था। मगर उसने मना कर दिया कि वह यहीं पर रहकर इजराइल के लिए काम करेगा। इसी वजह से  उसकी पहचान को भी गुप्त रखा।

यह कहानी थी कि किस तरीके से मोसाद में मिग-21 को इराक के अंदर से चुराया।

 

Sydney में James Smith के Murder की कहानी। यह 1935 की बात  है। यह सिडनी शहर की बात है। एक बाप और बेटे दोनों की वहीं पर सिडनी में ही Coogee मछलीघर का  बिजनेस करा करते थे। उसमें ब्रिज के किनारे पर लोग आते थे। मछलीघर में मछलियां देखा करते थे। साथ में उनके 14 सीटों का एक थिएटर था। इनका कारोबार सही चल रहा था। लेकिन 1935 में वहां पर अचानक कुछ ऐसी चीजें हुई जिससे उनका धंधा मंदा हो गया।

लोग beach पर आने कम हो गए। उससे इनके बिजनेस में काफी लॉस हो रहा था। उसको लेकर हॉप्सन काफी परेशान था। इसी दौरान दूसरी तरफ 8 अप्रैल 1935 को सिडनी का एक शख्स गायब हो जाता है। उसकी बीवी से गायब होने की रिपोर्ट लिखवा देती है। पुलिस उसको तलाश करती है। पर वह नहीं मिलता। तभी एक दिन समुंदर के किनारे पर हॉप्सन वह अपने दोस्तों के साथ जा रहा था। इत्तेफाक से उसको एक शार्क मछली मिलती है। टाइगर शार्क तकरीबन 12 फुट लंबी थी।

रोल अपने साथियों की मदद से शार्क को अपने कब्जे में ले लेता है। उसके बाद उसको लेकर वह अपने बीच पर पहुंच जाता है। सार्क को देखकर उसके पिता हॉप्सन भी काफी खुश होते हैं।

वह उस टाइगर शार्क को अपने मछलीघर में रखने का इरादा कर लेते हैं। उसको वहां पर रखा गया। इसके बाद उसी दौरान में होता यह है कि जब उसको लाकर वहां पर रखते हैं। उस टाइगर शार्क के बारे में खबर फैल जाती है और लोग वहां आने शुरू हो जाते हैं। लोग उसे देखना शुरू कर देते हैं और उनका धंधा फिर से चलना शुरू हो जाता है।

इस दौरान में लोगों की काफी भीड़ बढ़ चुकी थी। 25 अप्रैल 1935 की तारीख आती है। उस वक्त ऑस्ट्रेलिया में छुट्टी थी। क्योंकि वहां पर नेशनल हॉलिडे था। तो उस दिन लोगों की वहां पर काफी भीड़ बढ़ रही थी। इसको देखकर हॉप्सन काफी खुश था। जो कि शार्क मछली को देखने के लिए काफी लोग वहां पर आ रहे थे।

लेकिन सार्क यहां आने के बाद काफी चिड़चिड़ा हो चुका था। और काफी अलग हरकतें कर रहा था। शाम के करीब 4:30 बजे थे। 4:30 बजे सार्क पानी के नीचे जाता है। वहां पर एक रिपोर्टर उसको रिपोर्ट करने के लिए वहां पर आया हुआ था। अचानक टाइगर शार्क का बर्ताव चेंज होता है। और वह उल्टी करना शुरू कर देता है।

जब वह पहली बार उल्टी करता है तो उसके मुंह से एक चूहा बाहर आता है। जब वह दूसरी बार उल्टी करता है तो एक चिड़िया उसके मुंह से बाहर आती है। धीरे-धीरे को पानी के ऊपर आना शुरू हो जाता है और लोग उसे देख रहे थे।

तीसरी बार जब उल्टी करता है तो सारे लोग चौंक जाते है। उसके मुंह से एक इंसान का पूरा हाथ बाहर निकला था। जब उस इंसान का हाथ वहां पर देखा तो सभी लोग घबरा गए और चीखने लगे।

इसके बाद किसी ने पुलिस को खबर दी पुलिस वहां पर पहुंच जाती है। उस हाथ को किसी तरीके से बाहर निकाल लेती है।

पुलिस उस हाथ को अपने कब्जे में ले लेती है। उसको जांच के लिए भेज देती है। उस हाथ की एक पहचान थी कि उस हाथ पर तो टैटू बने हुए थे और उस टैटू में दो बॉक्स बने हुए थे। जब फॉरेंसिक एक्सपर्ट उस हाथ की जांच करते हैं तो हैरान रह जाते वह कहते हैं कि इस हाथ को सार्क ने नहीं खाया बल्कि किसी तरीके से इस हाथ को काटा गया है।

अब सवाल यह था कि उस शार्क के पेट में यह हाथ कैसे पहुंचा जबकि उसके हाथ पर शार्क के दांत के निशान भी नहीं थे। तो वह हाथ किसने काटा और किसने उसके पेट में उसको पहुंचाया।

जब फॉरेंसिक की रिपोर्ट आती है तो पता चलता है कि उस शार्क ने किसी हाथ को बाहर नहीं निकाला था बल्कि एक क़त्ल के राज को उगला था।

इसके बाद वहां की डिटेक्टिव एजेंसी उस हाथ की तस्वीर वहां के लोकल अखबार में छपवा देती है। क्योंकि यह साफ हो चुका था कि यह एक कत्ल का मामला है।

उस हाथ का फोटो अखबार में छप जाता है। इसके बाद पुलिस इंतजार करती है। तभी एक शख्स 2 दिन बाद उस हाथ की तस्वीर अखबार में देखकर वहां की पुलिस को संपर्क करता है। उस शख्स का नाम Edward Smith था। वह शख्स बताता है कि यह जो टैटू हाथ पर बना हुआ है उसी के जैसा टैटू मेरे भाई के हाथ पर भी बना हुआ था और वह 8 अप्रैल से गायब है।

james smith murder
James Smith

अब जैसे ही वह पुलिस के पास पहुंचता है और यह बात बताता है। पुलिस इसकी जांच करती है तो पता चलता है। वह जो शख्स आया था उसका भाई का नाम James Smith था। वह 8 अप्रैल से गायब था। उसकी पत्नी ने उसकी गायब होने की रिपोर्ट लिखवाई थी। उसका कोई सुराग नहीं मिला था। अब उसकी पत्नी ने भी उसके हाथ को पहचान लिया था। वह इसकी गवाह थी कि यह हाथ जेम्स का ही है। जेम्स काफी दिनों से गायब था।

इसके बाद सिडनी की एजेंसी ने इसकी छानबीन शुरू कर दी। जब छानबीन शुरू की तो पता चला की जेम्स को आखिरी बार सिडनी में जिस शख्स के साथ देखा गया था उसका नाम Patrick Francis Brady था। Patrick Francis Brady एक जालसाज था। वह नकली पेपर बगैरा तैयार किया करता था। वह एक सर्विसमैन भी था। जो नौकरी छोड़ चुका था और जेल जा चुका था।

इन फोटो को देखने के बाद एक टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि उसने Smith को आखरी बार Brady के साथ देखा था। उसने कोट पहना हुआ था और उसके दोनों हाथ अपनी जेब में डाली हुई थी। और उसमें से एक हाथ उसने अपने जेब से बाहर ही नहीं निकाला था।

पुलिस ने बताया कि उसने उसको जिस घर के सामने छोड़ा उस घर के मालिक Reginald William Lloyd Holmes सिडनी की एक बड़े बिजनेसमैन थे। उनका एक बड़ा कारोबार था। जो बोट को बनाकर बेचा करते थे लेकिन साथ में Holmes का एक दूसरा कारोबार भी था। जो ड्रग्स का था। वो ड्रग्स और अफीम को बोट के जरिए सप्लाई किया करता था।

कहीं से यह ताल्लुक साबित हुआ था कि Brady और Smith थ इसके साथ काम किया करते थे। जब यह खबर पुलिस के पास आई तो पुलिस ने Brady को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार करने के बाद से पूछताछ की लेकिन Brady ने पुलिस की कोई मदद नहीं की और वह बार-बार कहता रहा कि मेरा James Smith के murder से कोई ताल्लुक नहीं।

पुलिस ने Brady की छानबीन की तो पता चला। उसने सिडनी में ही एक Cottage किराए पर लिया हुआ था और उस Cottage में आता जाता था। छानबीन की तो पता चला कि आखरी बार 8 अप्रैल को स्मिथ अपनी बीवी से यह कहकर निकला था कि वह एक दोस्त के साथ जा रहा है और वह थोड़ा देर से आएगा।

छानबीन से पता चला कि जेम्स स्मिथ उस रात Patrick Brady के ही साथ था। और वह होटल में था। दोनों ने साथ जुआ खेला और शराब पी थी। उसके बाद में होटल से निकलकर Patrick Brady के कॉटेज में पहुंच गए जो उसने किराए पर ले रखा था।

उस कॉटेज की मालिक एक औरत थी। जब उससे पूछताछ की तो पता चला जिस दिन Smith गाया। उससे अगले ही दिन Patrick Brady ने वह कॉटेज खाली कर दिया था। वह कॉटेज छोड़कर चला गया था। पुलिस ने उससे पूछा कि कोई ऐसी खास चीज जो आपने नोट किया हो।

तो उस औरत ने बताया कि मेरा एक लोहे का ट्रंक था। जो उसको कॉटेज में नहीं है। और वो ट्रंक बड़ा था इसके बाद पुलिस ने आगे की छानबीन Patrick Brady से ही शुरू की। लेकिन Patrick Brady लगातार मना करता रहा कि उसका क़त्ल से कोई ताल्लुक नहीं।

सबके ताल्लुक उस के बिजनेसमैन Holmes से जुड़े हुए थे। जिसके साथ Patrick Brady और Smith इसमें दोनों काम किया करते थे। पुलिस को लगा  कहीं ना कहीं इसमें Holmes का भी किरदार है। इसके बाद पुलिस पूछताछ करने के लिए Holmes के घर पहुंच जाते हैं।

जैसे ही यह बात Holmes को पता चलती है। तो वहां से निकल जाता है। बोट पकड़कर समंदर में चला जाता है। समुंदर में जाकर वह अपने आप को गोली मार देता है। इत्तेफाक से गोली उसके सर की हड्डी को छूकर निकल गई इसके बाद वह बच गया।

जब लोगों ने यह मंजर देखा है। तो उन्होंने पुलिस को खबर कर दी और पुलिस ने कई किलोमीटर तक उसका पीछा किया। Holmes को चारों तरफ से गहरा और उसको पकड़ कर ले गए मगर वह जख्मी हो गया था। उसको हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया।

भर्ती कराने के बाद जब वह सही हो गया तो उसके बाद पुलिस ने उससे पूछताछ की पुलिस ने उनसे पूछा कि James Smith के murder में तुम्हारा क्या हाथ है और उसकी बाकी की बॉडी कहां पर है।

Holmes ने कहा ठीक है, बताता हूं। उसने बताया कि इसमें उसका कोई रोल नहीं है। मगर मैं तुमको सब बात बताता हूं। उसने बताया कि 1 दिन Patrick Brady मेरे घर आया। घर आने के बाद उसने कहा तुमने जेम्स स्मिथ के बारे में सुना होगा। जेम्स गायब है। उसका हाथ मिला है। पर तुमने उसका दूसरा हाथ नहीं देखा। Holmes ने बताया Patrick Brady अपने साथ एक हाथ लेकर आया था। जो दाहिना हाथ था। उसने उसको टेबल पर रख दिया। उसने कहा यह स्मिथ का दूसरा हाथ है।

उसने कहा उसने बाकी की लाश को ट्रंक में रखकर समंदर में फेंक दिया है। यह हाथ में इसलिए लेकर आया हूं ताकि तुम्हें बता सकू कि मैंने  उसका कत्ल किया है। मैं तुम्हारा भी कत्ल कर सकता हूं अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी।

उसकी डिमांड पैसे की थी। जो Holmes को ब्लैकमेल कर रहा था। क्योंकि Patrick Brady को मालूम था कि जेम्स किसी फर्जी कागजात को लेकर Holmes को ब्लैकमेल कर रहा था। मगर मैंने उसको ठिकाने लगा दिया क्योंकि वह मुझे भी ब्लैकमेल करने लगा था। अगर तुमने मुझे पैसे नहीं दिया तुम तुम्हारा भी यही हश्र होगा।

यह कहकर पैट्रिक वह हाथ Holmes के घर की टेबल पर रख कर भी चला गया। इसके बाद Holmes ने बताया कि मैं घबरा गया और उस हाथ को उठाकर समुंदर के पास गया। बोट से जाकर उस हाथ को समुंदर में फेंक दिया।

इसके बाद पुलिस कहती है कि तुम यह सारी बातें अदालत में बताओगे और 2 दिन बाद अदालत में तारीख थी।

लेकिन अगले ही दिन शाम को सिडनी के एक सुनसान इलाके में कार के अंदर Holmes की लाश मिलती है। उसकी बॉडी पर तीन निशान थे ।उसको तीन गोली मारी गई थी। पुलिस का यह मानना था कि Holmes ने पहले भी खुदकुशी करने की कोशिश की थी और यह भी खुदकुशी है।

लेकिन फोरंशिक एक्सपर्ट ने जांच की तो उन्होंने बताया कि यह खुद कुछ भी नहीं बल्कि एक कत्ल है। मगर पुलिस आखिर तक कहती रही कि यह एक खुदकुशी है। क्योंकि Holmes इज्जत दार घराने से था और उसका नाम इस मर्डर और फर्जी कारोबार में आ गया था।

क्योंकि Holmes ने अपनी बोट का भी इंश्योरेंस करा रखा था और उसने अपना भी इंश्योरेंस करा रखा था। अगर वह खुदकुशी करता तो उसके इंश्योरेंस का पैसा उसके परिवार वालों को नहीं मिलता।

कहा जाता है कि Holmes ने खुद अपनी सुपारी दी थी। सुपारी किलर से कहा था कि वह उसको तीन गोली मारे। हो सकता है, कि एक गोली मारने के बाद पुलिस उसको सुसाइड समझ ले।

खुदकुशी करने वाला आदमी खुद को तीन गोली नहीं मार सकता। मगर पुलिस इसको क़त्ल मारने के लिए तैयार नहीं है। उनका मानना था कि Holmes ने खुद अपनी सुपारी दी थी और एक से ज्यादा गोली मारने को कहा था। जिससे उसका इंश्योरेंस का पैसा उसके परिवार वालों को मिल सके और वो इंश्योरेंस की रकम बहुत बड़ी थी।

अब जो James Smith के murder का चश्मदीद गवाह था। जिसकी 12 घंटे बाद गवाही होनी थी और वह मारा गया। अब इस केस में कोई गवाह नहीं बचा था। सिर्फ एक एक्यूज बचा था और वह Patrick Francis Brady था।

Patrick Brady लगातार इस कत्ल से अपने आप को बचा रहा था। अब पुलिस के ऊपर उंगली भी उठाई गई कि इतना अहम गवाह था तो आपको उसके प्रोडक्शन देनी चाहिए थी।

सिडनी पुलिस ने अपनी इस कमी को स्वीकार किया लेकिन अदालत के सामने गवाही से पहले ही Holmes की मौत हो गई।

लेकिन अदालत की कार्यवाही शुरू हो जाती है Patrick Brady को जेम्स स्मिथ के कातिल के तौर पर सामने रखा जाता है। सार्क ने कैसे उल्टी करके उस हाथ को बाहर निकाला वह सारी चीजें अदालत के सामने बताई जाती है।

Patrick Brady के वकील अदालत में बहस करते हैं। और कहते हैं कि आप एक हाथ के बलबूते पर यह नहीं मान सकते कि वह हाथ जेम्स स्मिथ का ही है। अगर वह स्मिथ का हुआ भी तो आप यह नहीं मान सकते कि वह मर चुका है। हो सकता है कि वह बगैर हाथ के भी जिंदा हो और हो सकता है जेम्स स्मिथ के कत्ल की सुपारी किसी और ने दी हो।

इसमें एक बात और सामने आई थी कि बैंक इंश्योरेंस का एक बड़ा अफसर जो धोखाधड़ी में पकड़ा गया था। वह इसलिए पकड़ा गया था कि क्योंकि जेम्स स्मिथ ने उसके बारे में मुखबरी की थी। फिर यह बात सामने आई कि जेम्स स्मिथ पुलिस के लिए मुखबरी के तौर पर भी काम किया करता था। और बात यह सामने आई है कि जो अफसर पकड़ा गया था। उसको नौकरी से निकाल दिया गया था। शायद उसी ने James Smith के murder की सुपारी दी हो।

मगर वह साबित नहीं हो पाए क्योंकि बाकी लाश मिली नहीं थी। इसके बाद लोगों ने समुद्र को छान मारा मगर ना तो वह ट्रंक नहीं मिला और ना ही स्मिथ की लाश की कोई हिस्सा मिला।

अदालत में वकील की दलील यह थी कि एक हाथ मिलने से किसी के कत्ल की तस्दीक नहीं की जा सकती। हो सकता है, वह एक हाथ के बगैर भी जिंदा हो और जब तक लाश ना मिल जाए तो Patrick Brady को James Smith का कातिल नहीं कहा जा सकता। अदालत ने इस दलील को मान लिया और कहा कि ऐसा मुमकिन है कि एक हाथ के बगैर भी वह जिंदा हो और हो सकता है कि उसका एक हाथ ही काटा गया हो और इस बुनियाद पर अदालत ने Patrick Brady को रिहा कर दिया।

हालांकि रिहाई के कुछ दिनों बाद ही तमाम फर्जी केसों में उसको फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन James Smith के murder को लेकर Patrick Brady के ऊपर फिर कोई मुकदमा नहीं चला और सिडनी की पुलिस इसकी छानबीन करती रहे।

1935 से लेकर 1965 आ गया और 30 साल गुजर गए और 76 साल की उम्र में Patrick Brady की मौत हो गई। मरने से पहले Patrick Brady यही कहता रहा कि James Smith का murder उसने नहीं किया। उससे उसका कोई लेना-देना नहीं और Holmes ने जो पुलिस को कहानी सुनाई वह गलत थी। Holmes ने खुदकुशी की थी या उसका कत्ल हुआ था इसका भी कोई सुराग नहीं मिला।

इस कहानी का अंजाम यह है आज हम 2020 में आ चुका हैं। James Smith का murder किसने किया यह वास्तविक राज ही है। पूरी सिडनी में इससे बड़ी कोई मर्डर मिस्ट्री नहीं है। बहुत सारी रिसर्च इसको लेकर हुए और किताबें भी लिखी गई अलग-अलग टीम ने चैलेंज के तौर पर इसको लिया मगर आज 85 साल हो गए और यह आज तक एक राज ही है।

ये Budhia coach Biranchi Das murder की कहानी है। जिसके अंदर दौड़ने की काफी सलाहियत थी। शायद इसका नाम आपने पहले भी सुना होगा। हर घर में बुधिया का नाम लिया जाता था। बुधिया ओडिशा के बहुत ही पिछड़े इलाके में गरीब घर में पैदा हुआ। गरीबी का आलम यह था। बुधिया को पालने के लिए उसके मां-बाप के पास पैसे भी नहीं थे।

उस गरीबी से तंग आकर बुधिया के मां-बाप ने उसको किसी दूसरे शख्स को सिर्फ ₹800 में बेच दिया था। उसके बाद बुधिया वहां से निकलकर भुवनेश्वर तक पहुंच जाता है।

भुवनेश्वर में एक Judo Coach रहा करते थे। उनका नाम Biranchi Das था। बुधिया किसी तरीके से Biranchi Das तक पहुंच जाता है। बिरंचि दास कहते हैं कि चलो इस बच्चे को भी और बच्चों की तरह ट्रेनिंग देते हैं।

क्योंकि बुधिया बच्चा था और बच्चे शरारत करते हैं। बुधिया दूसरों बच्चों के साथ शरारत करता और उनको तंग किया करता। कई बच्चे उसकी शिकायत करते थे।

एक दिन जब बच्चों ने शिकायत की तो ब्रंची दास को गुस्सा आ गया। उन्होंने बुधिया को सजा देने के लिए कहा कि तुम ग्राउंड में जाकर दौड़ लगाओ। जब तक मैं ना कहूं तुम दौड़ते रहना।

यह कहकर Biranchi Das अपने किसी काम से चले गए। इसी काम में करीब 5 घंटे बीत गए। 5 घंटे के बाद जब Biranchi Das वापस आए। उनकी नजर जब ग्राउंड में पड़ी उन्होंने देखा कि की बुधिया अभी भी दौड़ रहा है। उसे देखकर वह हैरान रह गए। उन्होंने वहां खड़े हुए बच्चों से पूछा यह कब से दौड़ रहा है। बच्चों ने कहा कि जब से आपने कहा था। तकरीबन 5 घंटे हो गए यह जब से ही दौड़ रहा है।

बिरंचि दास ने पूछा कि यह रुका था। बच्चों ने कहा नहीं यह बगैर रुके ही दौड़ रहा है। बिरंचि दास को अजीब लगा कि एक छोटा सा बच्चा 5 घंटे से लगातार दौड़ रहा है। इस पर बिरंचि दास को अफसोस हुआ। उन्होंने बुधिया को बुलाकर उनसे बात की उन्होंने पूछा कि तुम्हें दौड़ते वक्त कुछ हुआ। बुधिया ने कहा मैं अभी भी दौड़ सकता हूं। तब उन्हें लगा कि यह अलग बच्चा है। जो दौड़ सकता है।

इसके बाद उन्होंने उसकी सलाहियत को उभारने की कोशिश की और कहा कि मैं इसको ट्रेनिंग दूंगा। यह एक बहुत अच्छा रनर बन सकता है। उसके बाद बिरंचि दास और उसकी बीवी ने बुधिया को गोदले लिया था। फिर उसको ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी। यह सब कुछ चलता रहा पहली बार 2006-07 में बुधिया को पूरे देश और दुनिया ने तब जाना जब बुधिया को पूरी ट्रेनिंग देने के बाद इस लायक बना दिया था।

Puri जो उड़ीसा में एक जगह है। वहां के जगन्नाथ मंदिर से लेकर उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर तक एक मैराथन दौड़ रखी गई। जिसको CRPF ने स्पॉन्सर किया था।

बाकायदा मीडिया भी वहां पहुंची थी। बुधिया का हौसला बढ़ाने के लिए सीआरपीएफ के जवान भी दौड़े थे। करीब 67 किलोमीटर की दूरी पूरी से भुवनेश्वर की थी।

बुधिया ने यह 67 किलोमीटर की दूरी साडे 7 घंटे में पूरी कर दी। बिना रुके यह दौड़ पूरी की थी। इसके बाद वह भुवनेश्वर पहुंचता है। Limca Book of Records के कुछ नुमाइंदे भी वहां मौजूद थे। उन्होंने देखा और उसके बाद Limca Book of Records में बुधिया का नाम आया।

इसके बाद बुधिया हर अखबार और टीवी पर छा गया। बुधिया के साथ-साथ ब्रंची दास का भी नाम होने लगा। इसके बाद जब लोगों को पता चला कि बुधिया एक गरीब बच्चा है। जिसे बेच दिया गया था तो उसकी मदद के लिए काफी पैसा बाहर विदेश से और देश से भी आने लगा। इस पर लोगों ने ब्रंची दास पर उंगली उठाई थी। वह इस पैसों का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं और अपने लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। कुछ लोगों ने ब्रंची दास पर यह भी इल्जाम लगाया था कि वह बाल शोषण कर रहे हैं।

इसके बाद बुधिया के मां-बाप को भी पता चल गया था कि बुधिया के पास काफी पैसा आ गया है। उन्होंने बिरंचि दास के खिलाफ मुकदमा भी कर दिया था। मगर 7 दिन के बाद बिरंचि दास को रिहा कर दिया गया। फिर उन्होंने बुधिया को ट्रेनिंग देने का सिलसिला शुरू कर दिया।

इसी बीच दूसरी कहानी शुरू होती है। लंदन से आई एक Leslie Tripathy जो काफी खूबसूरत थी। वह भुवनेश्वर पहुंच जाती है। वह वहां की म्यूजिक एल्बम में काम करना शुरू कर देती है। धीरे-धीरे उसका म्यूजिक एल्बम हिट हो जाता है। दर्जनों म्यूजिक एल्बम उसके आ चुके थे। जब उसे शोहरत मिलती है तो उसको उड़ीसा की फिल्मों में भी किरदार अदा करने का मौका मिलता है। इसके बाद वह एक हीरोइन बन जाती है और कई फिल्मों में काम करती है।

Budhia coach Biranchi Das murder
Leslie Tripathy

एक वक्त आया कि Leslie Tripathy का इरादा बॉलीवुड में काम करने का बन गया। उसने सोचा कि अब वह बॉलीवुड की हिंदी फिल्मों में काम करेगी।

बिरंचि दास भी बुधिया के साथ काफी मशहूर हो चुका था। इधर Leslie भी काफी फेमस हो गई थी। यह दोनों काफी जगह मिल चुके थे। इनमें दोस्ती हो चुकी थी।

इसी दौरान में एक फंक्शन था जो जेल में रखा गया था। वह कैदियों के लिए रखा गया था। Leslie पहली बार एक जेल में जाती है। वह प्रोग्राम किसी NGO ने रखा था। Leslie वहां जाकर कई कैदियों से मिलती है।

वहां पर एक कैदी से उसकी मुलाकात होती है। उसका नाम राजा आचार्य था। राजा आचार्य एक बड़ा बिल्डर था। बिल्डर होने के साथ-साथ वह 1 क्रिमिनल था। 30 से ज्यादा उसके ऊपर मुकदमे थे। उसके ऊपर क़त्ल का मुकदमा भी था। मगर तब तक किसी मुक़दमे में सजा नहीं हुई थी। उस पर सिर्फ यह आरोप थे।

Leslie कि जब राजा आचार्य से मुलाकात होती है। राजा आचार्य पहले ही मुलाकात से दिल दे बैठता है। उससे प्यार करने लगता है। इसके बाद वह जमानत पर जेल से बाहर आ जाता है। बाहर आते ही वह Leslie से जाकर मिलता है। उसको मैसेज करना और फोन करना शुरू कर देता।

क्योंकि राजा एक अमीर आदमी था। एक डॉन किसम का आदमी भी था। उसने Leslie को तरह-तरह के गिफ्ट देने शुरू कर दिए। एक वक्त ऐसा आया कि उसने Leslie से शादी करने का इरादा कर लिया। मगर Leslie ने इंकार कर दिया। उसने कहा कि उसने राजा से कभी प्यार किया ही नहीं।

राजा आचार्य ने इल्जाम लगाया की म्यूजिक एल्बम मैं मैंने इसकी बहुत मदद की है। जो इसकी म्यूजिक एल्बम हिट हुई है। उसमें मेरा काफी पैसा लगा है। अब यह काफी फेमस हो गई तो यह मुझे ठुकरा रही है।

इस दौरान में एक IAS अफसर थे। Leslie की उनसे जान पहचान थी। Leslie ने उनसे संपर्क किया और कहा कि राजा अचार्य नाम का एक शख्स है। जो मेरे पीछे पड़ा हुआ है। उन्होंने कुछ लोगों के जरिए राजा आचार्य को मैसेज भेजा कि तुम Leslie का पीछा छोड़ दो वरना अंजाम बहुत बुरा होगा।

राजा अब उस IAS अफसर का भी दुश्मन हो चुका था। वह लगातार Leslie से शादी की जिद पर अड़ा हुआ था। इसके बाद Biranchi Das Leslie से मिलते हैं। Leslie उनसे कहती हैं कि यहां का गुंडा है राजा आचार्य जो मेरे पीछे पड़ा हुआ है। जबरदस्ती में मुझसे शादी करना चाहता है। आप यहां के काकी पहुंचे हुए आदमी हो तो आप उससे मेरा पीछा छुड़ा दे।

बिरंचि दास ने Leslie से वादा किया कि मैं इसमें आपकी काफी मदद करूंगा। बिरंचि दास ने लोगों के जरिए राजा आचार्य को मैसेज भेजा कि तुम Leslie का पीछा छोड़ दो। वह एक शरीफ लड़की है। तुम किसी और से शादी कर लो। राजा को लगा कि यह मेरे और Leslie के बीच में आ रहा है। वह उसका भी दुश्मन बन गया।

इस बीच बिरंचि दास ने राजा को धमकाया भी था। अब राज आचार्य को लगने लगा कि हमारे दोनों के बीच का कांटा है। अब राज आचार्य बिरंचि दास का दुश्मन बन चुका था। उसने बिरंचि दास को रास्ते से हटाने का इरादा कर लिया था।

13 अप्रैल 2008 को भुवनेश्वर में कोचिंग सेंटर में एक फंक्शन चल रहा था। वहां पर एक शख्स आता है। वह नजदीक जाकर बिरंचि दास से बात करता है। फिर उनको गोली मार देता है। एक साथ कई गोली मारकर वह वहां से भाग जाता है।

जब उनकी लाश को अस्पताल ले जाया गया तो वहां पर उनको मुर्दा करार दे दिया गया। उनकी मौत हो चुकी थी। इसके बाद पुलिस छानबीन शुरु कर देती है। इसी दौरान पुलिस को एक ऑडियो कॉल मिलता है। इस कॉल में राजा आचार्य ने किसी को फोन पर कहा था कि मैं जोड़ो कोचिंग सेंटर में बंसी दास को इतनी गोली मारूंगा वह बचेगा नहीं।

यह बात क़त्ल से लगभग 48 घंटे पहले की थी। इस दौरान में पुलिस काफी छानबीन कर रही थी। अब इसमें कई मोड़ सामने आ जाते हैं, कि बिरंचि दास और Leslie का कोई ताल्लुक तो नहीं था। दूसरा यह कि वह IAS जिसने राजा आचार्य को धमकाया था। उसका तो कहीं Leslie इसे कोई ताल्लुक नहीं था। अब यह कई मोड़ सामने आ गए थे।

इसी दौरान जिस शख्स ने गोली मारी थी। उसकी पहचान जगाला के नाम से हुई थी। यह राजा आचार्य का साथी माना जाता था। अब पुलिस ने तलाश शुरू कर दी। लेकिन कोई हाथ नहीं लग रहा था। लगभग 13 दिन ब्रंची दास के क़त्ल को हो चुके थे।

अचानक 13 दिन के बाद भोपाल के एक न्यूज़ ऑफिस में जगाला पहुंच जाता है। वह वहां जाकर कहता है, कि मैं अपने आप को सरेंडर करना चाहता हूं। उसके गिरफ्तारी से पहले उसका इंटरव्यू ले लिया जाता है। वह अपने इंटरव्यू में कहता है कि मैंने ब्रंची दास को मारा है। मगर उनको मारने की 10 लाख की सुपारी मुझे Leslie Tripathy ने दी थी। अब यह एक नया मोड़ स्वामी आ गया था।

इसके बाद उड़ीसा की पुलिस जगाला को भोपाल से उड़ीसा ले जाती है। वहां पूछताछ की जाती है। इस कत्ल के बाद राजा आचार्य भी गायब हो चुका था। पुलिस इस को ढूंढ रही थी। 5 मई 2008 को गोवा की राजधानी यह वहां पर छुपा हुआ था। राजा आचार्य गोवा पुलिस के सामने सरेंडर कर देता है।

उड़ीसा की पुलिस राजा आचार्य को गोवा से भुवनेश्वर ले आती है। इन दोनों से पूछताछ होती है। इसके बाद यह कहानी सामने आती है। जगाला ने जो न्यूज़ चैनल के इंटरव्यू में कहा था वह सब झूठ था। Leslie ने उसको कोई सुपारी नहीं दी थी। बल्कि राजा आचार्य ने ही जगाला को कत्ल करने के लिए भेजा था। जगाला ने ही ब्रंची दास का गोली मारी थी। वह भी इसलिए कि ब्रंची दास लगातार आचार्य को Leslie से दूर रहने के लिए बोल रहे थे।

इसके बाद इनका मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में पहुंच जाता है। फास्ट ट्रैक कोर्ट दिसंबर 2010 में अपना फैसला सुनाती है। अदालत राजा आचार्य और उसके साथी जगाला को उम्र कैद की सजा दे देती है। इस सजा को राजा आचार्य हाई कोर्ट में चैलेंज कर देता है।

मगर हाई कोर्ट फैसला सुनाने में काफी वक्त ले लेती है। इसके बाद राजा आचार्य सुप्रीम कोर्ट चला जाता है। यह वहां पर जमानत की अपील करता है। क्योंकि हाईकोर्ट से इसकी जमानत खारिज हो चुकी थी।

सुप्रीम कोर्ट यह सोचकर राजा आचार्य को जमानत दे देती है कि अभी हाई कोर्ट से कोई फैसला नहीं आया है। 2017 को ये रिहा हो जाता है। इसके बाद Leslie और बिरंजी दास की पत्नी कहती है कि उनकी जान को खतरा है। क्योंकि वह इस क़त्ल के मैन गवाह थी। इसके बाद पुलिस उन्हें प्रोटक्शन दे देती है।

राजा आचार्य का मामला अभी भी हाईकोर्ट में लटका हुआ है। वह जमानत पर बाहर है। इसके बाद जो भी अपडेट आएगा वह आपको मिल जाएगा।

अब दूसरी तरफ आते हैं-

बुधिया की तरफ रुख करते है। क्योंकि Biranchi Das दूधिया के कोच थे और उसको गोद भी लिया था। क्योंकि ब्रंची दास की मौत हो चुकी थी तो उड़ीसा की जो सरकार है। वह बुधिया का तमाम खर्च उठाना शुरू कर देती है। उसको एक इंग्लिश मीडियम में एडमिशन मिल जाता है। उसको अच्छी तालीम दी जाती इसके बाद वह कॉलेज पहुंच जाता है। अब उसके बारे में कोई ताजा status नहीं है। जैसा status सामने आएगा आपको बता दिया जाएगा।

एक ऐसी कहानी जिसे लोग World Biggest Bank Robbery के नाम से जानते है। मगर हकीकत कुछ और ही है। बैंक में इतने रुपए थे। उन के लिए तीन बड़े-बड़े ट्रक को वह अपने साथ लेकर गए थे। करीब 5 घंटे बैंक के अंदर से रुपए निकालने और ट्रक में लोड करने में लगते हैं। 5 घंटे के बाद पता चलता है। इस बैंक से करीब 8 हजार करोड़ रुपए निकले है।

यह कहानी इराक की है। इराक की राजधानी बगदाद की यह कहानी है। सन 2000 के बाद इराक में उथल-पुथल शुरू हो चुका था। परमाणु बम और जैविक हथियार को लेकर अमेरिका लगातार इराक पर दबाव डाल रहा था। हालांकि असल खेल तेल का था। अमेरिका चाहता था कि सद्दाम हुसैन उसकी बात माने। मगर सद्दाम हुसैन अमेरिका की शर्त को मानने के लिए तैयार नहीं था। इन चीजों को लेकर अमेरिका और इराक में ठन गई थी। अमेरिका का इल्जाम था। इराक परमाणु बम बना रहा है। इसको लेकर बड़े दबाव थे। कई बार तलाशी हुई मगर इराक के पास से कभी कोई परमाणु बम नहीं मिला। मगर उसी की आड़ में अमेरिका ने इराक पर हमला करने का फैसला कर लिया था।

यह बात 2003 की है। इससे पहले इराक में जो मॉनिटरिंग सिस्टम था। यानी बैंक का जितना भी सिस्टम था। वह ब्रिटिश से जुड़ा हुआ था। उन्हीं के जरिए सब कुछ चला करता था। मगर बाद मे इराक का अपना बैंक सिस्टम बना। यह सिस्टम सद्दाम हुसैन के आने के बाद बना था। उसकी नई तरीके से सभी चीजें की गई।

इसके बाद इराकी सरकार के अंडर में वहां के बैंक आ गए। उन्हीं में से एक सेंट्रल बैंक ऑफ इराक जो इराक की सरकार का मैन बैंक था। यह सेंट्रल बैंक ऑफ इराक की कहानी है। सद्दाम हुसैन का अहसास था। अमेरिका उस पर हमला जरूर करेगा। इसीलिए दोनों मुल्कों में अपनी-अपनी तैयारियां चल रही थी।

सद्दाम हुसैन को इस बात का भी अहसास था। अगर हमला होता है। मगर उस वक्त तक यह अहसास नहीं था। किस तरीके का हमला हो सकता है। सद्दाम हुसैन ने सोचा कि अगर इराक की अमेरिका के साथ लड़ाई होती है। जो इराक का पैसा है। वह किसी महफूज जगह पर रखा जाए। लेकिन यह दूसरी बात है।

world biggest bank robbery
Qusay Saddam Hussein

असल में कहानी 18 मार्च 2003 को शुरू होती है।  18 मार्च की सुबह ठीक 4:00 बजे सद्दाम हुसैन का बेटा। जिसका नाम Qusay Hussein था। वहां का डिफेंस जनरल था। उसका हेड भी था। सद्दाम के दो बेटे थे। जिनमें से एक Qusay Hussein था। 18 मार्च की सुबह 4:00 बजे सद्दाम हुसैन के पर्सनल सेक्रेटरी आबिद आबिद महमूद के साथ अपने घर से निकलता है। वह सेंट्रल बैंक ऑफ इराक जाने के लिए निकलता है।

जिसका मुख्यालय बगदाद में था। जिसका तमाम खजाना बगदाद में ही था। सेंट्रल बैंक की एक खासियत थी। जहां पर तमाम पैसे रखे हुए थे। इसकी बिल्डिंग क्यूब की तरह बनी हुई थी। इस पूरी बिल्डिंग में कोई भी खिड़की नहीं थी। इस पूरी बिल्डिंग में कोई दूसरा दरवाजा नहीं था। इस बैंक में अंदर जाने और बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता था। इसका मतलब यह था कि अगर कोई इस पर हमला करता है। उसका वहां से निकलना लगभग नामुमकिन था। लेकिन 18 मार्च 2003 की सुबह वहां पर Qusay Saddam Hussein पहुंचते हैं।

साथ में सद्दाम हुसैन का पर्सनल सेक्रेटरी था। इसके बाद उस बैंक के अंदर सिर्फ तीन लोग और थे। जिनमें से एक सेंट्रल बैंक ऑफ इराक के डायरेक्टर थे। एक इराक के फाइनेंस मिनिस्टर थे। एक इराकी खजाने के डायरेक्टर थे। कुल मिलाकर यह पांच लोग थे। बैंक में जाने के बाद जो सद्दाम हुसैन का P.A. था। वह डायरेक्टर को एक खत देता है। जिसमें सिर्फ दो लाइन लिखी हुई थी। वो लाइने यह थी। इस बैंक में जो पैसे हैं। उसको किसी दूसरे महफूज ठिकाने पर लेकर जाना है। ये नेशनल सिक्योरिटी का इशू है। बस यही दो लाइनें थी।

सेंट्रल बैंक ऑफ इराक के Head ने इस पर्चे को पढ़ा। पढ़ने के बाद कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचाता। वह इस लिए कि क्योंकि बैंक हुक्मरान ही जब दस्तखत करके भेज रहा है। अब उनके पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था।

इसके बाद देखा गया। Qusay Hussein जब बैंक के अंदर पहुंचे। उनके साथ तीन बड़े-बड़े ट्रक भी आए थे। उन तीन ट्रकों में तीनों ड्राइवर थे। इसके अलावा और कोई नहीं था।

इसके बाद बैंक के स्टाफ से कहा गया। जितनी जल्दी हो सके सभी पैसे निकाल ले। इसके बाद बैग में भर-भर कर पैसे निकालने शुरू कर दिए। जो पैसे बैंक के अंदर से एक-एक करके ट्रक में डालने शुरू कर दिए। रकम इतनी ज्यादा थी करीब 5 घंटे लगे थे। पैसों को ट्रक में लोड करने में। जब ट्रक में पैसे रखने की जगह नहीं बची। काफी पैसे बैंक में ही छोड़ने पड़े थे। Qusay Hussein पैसे लेकर निकल जाता है।

वहां से पैसा निकालने के कुछ घंटों बाद अमेरिका का पहला मिसाइल बगदाद पर गिरता है। जंग शुरू हो जाती है। अमेरिका की फौज जब तक इराक में पहुंचती है। जो सद्दाम हुसैन के दुश्मन थे। उनके जरिए अमेरिका को पता चलता है। जो इराक का सेंट्रल बैंक है। उसके बाहर तीन ट्रक देखे गए हैं। उन ट्रकों में बैग भर-भर के पैसा ले जाया गया है। उस वक्त सद्दाम हुसैन का बेटा Qusay Hussein बैंक में मौजूद था।

अमेरिका लगातार इराक पर हमला कर रहा था। कुछ वक्त के बाद अमेरिका का सेंट्रल बैंक ऑफ इराक पर भी कब्जा हो गया। इसके बाद सद्दाम हुसैन के जो दुश्मन थे। उनसे पूछताछ की गई। पता चला कि करीब 1 बिलियन डॉलर और यूरो इस बैंक से अमेरिका के हमला करने से कुछ देर पहले निकाल कर ले जाया गया है। अब ट्रक आखिरकार कहां गए। इन तीन ट्रकों की तफ्तीश की गई।

यह खबर है, कि यह सद्दाम हुसैन के खुफिया ठिकानों की तरफ गए हैं। लेकिन कुछ पुख्ता तौर पर आया कि यह सीरिया के बॉर्डर की तरफ जाते हुए देखे गए हैं। सीरिया में भी सद्दाम हुसैन के अच्छे ताल्लुक हैं। यह माना गया कि सीरिया के बॉर्डर के जरिए। इन पैसों को बाहर ले जाया गया है। इसके बाद अमेरिका ने एक-एक करके ठिकानों पर हमला करना शुरू कर दिया।

जब सद्दाम हुसैन के महल पर हमला किया गया। उनके घर पर कुछ पैसे मिले। शायद लगा कि यह उसी बैंक के पैसे हैं। मगर बाद में पता चला कि सद्दाम हुसैन के दूसरे बेटे को कैश रखने का शौक है। यह बैंक के पैसे नहीं थे। सद्दाम हुसैन के अपने पैसे थे। इसके अलावा दो तीन जगह से और पैसे मिले। बहुत सारे पैसे जनता के पास मिले। अमेरिकी फौजियों ने वहां की अवाम से लूटपाट शुरू कर दी थी।

अलग-अलग स्थानों से पैसे तो मिले पर यह पुख्ता सबूत नहीं था। यह वही पैसे है। जो बैंक से निकाले गए थे। शायद यह भी हो सकता है, कि सद्दाम हुसैन के बेटों के अपने पैसे हो।

एक बात यह भी सामने आई थी। सद्दाम हुसैन ने यह पैसे इसलिए निकाले थे। जिस वक्त अमेरिका से लड़ाई होगी। उस वक्त यह पैसा इराक के काम आएगा। दूसरी बात यह थी। सद्दाम हुसैन को एहसास हो गया था कि अगर अमेरिका हमला करता है। अमेरिका से जीतना मुश्किल है। जो अभी सरकारी खजाने में है, उसको लेकर यहां से निकला जाए।

अमेरिका के इस हमले में सद्दाम हुसैन के दोनों बेटे मारे गए। तकरीबन 8 महीनों के बाद सद्दाम हुसैन एक बनकर से गिरफ्तार कर लिए जाते हैं। उसके बाद उनको फांसी हो गई।

कुछ लोग कहते हैं, कि यह पैसा अमेरिका की फौज के हाथों में पहुंच गया। उन्होंने यह पैसा छुपा लिया था। क्योंकि रकम बहुत बड़ी थी। उन्होंने इस बात को किसी से नहीं बताया था। कुछ लोग यह भी कहते हैं। वह पैसा सद्दाम हुसैन के परिवार तक पहुंचा दिया गया था। क्योंकि एक साथ तमाम पैसा बरामद नहीं हुआ था। इसीलिए कोई पुख्ता सबूत किसी के पास नहीं था। यह पैसा आखिरकार कहां गया। इस बात का कुछ पता नहीं चला कि किसके पास कितना पैसा पहुंचा है।

कुछ लोग तो इसे World biggest bank robbery के तौर पर मानते हैं। मगर सद्दाम हुसैन ने यह पैसा इराक की जनता के लिए वहां से निकाला था। इत्तेफाक से अमेरिका ने वहां पर हमला कर दिया था। इसलिए इसको बैंक डकैती कहना भी मुनासिब नहीं है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है। इसे World biggest bank robbery के नाम पर माना गया। जो उस सेंट्रल बैंक ऑफ इराक के नाम पर है।

अमेरिका ने इसे World Biggest Bank Robbery का नाम दे दिया। मगर यह कहना मुश्किल है, कि सद्दाम हुसैन के बैठो ने पैसा चोरी किया था। क्योंकि उस वक्त अमेरिका का खतरा था। हो सकता है, कि उन्होंने वह पैसा किसी सुरक्षित जगह पर पहुंचाने के लिए निकाला हो। उनका ख्याल हो कि ये पैसा अमेरिका के साथ जंग में इराक के काम आएगा।

यह India के Youngest Serial Killer की कहानी है। सबसे छोटा सीरियल किलर जिसके नाम रिकॉर्ड दर्ज है। जिसे शायद पुलिस और अदालत के बारे में जानकारी नहीं थी। यहां तक की धारा 302 के बारे में भी जानकारी नहीं थी। ना इस बारे में सामने वाले का जो वो मार रहा है। उसकी जान जा रही है। जान लेना जुर्म है। उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। सबसे खतरनाक बात यह है। इस सीरियल किलर के हाथों जो पहले दो क़त्ल हुए थे। कुछ लोगों को उस राज का पता चल गया था। मगर उन्होंने इस राज को छुपा लिया। उन्होंने कहा कि यह परिवार का मामला है। शायद पहले ऐसा कभी नहीं हुआ होगा।

अमरजीत के बारे में-

बिहार में एक जगह बेगूसराय है। इसी बेगूसराय में एक परिवार रहता था। वह गरीब परिवार था। उस परिवार का जो आदमी था। वह मजदूरी करके परिवार का पेट भरा करता था। उसके दो बच्चे थे। जिनमें एक बेटा और एक बेटी थी। बेटी की उम्र तकरीबन 6 महीने ही थी। बेटा 1998 में पैदा हुआ था। बेटे का नाम अमरजीत था। अमरजीत धीरे-धीरे बड़ा होने लगता है। उसकी उम्र तकरीबन साढ़े सात से आठ साल की होगी।

एक दिन अचानक उसके परिवार में उसका कजन रहता था। जिसकी उम्र करीब 8 महीने थी। वहां से  उसकी लाश मिलती है। उसके सर पर किसी वजनी चीज से मारा गया था। जिससे उसका कत्ल किया गया था। परिवार के लोग देखते हैं, कि बच्चा मर चुका है।

इसी दौरान मां बाप को पता चल जाता है। अमरजीत थोड़ी देर पहले इस बच्चे के साथ था।उसके हाथ पर जिस तरह के निशान थे। उससे लग रहा था कि शायद उसने कुछ किया है। शक हो चुका था। मगर यह बात पुलिस तक नहीं जाती है। इस बात को घर वाले खुद ही दबा लेते हैं। बात रफा-दफा हो जाती है।

अमरजीत का दूसरा क़त्ल-

youngest serial killer in india
Amarjeet In 8 Years

करीब 6 महीने बीतने के बाद अमरजीत के अपने ही घर में जो उसकी छोटी बहन थी। जिसकी उम्र तकरीबन 6 महीने थी। उसकी लाश मिलती है। उसके भी सर पर जख्म थे। उसके सर को भी पत्थर से ही मारा गया था। इस बार भी घर वालों को पता चल जाता है। यह काम किसने किया है। अमरजीत के मां-बाप को पता चल जाता है। उनकी बेटी को उसी के भाई ने मारा है। मगर इसको भी परिवार का मामला मानते हुए कोई पुलिस के पास नहीं जाता।

उन्हें लगता है, कि बेटी तो मर गई। अगर बेटे के खिलाफ भी रिपोर्ट कर दी। वह भी पुलिस में चला जाएगा। इस दूसरे कत्ल के राज को भी घरवाले छुपा लेते हैं। 6 महीने के अंदर एक साढ़े सात साल का बच्चा दो कत्ल कर चुका था। किसी भी कानून को इस बारे में खबर नहीं लगती। शिवाय मां-बाप और चाचा के।

अमरजीत का तीसरा क़त्ल और India का Youngest Serial Killer बनना-

कुछ वक्त बीतने के बाद। तकरीबन 3 महीने के बाद। इन्हीं के गांव में कुछ दूरी पर एक और बच्ची थी। जिसकी उम्र 1 साल थी। उसका नाम खुशबू था। खुशबू अपनी मां के साथ एक प्राइमरी स्कूल में खुले में लेटे हुए थी। कुछ देर के बाद माँ घर के किसी जरूरी काम से बेटी को वही छोड़ कर चली जाती है। वह सोचती है, कि कुछ देर में तो वह वापस आ जाएगी। उसके जाने के दौरान में ही वह देखती है। अमरजीत स्कूल के पास में ही है। वह यह देख कर चली जाती है। वह अमरजीत को नजरअंदाज कर देती है।

कुछ देर के बाद जब वह वापस लौटती है। वह देखती है, कि जहां पर वह अपनी बच्ची को लेटा कर गई थी। वह वहां पर नहीं थी। स्कूल के आसपास में देखती है। वह कहीं नहीं मिलती। वह जब अमरजीत से पूछती है। अमरजीत हंसता रहता है। वो कुछ नहीं बताता। उसके बाद वह चारों तरफ देखती है। उसके बाद घरवालों को बताती है। घर वाले सब मिलकर उसको ढूंढ रहे थे। पर खुशबू का पता नहीं चलता।

अब उस स्कूल के पास अगर किसी को देखा था। वह अमरजीत था। उसे लगा कि जब हो गई थी तो खुशबू के पास अमरजीत था। उसके सिवा वहां कोई और नहीं था। जब सब जगह देख लिया। खुशबू नहीं मिली। खुशबू के घर वाले पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखवा देते हैं।

रिपोर्ट लिखवाने के बाद वह घर आ जाते हैं। पुलिस को जो पहले दो कत्ल हुए थे। उनके बारे में पता तो था मगर यह नहीं पता चला था। यह कत्ल किसने किए थे। क्योंकि उनके कत्ल की उनके घर वालों ने पुलिस में रिपोर्ट ही नहीं लिखवाई थी।

पुलिस को उड़ते-उड़ते  खबर तो मिल ही गई थी। यहां पहले भी तो बच्चों का कत्ल हो चुका है। लोग दहशत में हैं। अब यह तीसरी बच्ची गायब है। कहीं इसके साथ भी कुछ अनहोनी ना हो जाए। उससे मामला और भी बिगड़ जाए। पुलिस ने सतर्कता दिखाई। फौरन खुशबू को तलाश करने में लग गई।

अमरजीत पर क़त्ल का शक-

खुशबू की मां ने पुलिस को बताया कि मुझे अमरजीत पर पूरा शक है। क्योंकि इसके अलावा वहां पर कोई और मौजूद नहीं था। पुलिस वाले ने शुरू में तो हल्के में लिया। एक 8 साल का बच्चा क्या बताएगा। जब खुशबू की मां ने ज्यादा दबाव दिया। पुलिस ने सोचा चलो इनकी दिल की तसल्ली के लिए अमरजीत को बुलाकर भी पूछताछ कर लेते हैं। इसके बाद पहली बार पुलिस अमरजीत के पास जाती है।

अमरजीत लगातार पुलिस वालों के सामने हंस रहा था। सिर्फ हंसता ही जा रहा था। शायद उसे मालूम नहीं था। पुलिस क्या है। पुलिस वालों के भी अजीब लग रहा था। अमरजीत से पूछ रहे थे कि तुमने खुशबू को कहीं देखा है। अमरजीत हंसता ही जा रहा था। कुछ बता नहीं रहा था। उसने फिर अचानक पुलिस वालों से कहा कि मुझे अगर बिस्कुट दोगे तो मैं बताऊंगा।

क़त्ल का राज खुलना-

पुलिस को इस बारे में अंदाजा भी नहीं था। इसलिए पुलिस ने सोचा कि चलो इसको बिस्कुट तो दे ही देते हैं। हो सकता है यह कुछ बता ही दें। पुलिस ने गांव के किसी आदमी को भेजकर अमरजीत के लिए बिस्कुट मंगवा लिए। इसके बाद पुलिस वाले ने उस बच्चे को बिस्कुट दिया। अमरजीत ने बिस्कुट का पैकेट खोलकर बिस्कुट खा लिए। फिर पुलिस वालों ने पूछा कि अब बताओ। अमरजीत बिस्कुट खाने के बाद हंसा। फिर बोला कि मैंने उसे खपरैल से मारकर सुला दिया। पुलिस वालों को समझ नहीं आया। उन्होंने पूछा कि कहां सुलाया।

पुलिस वालों को भी मजाक लग रहा था। उन्होंने फिर पूछा कि सही बताओ क्या किया। अमरजीत ने कहा कि मैंने खपरैल से मारा और सुला दिया। फिर पुलिस वालों ने पूछा कहां सुलाया। उसने कहा मुझे बिस्किट खिलाओ। पुलिस वालों ने फिर बिस्किट मंगाए। उसको बिस्कुट दिए। बिस्कुट खाने के बाद वह बोला कि चलो मैं दिखाता हूं। मैंने खुशबू को कहां सुलाया है। अब पुलिस पीछे-पीछे थी और बच्चा आगे आगे था।

अब जहां पर खुशबू की मां उसको छोड़ कर आई थी। उसी स्कूल के पास खेत में कुछ झाड़ियां थी। अमरजीत वहां तक गया। झाड़ी के पास जाकर रुक गया। उसने कहा मैंने खुशबू को यहां सुलाया है। पुलिस वाले आगे बढ़े। उन्होंने देखा कि एक छोटा सा गड्ढा है। उस गड्ढे के ऊपर कुछ पत्ते रखे हुए थे।

पुलिस को खुशबू की लाश मिलना-

पुलिस ने जैसे ही बस गड्ढे के ऊपर से वह झाड़ हटाए तो देखा अंदर खुशबू की लाश है। जब पुलिस खुशबू की लाश देखती है। उनके पैरों तले जमीन निकल जाती है। वह सोचते हैं, कि एक बच्चा जो हंसते ही जा रहा है। बिस्कुट मांग रहा है। कहता है, कि मैंने खपरैल से मारकर सुला दिया। मौका ए वारदात पर खुद लेकर गया था। लाश की बरामद कराता है। अब पुलिस वाले बच्चे को देख रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें।

अब पुलिस को खुशबू की लाश मिल गई थी। क्योंकि खुशबू की लाश मिलने की वजह वह बच्चा था। पुलिस को यकीन हो गया था। शायद खुशबू का कत्ल इस अमरजीत ने किया है।

अप पुलिस वाले उससे फिर पूछते हैं। तूने और किस-किस को खपरैल मारकर सुलाया है। तब उसने 2 नाम और लिए। एक अपनी बहन का और एक अपने चाचा के लड़के का। अमरजीत ने कहा मैंने उन दोनों को भी ऐसे ही मार कर सुलाया था।

जो पहले दो कत्ल हुए थे। पुलिस वाले अब उनके परिवार को बुलाते हैं। अमरजीत के मां बाप पहले से ही पुलिस थाने में थे। क्योंकि उनके बेटे से पूछताछ हो रही थी। उसके चाचा को बुलाया जाता है। तब वह पूरी कहानी बताते हैं। करीब 6 और 9 महीने पहले इसने सबसे पहला क़त्ल अपने चाचा के लड़के का किया था। क्योंकि यह घर का मामला था। इसीलिए हमने किसी को बताया नहीं था। दूसरा का दिल इसने अपनी सगी बहन का किया था। जो 6 महीने की थी। हमें यह भी पता था मगर परिवार का मामला होते हुए हमने किसी को नहीं बताया था।

अब पुलिस उस बच्चे से उसी के तरीके से पूछताछ कर रही थी। पुलिस ने पूछा आखिरकार तुमने इन सबको क्यों सुलाया था। अमरजीत ने कहा कि मुझे मजा आता है। उसने कहा कि जब यह डरते हैं और जखम दिखता है। मुझे बहुत अच्छा लगता है। अब यह सारी चीज सुनने के बाद पुलिस को भी लगा कि यह बच्चा नॉर्मल नहीं है। इसके बाद उसकी जांच कराई गई। जांच में पता चला कि इस बच्चे का दिमाग सही नहीं है। उसमें कुछ कमी है।

बच्चे के बारे में मेडिकल रिपोर्ट-

जो मेडिकल रिपोर्ट आई थी। उसमें यह आया था। इस बच्चे के अंदर किसी को तकलीफ में देखना किसी को मुसीबत में देखना और किसी को दर्द में चिल्लाना उसका देखना उसको मजा देता था। क्योंकि इसे मजा आता था। इसलिए यह बच्चा उनको तकलीफ देता था। दिल्ली के AIMS के डॉक्टरों ने भी इस बच्चे की जांच की थी। पटना के तमाम एक्सपर्ट है। उन्होंने भी इसकी जांच की। फिर पता चला कि इस बच्चे के अंदर दिमागी रूप से एक बीमारी है। जिसमें अपने सामने अपने से कम उम्र बच्चों को जब यह देखता है, कि वह रो रहे हैं। उनके जिस्म से खून निकलता है। उसको बड़ा सुकून मिलता है।

पता करने से यह भी पता चला था। यह पहले से ही गुमसुम रहता है। इसको दूसरों को तकलीफ में देखने से मजा आता है। यहां तक कि जब पुलिस वाले उसे पूछताछ कर रहे थे। वह हंस रहा था।इसमें भी उसे मजा आ रहा था। क्योंकि उससे उस बारे में पता कर रहे थे। जिस काम में उसे मजा आया था। फिर मेडिकल टीम की रिपोर्ट आई। इसका दिमागी संतुलन सही नहीं है। इसने एक साथ तीन क़त्ल किये।

 India के Youngest Serial Killer के बारे में अदालत का फैसला-

अब कानून यह कहता है। इस बच्चे की उम्र सिर्फ 8 साल है। यह बालिग नहीं था। अब पुलिस को यह था कि अगर इसे किसी दूसरे बच्चों के साथ रखेंगे। उन बच्चों की जान को भी खतरा है। इसी वजह से पुलिस ने अदालत से दरख्वास्त की और कहा कि इसको किसी अलग कमरे में रखा जाए। इसका दिमाग सही करने के लिए इलाज किया जाए। अदालत के कहने पर उसके लिए एक अलग कमरा तैयार किया गया। उसको वहां निगरानी में रखा गया। यह कहीं  फिर कोई कांड ना कर दे।

इसके बाद एक मेडिकल रिपोर्ट और आई थी। इसको कत्ल करना सही या गलत का पता नहीं  था।  इसलिए उसे कत्ल करना कोई गलत काम नहीं लग रहा था। इसीलिए उसे मज़ा आ रहा था।

3 साल से ज्यादा उसका कैद में नहीं रख सकते थे। लेकिन इस बच्चे की दिमागी हालत को देखते हुए काफी बहस हुई। कहा गया कि अगर 3 साल के बाद उसको छोड़ दिया गया। यह अपनी खुशी के लिए और भी कत्ल कर दे। तीसरी बात यह थी कि जब वह बाहर आएगा। लोग उसको किलर के नाम से बुलाएंगे। वह वैसे ही गुस्से में बेकार हो जाएगा। हो सकता है वह किसी का कत्ल ही कर दे।

इसको मिनी किलर के नाम से तो लोग बुलाने ही लगे थे। आखिर में फिर यह हुआ की 18 साल पूरे होने तक इसको डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया। यह रिपोर्ट गोपनीय  थी। कहते हैं, कि 2015 में इसको वहां से छोड़ दिया गया। उसके बाद यह कहां है। किसी को मालूम नहीं है। अब यह एक नए नाम के साथ और एक नई पहचान के साथ रह रहा है। यह एक गोपनीय रखा गया है। क्योंकि अगर इस बारे में किसी को पता चल गया तो फिर वहां पर भी दहशत बैठ जाएगी। इस तरह India के Youngest Serial Killer में अमरजीत का नाम दर्ज हो गया।

इंग्लैंड जैसी जगह पर जहां की पुलिस काफी अच्छी मानी जाती है। वहां पर एक क्राइम होता है। क्राइम होने के बाद जो मुजरिम है। इस देश को छोड़ कर भाग जाता है। वह किसी दूसरे देश में पहुंच जाता है। पुलिस उसे पकड़ने की पूरी कोशिश करती है। मगर पकड़ नहीं पाती। काफी वक्त बीत गया था। आखिर में मां-बाप यह फैसला करते हैं। वह अपनी बच्ची के गुनहगार को पकड़ने के लिए खुद उस देश में जाएंगे। वहां के लोगों से और पुलिस से मदद मांगेंगे। उनका यह फैसला कितना सही साबित होता है। ये Hannah Foster Murder की कहानी है।

ये बात 14 March 2003 की है। यह कहानी इंग्लैंड में एक जगह की है। यह कहानी है 17 साल की एक छात्रा Hannah Foster मेडिसिन की पढ़ाई करना चाहती थी। जो अभी एक स्कूल में थी। जो एक ब्राइट स्टूडेंट थी।

14 मार्च 2003 को Hannah Foster अपने दोस्तों के साथ पार्टी के लिए निकली थी। पार्टी से निकलने के बाद रात करीब 10:50 पर उसका जो दोस्त था। वह बस पकड़कर अपने घर चला जाता है। Hannah Foster पैदल ही घर जाने का फैसला करती है। जहां पर वह पार्टी थी। वहां से Hannah Foster के घर की दूरी तकरीबन आधा किलोमीटर की थी। यहां से Hannah Foster निकल कर अपने घर की तरफ जाती है।

Hannah Foster Murder
Hannah Foster

मगर तभी एक सैंडविच वैन वहां पर पार्किंग में खड़ी थी। अचानक वैन का ड्राइवर देखता है। एक लड़की सड़क पर अकेले जा रही हैं। ड्राइवर ने काफी शराब पी रखी थी। जब लड़की उसके करीब आती है। वह लड़की को जबरदस्ती उठाकर वैन में डाल लेता है। Hannah को जान से मारने की धमकी देता है। इसके बाद वह वहां से वैन कहीं और खड़ी कर देता है।

इधर 15 मार्च की सुबह हाना की मां की आंख खुलती है। वह देखती है, कि Hannah Foster घर में नहीं है। वह उसको कॉल करती है। Hannah के पास रिंग जाती है।वो उठाती नहीं है। उसको को मैसेज करती है। पूछती है, कहां है। लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया।

यह आसपास में पूछते हैं। इसमें काफी वक्त गुजर जाता है। आखिर में सुबह 9:30 बजे Hannah Foster के पिता पुलिस स्टेशन में चले जाते हैं। वहां पर रिपोर्ट लिखवा देते हैं। उनकी बेटी रात से लापता है। पुलिस रिपोर्ट लिखने के बाद पुलिस Hannah Foster की छानबीन शुरु कर देती है। लेकिन कोई सुराग नहीं मिलता। 15 मार्च यूं ही बीत जाता है।

उसके बाद 16 मार्च को इसी शहर के बाहर एक बच्चा सड़क के किनारे झाड़ी में एक लाश देखता है। वह पुलिस को फोन करता है। पुलिस वहां पर पहुंच जाती है। पता चलता है कि यह लाश Hannah Foster की है।

अब Hannah Foster की लाश मिलते ही हड़कंप मच जाता है। जब पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आती है। पता चलता है, कि उसका रेप करके कत्ल कर दिया गया है। उसकी मौत गला दबाने से हुई है। पुलिस के ऊपर भी दबाव आ जाता है। वह इसकी तहकीकात शुरू करती है। आसपास के तमाम सीसीटीवी कैमरे चेक करती है। उस जगह के सीसीटीवी कैमरे चेक करती है। जहां पर आखरी बार Hannah Foster को Murder से पहले उसके दोस्तों ने छोड़ा था।

कैमरे से पुलिस को 7 गाड़ी जो वहां से गुजरी थी। उन पर शक हो जाता है। पुलिस छानबीन करती है। लेकिन कोई सुराग नहीं मिलता। इस दौरान वहां के क्राइम शो पर यह खबर आती है। वह पुलिस से मिली हुई खबर को दिखाता है। वह इन गाड़ियों के जो सीसीटीवी फुटेज थे उनको दिखाता है।

इत्तेफाक से उन गाड़ियों को देखकर जो एक एक कर्मचारी है। जल हॉट फूड में काम करता है। वह पहचान लेता है। वह कहता है, कि यह गाड़ी कल रात यहां से निकली थी। वह पुलिस को कॉल कर देता है। अब पुलिस उन 7 गाड़ियों में से 6 गाड़ियों को छोड़ देती है। जब पता किया गया कि इस गाड़ी को कौन चला रहा था। पता चलता है इस वैन के ड्राइवर का नाम Maninder Pal Singh Kohli है। जो एक भारतीय था। इंग्लैंड में 1993 से रह रहा था। वह एक तरीके से इंग्लैंड का नागरिक हो गया था।

अब Hannah Foster के Murder में मनिंदर पाल सिंह कोहली का पहली बार नाम सामने आता है। अभी तक छानबीन में 4 दिन निकल चुके थे। अगले दिन सुबह जब मनिंदर पाल सिंह कंपनी आता है। वह कहता है, कि उसके काफी दर्द है। वह आज काम नहीं कर पाएगा। उसको छुट्टी चाहिए। कंपनी उसके इस दर्द को देखते हुए छुट्टी दे देती है।

इसके बाद वह अपने एक साथी के पास जाता है। उससे कहता है, कि उसकी मां भारत में बहुत बीमार है। मुझे कुछ पैसे दे दो मुझे हवाई जहाज का टिकट खरीदना हैं। उसका दोस्त उसके लिए मना कर देता है। फिर यह वहां अपने घर जाता है। जहां पर इसने शादी की थी। इसके वहां पर दो बच्चे थे। जो इसकी वाइफ थी। वह ब्रिटिस्ट थी। यह वहां से अपने ससुर से मां की बीमारी के नाम पर पैसे ले लेता है।

18 मार्च 2003 को यह इंडिया चला आता है। भारत आने के बाद ही चंडीगढ़ जाता है। चंडीगढ़ से गायब हो जाता है। इसके बाद इसका कोई सुराग नहीं मिलता। अब पुलिस के सामने कई चीजें थी। जब उसकी वैन की पुलिस ने तलाशी ली। पुलिस को कुछ सबूत मिले। वहां पर पुलिस को Hannah Foster के बाल मिले। कुछ नमूने भी वहां से उठाए गए।

इसके बाद पुलिस मनिंदर पाल के घर जाती है। उसके बच्चों से डीएनए टेस्ट करती है। इन दोनों का डीएनए मैच कर जाता है। अब सबूत पुख्ता हो गया था। उस वैन में उस वक्त मनिंदर पाल था।

इसी दौरान में पुलिस को एक और चीज पता चलती है। 14 मार्च 2003 को जब यह वाक्य हुआ। वहां के Emergency नंबर पर एक कॉल आई थी। जो 50 सेकंड तक चली। यह कॉल Hannah Foster ने Murder से पहले की थी। Hannah Foster ने चुपके से वहां के emergency नंबर पर कॉल की थी। मगर मनिंदर पाल की डर की वजह से कुछ बोल नहीं पा रही थी। यह कॉल तकरीबन 50 सेकेंड तक चली। मगर जो उस वक्त वहां ऑपरेटर था। उसने कुछ आवाज ना सुनने की वजह से 50 सेकंड के बाद कॉल काट दी। अगर उस वक्त वह ऑपरेटर इस बात को समझ जाता कि कोई खतरे में है। उस जगह पर पहुंचकर शायद Hannah Foster की जान बचाई जा सकती थी।

Hannah Foster के मोबाइल और बाकी चीज भी पुलिस को बरामद हो गई थी। उसको किसी बैग में लपेटकर झाड़ी में फेंक दिया गया था।

जब तक पुलिस मनिंदर पाल सिंह की सच्चाई को समझ पाती। वह जब तक इंग्लैंड को छोड़ चुका था। वह इंडिया आ चुका था। अब मुश्किल यह थी। इसको कैसे पकड़ा जाए। वहां की पुलिस ने भारतीय पुलिस से संपर्क किया। मदद मांगी मगर शुरुआत में यहां से कोई मदद नहीं मिली। इस वजह से काफी वक्त बीत गया था।

चंडीगढ़ पुलिस ने कुछ तफ्तीश की थी। उसने उसके परिवार का पता किया था। परिवार से पता चला था। वह यहां आया था। मगर वह घर पर नहीं था। वह घर से जा चुका था। उसके बाद वह कहां गया किसी को मालूम नहीं था। जब मनिंदर पाल सिंह England में था। वह पगड़ी पहना करता था। उसका हुलिया बिल्कुल अलग था। हिंदुस्तान आने के बाद उसने अपना होलिया बिल्कुल बदल दिया था। मगर तब तक भारत की मीडिया में Hannah Foster की कोई खबर आई नहीं थी। लोगों को भी कुछ मालूम नहीं था।

इंग्लैंड की पुलिस, Indian पुलिस से मदद मांगती रही। मगर कुछ फायदा नहीं हो रहा था। वक्त बीता जा रहा था। इसी के बाद Hannah Foster के मां-बाप काफी परेशान थे। उनकी बेटी का कातिल कानून से दूर है। यह बात उनको परेशान कर रही थी।

जब उन्हें लगा कि इससे कुछ हासिल नहीं होगा। वह 3 महीने बाद Hannah Foster के मां-बाप ने फैसला किया। वह खुद भारत आएंगे। अपनी बेटी के कातिल को तलाश करेंगे। वह 10 जुलाई 2004 को भारत आ जाते हैं। सबसे पहले यह चंडीगढ़ जाते हैं। चंडीगढ़ में मीडिया से बात करके प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। सारी चीजें बता देते और कहते हैं, कि बेटी के कातिल को सामने लाने में मदद करें। वहां पर कुछ खबरें छपी थी। उसके बाद वह दिल्ली आ जाती।

दिल्ली आने के बाद वे प्रेस क्लब में कॉन्फ्रेंस करती हैं। अपनी पूरी आपबीती बताती है। उसकी बेटी का कत्ल कैसे हुआ था। कातिल भारत आ चुका है। हम उसे तलाश करने के लिए यहां आए हुए हैं। अब उसके बाद तमाम टीवी चैनल और अखबारों में मनिंदर पाल सिंह की तस्वीरें चलनी शुरू हो जाती है।

Hannah Foster के मां-बाप शहरों में जाते। मनिंदर पाल की तस्वीर मीडिया के जरिए लोगो तक पहुंचा दी। इसको ढूंढने में हमारी मदद कीजिए। उस वक्त तक पुलिस ने बाकायदा कोहली की गिरफ्तारी के ऊपर 50 लाख का इनाम घोषित कर दिया था। जो भी कोहली की सूचना देगा उसको 50 लाख का इनाम मिलेगा।

Hannah Foster के मां-बाप के भारत आने के बाद उसकी खबर धीरे-धीरे लोगों तक पहुंचना शुरू हुई। लोगों को लगा कि एक 17 साल की लड़की का कातिल हिंदुस्तानी है। वह हिंदुस्तान में आकर छुपा हुआ है। Hannah Foster के मां बाप के हिंदुस्तान आने के 5 दिन बाद दार्जीलिंग (वेस्ट बंगाल का एक शहर ) से एक कार ड्राइवर लोकल पुलिस को फोन करता है। जो कि पुलिस से रिटायर हो चुका था। मगर वह कार ड्राइवर उसको जानता था। ड्राइवर जैसे ही यह बात उस पुलिस अफसर को बताता हैv जो रिटायर हो चुका था। उस पुलिस अफसर को भी शक होता है। जिस तरीके से उस ड्राइवर ने बताया था।  एक ब्रिटिस्ट है जो काफी दिनों से यहां रह रहा है। उसे लगता है, कि हो ना हो वह छुपने के लिए यहां आया होगा।

क्योंकि मनिंदर पाल ने अपना पूरा हुलिया बदल लिया था। मगर उसका चेहरा उससे मिल रहा था। वह पुलिस अफसर ड्राइवर से कहता है। मुझे उससे एक बार मिलाओ। इसके बाद पुलिस वाला वहां जाता है और देखता है।

उस पुलिस अफसर को भी लगा कि हां यह वही शख्स है। यह पहली पुख्ता जानकारी सामने आई थी। इसके बाद क्योंकि भारत के मीडिया में यह खबर फैल रही थी।  मनिंदर पाल भी चौकस हो गया था। और दार्जिलिंग से नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था। मगर उस पुलिस अफसर ने उसे पहले ही देख लिया था। वहां के लोकल पुलिस के जरिए मनिंदर पाल को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद शुरू में तो उसने काफी मना किया। मेरा नाम कुछ और है, क्योंकि वहां पर उसने अपना नाम माइक डेविस बताया था।

मगर जब काफी देर तक पूछताछ हुई। उसने स्वीकार कर लिया कि हां वही मनिंदर पाल है। वह यहां इंग्लैंड से भाग कर आया था। पुलिस से बचने के लिए वह Darjeeling में नए नाम से रह रहा था।

इस खुलासे के बाद फौरन Hannah Foster के मां-बाप को पता चल जाता है। वह मीडिया को शुक्रिया कहते हैं। उसको दिल्ली लाया जाता है। दिल्ली लाने के बाद उसको तिहाड़ जेल में रखा जाता है। अब उसको इंग्लैंड भेजने की लड़ाई शुरू हो जाती है। क्योंकि Hannah Foster के मां-बाप वापस उसको लेने के लिए आए थे। इस पर इंग्लैंड में मुकदमा चले। मगर इसी चक्कर में 3 साल बीत जाते हैं।

इसी बीच उसने NDTV इंग्लिश न्यूज़ चैनल को इंटरव्यू में अपना जुर्म कबूल किया था। उसने बताया था कि उस रात मैं एक डिलीवरी के लिए जा रहा था। मैं नशे में था। मैंने देखा कि Hannah Foster अकेली सड़क पर आ रही है।  मैंने उसको पकड़ लिया। उसका बलात्कार किया। मैंने Hannah Foster से कहा था। तुम यह बात पुलिस को नहीं बताओगी। मगर वह नहीं मानी। मैंने उसका गला दबाकर हत्या कर दी।

3 साल के बाद आखिरकार 28 जुलाई 2007 को कोहली को भारतीय अदालत की इजाजत से इंग्लैंड भेजा गया। यह मनिंदर पाल सिंह पहला शख्स था। जिसे इंग्लैंड में भारत से किसी जुर्म के लिए भेजा गया। यह एक इतिहास बन गया था। इंग्लैंड पहुंचते ही वहां की पुलिस मनिंदर पाल को गिरफ्तार कर लेती है। उस पर कत्ल, बलात्कार और अगवा करने का मुकदमा दर्ज हो जाता है।

वहां जाने के बाद यह अपनी कहानी बदल देता है। यह कहता है। मुझे 3 लोगों ने जबरदस्ती उस लड़की का बलात्कार करने के लिए कहा था। मैंने यह मजबूरी में किया था। मगर उसकी यह बातें बेकार चली जाती है। क्योंकि तमाम सबूत उसके खिलाफ थे। आखिरकार लंबा मुकदमा चला। 25 नवंबर 2008 को अदालत ने अपना फैसला सुनाया। जिसमें कोहली को 24 साल की सजा सुनाई गई। जिसमें से 2 साल उसकी गिरफ्तारी के निकल चुके थे। जो 22 साल बच्चे थे। मगर यह 24 साल बगैर किसी जमानत के थे।

जिस ड्राइवर ने यह मुखबरी दी थी। उसको बाकायदा इनाम के पैसे मिले। उसने दार्जिलिंग में Hannah Foster के नाम से एक स्कूल खोल लिया। यह बात जब Hannah Foster के मां-बाप को पता चली। वह कुछ दिन के बाद भारत आये। उस ड्राइवर से मिले । वह जब भी भारत आते हैं, तो वह उसी ड्राइवर को Hire (रखते ) करते हैं। अपने लोगों से मिलकर उस हेल्प की मदद की।

आज की कहानी “Jassi और Mithu की Love Story” की कहानी है। जिस तरीके से हम फिल्मों में देखा करते थे। अमीरी गरीबी की दीवार, गांव बिरादरी, समाज वह सारी चीजें हैं। मगर यहां पर सरहद भी है। एक तरफ हिंदुस्तान और दूसरी तरफ कनाडा है। यह पहली नजर का प्यार है। उसका जो अंजाम होता है। उसको लेकर कनाडा तक में इंसाफ की मांग उठती है। उन में से एक लगभग 20 साल से सिर्फ इंतजार कर रहा है। वह भी एक चीज के लिए कि जिससे उसने प्यार किया। उसके साथ जो कुछ हुआ। उसके गुनाहगारों को वह एक बार फांसी पर चढ़ते हुए देख ले।

यह कहानी जस्सी और मिट्ठू की है। जस्सी यानी जसविंदर कौर सिद्धू। उसके मां-बाप पंजाब के थे। मगर उसकी पैदाइश कनाडा में हुई थी। वह अरबपति घराने से थी। उसके मां-बाप भी कनाडा में ही रहते थे। दूसरी तरफ मिट्ठू था। जिसका नाम सुखविंदर सिद्धू उर्फ़ मिट्ठू सिद्धू था। यह काउंके कला पंजाब का रहने वाला है। यह गरीब घराने से था। इसने टेंपो भी चलाया था। इन दोनों की यह लव स्टोरी शुरू होती है।

जस्सी और मिट्ठू की मुलाकात और Jassi Mithu की Love Story की शुरुआत-

बात 1994 की है। जस्सी कनाडा से हिंदुस्तान अपने ननिहाल आती है। वह यहां पर घूमने के लिए आई थी। साथ में अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए भी वह यहां आई थी। काउंके कला पंजाब में एक जगह है। वह वहां पहुंच जाती है। काउंके कला पहुंचने के बाद वहीं पर उसकी मुलाकात पहली बार मिट्ठू से होती है।

jassi mithu love Story
जस्सी और मिट्ठू

जब वह गांव आई क्योंकि गांव में टेंपो चलते हैं। वह उसी टाइम टेंपो में अपनी मां और मौसी के साथ बैठी हुई थी। टेंपो में वह पीछे की तरफ बैठी हुई थी। उसी वक्त वहां एक स्टैंड पर खड़ा हुआ मिट्ठू। क्योंकि उसे भी उसी गांव जाना था। वह भी काउंके कला का ही रहने वाला था। दौड़कर वह भी टेंपो में चढ़ जाता है। वह टेंपो के पीछे लटक जाता है।

उसी टेंपो पर दोनों की पहली मुलाकात होती है। दोनों की नजरें मिलती है। मिट्ठू का कहना था कि पता नहीं उस पहली मुलाकात में कुछ ऐसा हुआ कि यह दोनों एक दूसरे के लिए बने हैं। इसके बाद टैंपू अपनी मंजिल पर पहुंचता है। दोनों उतर जाते हैं। इत्तेफाक से जस्सी के नानी के घर का एक दरवाजा मिट्ठू के घर के पास ही खुलता था।

अगले दिन जस्सी गांव का दौरा करने के इरादे से स्कूटी उठाती है। इत्तेफाक से स्कूटर खराब हो जाता है। उसको इत्तेफाक से मिट्ठू मिल जाता है। वह उस स्कूटर को सही कर देता है। फिर दोनों में मुलाकात होती है। इसके बाद जस्सी अपनी मौसी के साथ एक साड़ी की दुकान में जाती है। मिट्ठू भी उसका पीछा करता हुआ वहां पहुंच जाता है। वहां पर भी वे दोनों मिलते हैं। जस्सी मुस्कुराती है। चुपचाप से वह कॉफी पी रही थी। वह मिट्ठू की तरफ कॉफी भी बढ़ा देती है। इस तरीके से इन दोनों की बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता है।

जस्सी और मिट्ठू का प्यार का इज़हार-

कुछ वक्त के बाद दोनों एक दूसरे से इजहार भी कर देते हैं। जस्सी और मिट्ठू दोनों एक दूसरे से साफ-साफ कह देते हैं। वह एक दूसरे से प्यार करते हैं। धीरे-धीरे यह दोनों इसी ख्वाब की जिंदगी में जी रहे थे। Jassi Mithu की Love Story सही चल रही थी। अचानक जस्सी के लौटने का दिन आ जाता है। उसे कनाडा वापस जाना था। क्योंकि वह वहां पर पढ़ाई कर रही थी। उसे वहां पर पढ़ाई करके वकील बनना था। जब जाने की बात आती है। मिट्ठू उदास हो जाता है। यहां तक कि जस्सी भी नहीं जाना चाहती थी। इस वजह से वह अपना पासपोर्ट फाड़ देती है। ताकि वह वहां पर ना जा पाए।

मगर जस्सी के घर वाले अमीर थे। इस वजह से 15 दिन के अंदर पासपोर्ट तैयार हो जाता है। ना चाहते हुए भी जस्सी को पंजाब से कनाडा जाना पड़ता है। जिससे Jassi Mithu की Love Story  बीच में रह जाती है। मगर जस्सी मिट्ठू से इस बात का वादा करती है। वह जल्दी वापस आएगी। दोनों शादी करेंगे और वापस जाकर कनाडा में ही बस जाएंगे। उसके जाने के बाद एक दोनों खत से संपर्क में रहते हैं। क्योंकि बात 1994 की है। उस वक्त सोशल मीडिया का जमाना नहीं था। टेक्नोलॉजी इतनी आगे की नहीं थी।

इसके अलावा गांव में एक PCO भी था। उस PCO पर महीने में एक बार जस्सी का फोन आता था। क्योंकि जस्सी ने खत के जरिए मिट्ठू को वक्त का बता रखा था। इस वजह से पाबंदी के साथ मिट्ठू वक्त पर वहां पहुंच जाया करता था। दोनों में काफी बात हुआ करती थी। धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा करीब 5 साल बीत जाते हैं।

जस्सी और मिट्ठू का छुप के शादी करना-

1999 में वह दोबारा वापस आती है। इसी दौरान पता चलता है, कि जस्सी के घरवाले उसके लिए लड़का देख रहे हैं। उसकी शादी हो जाएगी। यह बात वह मिट्ठू को बताती है। फिर दोनों तय करते हैं। वह गुपचुप तरीके से शादी कर लेंगे। उसके बाद वे दोनों एक गुरुद्वारे में जाकर शादी कर लेते हैं। 15 मार्च 1999 को दोनों की शादी हो जाती है। मगर इस शादी के राज को दोनों छुपा कर रखते हैं।

जस्सी मिट्ठू से वादा करती है। वह उसको कनाडा बुलाएगी और दोनों साथ रहेंगे। इसी वादे के साथ जस्सी कनाडा वापस लौट जाती है। उसके बाद भी फोन पर बात जारी थी। इसके बाद जस्सी मिट्ठू के कागज तैयार करने की कोशिश करती है। वह वहां से Apply कर देती है। इधर मिट्ठू के पास गांव में पेपर आ जाते हैं।

शादी के राज का पता चल जाना-

इसी दौरान मिट्ठू का एक खास दोस्त जो उनकी शादी का गवाह था। यह राज जस्सी के ननिहाल में बता देता है। वह बताता है, कि इन दोनों ने 15 मार्च 1999 को एक गुरुद्वारे में शादी की है। यह बात जस्सी के मामा को पता चल जाती है। जस्सी के मामा एक अमीर शख्स थे। उसी गांव के रहने वाले थे। जब उनको यह बात पता चलती है। फिर हैसियत बीच में आ जाती है। उनको बहुत गुस्सा आता है। फिर जस्सी के मां-बाप को बता दिया जाता है।

मिट्ठू पर झूटी FIR-

फिर मां के इशारे पर यह कहा जाता है, कि की शादी को खत्म करके इन को अलग कर दिया जाए। पहला कदम यह उठाया जाता है, कि अपनी हैसियत का इस्तेमाल करते हुए जस्सी के मामा मिट्ठू के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखवा देते हैं।

रिपोर्ट ये थी कि मिट्ठू ने जस्सी के साथ जबरदस्ती करके शादी की है। जस्सी के मामा का नाम सुरजीत सिंह था। वह पुलिस वाले को पैसा देते हैं। पुलिस वाले मुकदमा दर्ज कर लेते हैं। इसके बाद पुलिस मिट्ठू और उसके दोस्त को गिरफ्तार कर लेती है। इसके बाद इस गिरफ्तारी की खबर कनाडा में बैठी हुई जस्सी को मिल जाती है। जस्सी किसी तरीके से नंबर का इंतजाम करती है। कनाडा से ही पुलिस को एक फैक्स कर देती है। वह बताती है, कि मिट्ठू ने उसके साथ जबरदस्ती शादी नहीं की है। हम दोनों ने अपनी मर्जी से शादी की है। हम दोनों एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। उसने मुझे कभी भी भगवा नहीं किया।

मिट्ठू को पुलिस द्वारा परेशान करना-

इसके बाद पुलिस वालों को मजबूरी में मिट्ठू और उसके दोस्तों को छोड़ना पड़ा। मगर पुलिस अलग तरीके से परेशान करने लगी। इधर जस्सी के रिश्तेदार मिट्ठू पर लगातार दबाव बनाने लगे। उसके ऊपर ड्रक्स का इल्जाम लगाया। उसके भाई के ऊपर चोरी का इल्जाम लगा दिया। यहां तक कि एक बलात्कार का इल्जाम लगा दिया। उन्होंने एक लड़की को तैयार किया था। उससे पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई थी। कि मिट्ठू ने उसके साथ बलात्कार किया है। बलात्कार के इल्जाम में मिट्ठू को गिरफ्तार कर लिया जाता है। मगर तकदीर देखिए जिस लड़की ने मिट्ठू पर यह इल्जाम लगाया था। जब उसे मिट्ठू और जस्सी की कहानी पता चलती है। वह इमोशनल हो जाती है। वह फिर पुलिस में जाकर कहती है। मुझसे दबाव देकर झूठी गवाही और झूठा मुकदमा बनवाया गया। मिट्ठू ने मेरा कोई बलात्कार नहीं किया है। इसके बाद मिट्ठू को छोड़ दिया जाता है।

जस्सी का मिट्ठू को छुड़ाना-

इसी दौरान जब मिट्ठू और उसके रिश्तेदार को परेशान किया जा रहा था। मिट्ठू बार जेल में बंद था। जस्सी से रहा नहीं गया। उसने तय किया कि वह भारत वापस आएगी। इस बार अपने प्यार को वापस लेकर जाएगी। मुसीबत में उसका साथ देगी। वह वापस पंजाब आ जाती है। आने के बाद वह बाकायदा पुलिस और अदालत में जाकर कहती है। हम दोनों ने शादी की है। मेरे घरवाले बगैर मतलब के इसको झूठे इल्जाम हमें परेशान कर रहे हैं।

इसके बाद पुलिस को मिट्ठू को छोड़ना पड़ा था। मगर इसके बाद जस्सी ने अपने घर वालों को ही दुश्मन बना लिया था। इसके बाद मिट्ठू और जस्सी की जान पर खतरा बन जाता है। इन दोनों को मारने की बात आ जाती है। मिट्ठू के घर वाले इसके बाद उसे वहां से निकाल देते हैं। इसके बाद वे दोनों अलग-अलग जगह पर भटकते रहते हैं।

इसके बाद मिट्ठू के रिश्तेदार उसकी मदद करते हैं। मलेर कोटला एक जगह है। वहां पर उनको रहने के लिए भेज देते हैं। दोनों वहां पर छुप कर रह रहे थे। एक दिन जस्सी कहती है। मैं काफी थक गई हूं और बोर हो रही हूं। मुझे तुम्हारे साथ स्कूटी पर बाहर घूमना है। मिट्ठू के रिश्तेदार उनको समझाते हैं। जस्सी के मामा लगातार तुम्हें तलाश कर रहे हैं। मगर मिट्ठू जस्सी की बात को नहीं टालता है। वह जस्सी की खुशी के लिए जस्सी को स्कूटर पर बिठा कर निकल जाता है।

जस्सी और मिट्ठू पर हमला-

थोड़ी दूर के बाद मलेर कोटला के बाहर उन्हें एक गाड़ी दिखाई देती है। जो एक अजीब सी गाड़ी थी। मिट्ठू उन्हें देखकर अपनी गाड़ी रोक लेता है। वह सोचता है, कि शायद कुछ हो गया है। उन्हें मदद की जरूरत है। बिट्टू जैसे ही गाड़ी रोकता है। जीप के पीछे से 2 लोग आते हैं। उनके हाथ में तलवार थी। उनके आने के बाद पीछे से और चार पांच लोग आ जाते हैं। वह मिट्ठू पर टूट पड़ते हैं। मिट्ठू अब उनकी तलवार की जद में था। वह खून से लथपथ हो गया था। जस्सी लगातार मदद मांग रही है। मगर वहां कोई मदद के लिए नहीं था।

जब उन्हें लगा कि मिट्ठू का मर चुका है। वह जस्सी को उठाकर गाड़ी में डाल कर ले जाते हैं। जो चार्जशीट और F.I.R है। उसके हिसाब से जब वह जस्सी को लेकर निकले। उन्होंने जस्सी की बात उसकी मां से कराई थी। जस्सी रो रही थी। यह बार-बार कह रही थी कि मां मैं आपको नहीं छोडूंगी।  मैं आपके इस राज को पास कर दूंगी। मैं पुलिस में सब कुछ बताऊंगी। मां फिर उन लोगों से कहती है। थोड़ी देर के बाद फिर दोबारा बात करना। इसके बाद वह बात कराते है। जस्सी फिर उसी बात को दोहराती है।

जस्सी का क़त्ल-

जब जस्सी की मां को लगा कि यह मानेगी नहीं। जस्सी की मां ने उन 7 लोगों से कहा कि जस्सी को भी मार डालो। इसके बाद वह जस्सी को लुधियाना के पास एक फार्म हाउस में ले जाते हैं। वहां जाने के बाद तलवार और बीयर की बोतल से जस्सी का गला काट देते हैं। इसके बाद उसकी लाश को वही नदी में फेंक देते हैं।

इधर गलती से वह मिट्ठू को मुर्दा समझ कर गए थे। मगर मिट्ठू तब तक जिंदा था। उधर से 2 लोग गुजर रहे थे। जब उन्होंने देखा कि मिट्ठू खून से लथपथ है। वह उसको उठाकर अस्पताल ले गए। लगभग 15 दिन तक मिट्ठू कोमा में था। जब 15 दिन के बाद उसे होश आया। होश आने के बाद उसने पूछा जस्सी कहाँ है। उसके रिश्तेदारों ने बताया कि उस दिन के बाद से उसका कुछ पता नहीं है। इसके बाद इस ने पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। मेरे ऊपर हमला हुआ था। वह लोग जस्सी को उठाकर ले गए।

जस्सी की लाश मिलना-

इसके बाद इधर जस्सी की लाश मिल जाती है। लाश मिलने के बाद मिट्ठू बदहवास हो जाता है। वह पुलिस में रिपोर्ट लिखवा देता है। उसके कहने पर पुलिस छानबीन करती है। अलग-अलग लोगों को गिरफ्तार करती है। पकड़ने के बाद पता चलता है। जस्सी की मां मलकीत जो कनाडा में थी। जस्सी के मामा सुरजीत सिंह इन दोनों ने मिलकर इस प्लानिंग को अंजाम दिया था। उन लोगों ने 7 लाख में मिट्ठू की सुपारी ली थी।

उस वक्त मलेर कोटला इलाके में एक इंस्पेक्टर हुआ करता था। यह कहा गया था कि अगर तुम इसकी लाश को यहां पर डाल दोगे। उस केस को मैं खुद संभाल लूंगा। इसी वजह से मिट्ठू की लाश को वहां पर फेंका गया था। जिसको मुर्दा समझ कर छोड़ गए थे। उस पुलिस इंस्पेक्टर को भी गिरफ्तार किया गया था। जिन्होंने 7 लाख में मिट्ठू की सुपारी ली थी। आखिर में जब जस्सी की मां ने कहा था। जस्सी को भी खत्म कर दो। सुपारी की रकम दोगुना हो गई थी। यानी 7 लाख से 14 लाख हो गई थी।

कातिलों की गिरफ्तारी-

इसके बाद इन को गिरफ्तार किया जाता है। वह सब बताते हैं, कि उनको सुपारी सुरजीत सिंह ने दी थी। उनमें से एक बताता है, कि उन्होंने जस्सी की मां से उसकी बात कराई थी। जस्सी कि मां ने ही फोन पर बताया था। कुछ देर के बाद कॉल करके बताऊंगी जस्सी का क्या करना है । जब दोबारा कॉल किया था। यह कहा था, कि जस्सी को भी मार डालो। उसकी मां के कहने पर ही हमने जैसी को मारा था।

इसके बाद सुरजीत सिंह और जस्सी की मां इसमें मुलजिम हुए। उस इंस्पेक्टर को भी गिरफ्तार किया गया। क्योंकि जस्सी की मां और मामा कनाडा में थे। इस इंस्पेक्टर और उन लोगो को उम्र कैद की सजा हो गई। लेकिन मामा और मां कानून के शिकंजे से दूर कनाडा में थे। फिर कानून लंबी लड़ाई चलती रही। मिट्ठू अदालत के चक्कर काटता रहा। मिट्ठू ने यह तय कर लिया था। वह अपनी जस्सी के गुनहगारों को किसी कीमत पर नहीं बख्सेगा।

उसकी कहानी मीडिया के जरिए अलग-अलग जगह पर आई। यहां तक की बात कनाडा तक पहुंच गई। इसके बाद Justice For Jassi एक मुहिम चल गई थी। वहां के अखबारों और मीडिया में यह बात सामने आई। जिससे Jassi और Mithu की Love Story की कहानी वहां पर छपने लगी। उसको लेकर पब्लिक में गुस्सा शुरू हो गया। कनाडा की सरकार पर इतना दबाव पड़ा उन दोनों को भारत भेजने पर मजबूर हो गए।

इधर CBI और पंजाब पुलिस के कहने पर सरकार ने जस्सी के मामा और मां को भारत को सौंपने की अर्जी दी। सालों तक यह बात ऐसे ही लटकी रही। क्योंकि इसमें कनाडा की पुलिस आ गई थी। वह कह रही थी। भारत की पुलिस की जो रिपोर्ट है। उसमें कुछ कमी है। इसके बाद मामला अदालत में चला गया। इधर जस्सी को इंसाफ देने के लिए लगातार दबाव पड़ रहा था।

अदालत का फैसला-

इसके बाद अदालत ने फैसला किया कि इन दोनों ने जो गुनाह किया है। इनकी उनको सजा मिलनी चाहिए। इसलिए इनको भारत भेजना चाहिए। आखिरकार करीब 18 साल के बाद कानून की जीत हो जाती है। इसके बाद मलकीत कौर और सुरजीत सिंह जस्सी के मामा और मां उन दोनों को भारत भेजा जाता है। वह दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरते हैं। पंजाब पुलिस की टीम वहां पर पहुंच जाती है। वह उनको लेकर पंजाब आ जाती है। उनके खिलाफ अगवा करना, कत्ल करना, और साजिश रचने के तहत मुकदमा दर्ज हो जाता है। अब यह दोनों जेल में है। क्योंकि यह लंबे वक्त से भागे हुए थे। इन दोनों पर मुकदमा चल रहा है।

जाँच करने वाले अधिकारी को रिशवत देना-

उस वक्त जो इस मामले की जांच कर रहे थे। जिन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर को भी गिरफ्तार किया था। उनका कहना था कि जब वह इस केस की जांच कर रहे थे। जस्सी के मामा और मां कनाडा में थे। तब उन्होंने इस पुलिस अफसर के पास एक ब्लैंक चेक भेजा था। उन्होंने कहा था। इस चेक में जितनी रकम चाहो तुम भर सकते हो। बस तुम्हारा काम इतना है, कि इस केस को हल्का कर दो यहां तक कि खत्म ही कर दो। तब इस पुलिस अफसर ने कहा था। पंजाब पुलिस का हर पुलिस वाला बिकाऊ नहीं होता। उस बैलेंस चेक को छोड़ दिया था।

मिट्ठू को रिशवत देना-

जब लगा कि मिट्ठू नहीं मानेगा। मिट्ठू को भी यही ऑफर दिया गया था। यह ऑफर 2012 में दिया गया था। उसे 14 एकड़ जमीन बहुत अच्छी जगह पर और एक करोड रुपए कैश। यह ऑफर उसको पंजाब के लोकल MLA के जरिए दिया गया था। मिट्ठू का जवाब था। जिस हैसियत का मैं हूं। जिस हैसियत की जस्सी थी। हम दोनों में जमीन आसमान का फर्क था। मगर जस्सी ने इस फर्क को किनारे करते हुए मुझसे मोहब्बत की और शादी की।

उसने मेरे लिए जो कुछ किया। वह अहसान मैं कभी नहीं भूलूंगा। यह चाहे कितने करोड़ रुपए  ही क्यों ना हो उसकी कीमत की भरपाई नहीं हो सकती। मिट्ठू ने इस ऑफर को ठुकरा दिया। आज इस मामले को करीब 21 साल हो चुके हैं। मिट्ठू आज भी पंजाब में है। आज भी वह अदालत के चक्कर काट रहा है। उसकी सिर्फ एक तमन्ना है, कि जस्सी के कातिल को फांसी की सजा मिले। वह यह देखना चाहता है, तो ये Jassi और Mithu की Love Story थी।

यह कहानी 1990 की नागपुर की है। यह Gangster Akku Yadav की कहानी है। उस वक्त भी काफी क्राइम हुआ करता था। नागपुर में एक इलाका कस्तूरबा नगर, जहां के लोग काफी परेशान थे। इस बस्ती में करीब 300 परिवार रहा करते थे। सब छोटा-मोटा काम किया करते थे। ज्यादा पैसा उनके पास नहीं था। मगर अपनी जिंदगी जी रहे थे।

मगर 1990 के दशक में एक शख्स वहां पर उठता है। जिसका नाम भारत कालीचरण था। मगर भारत कालीचरण के नाम से लोग उसे कम जानते थे। जब तक वह छोटा था। क्राइम की दुनिया में नहीं आया था। तब तक लोग उसे भारत कालीचरण कहा करते थे। मगर  जुर्म की दुनिया में कदम रखने के बाद उसका नाम बदल गया। उसका नया नाम Akku Yadav रखा गया।

धीरे-धीरे छोटे-मोटे क्राइम करते-करते बड़े क्राइम करने लगा। उसके पीछे पुलिस का भी हाथ था। लोकल लीडर का भी हाथ था। वह उसको अपने फायदे के लिए बढ़ावा दिया करते थे। उसके बाद वह बेलगाम होता चला गया। खासतौर से इस बस्ती में उसके आतंक और खौफ का परचम लहराने लगा। जब जो मन में आता वह कर दिया करता था। कोई सुनवाई भी नहीं हुआ करती थी। पूरी बस्ती में खासतौर से औरतों पर उसकी गंदी नजर हुआ करती थी।

जब उसे लगा कि वह ताकतवर हो गया है। पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसके अलावा जो नेता है। उनका हमेशा उसके सर पर हाथ है। धीरे-धीरे उसका हौसला इतना बढ़ गया। उसने इस बस्ती की औरतों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। एक-एक करके उसने इस बस्ती की औरतों को अपना हवस का शिकार बनाया। बेचारी बहुत सारी औरत, पुलिस के पास गई। मगर पुलिस वालों ने कोई मदद नहीं की। एक औरत के साथ जब इस ने रेप किया। उस औरत ने शर्म की वजह से खुद को तेल डालकर जला लिया था। वह बाकी बस्ते के लोगों से नजर नहीं मिला पा रही थी।

gangster akku yadav
अक्कू यादव

Gangster Akku Yadav ने करीब 10 साल के अपने इस आतंक के दौर में तकरीबन 40 से ज्यादाऔरतों को अपनी हवस का शिकार बनाया। कई औरतों को तो उसने रेप करने के बाद चाकू से गोदकर मार डाला। जो वहां का थाना था। वहां पर Gangster Akku Yadav के खिलाफ दर्जनों शिकायत दर्ज थी। लेकिन पुलिस ने कभी कुछ नहीं किया। इससे उसका हौसला बढ़ता चला गया।

बस्ती के लोगों का कत्ल करना औरतों का बलात्कार करना उसकी आदत बन गई थी। एक दौर यह आया जब Akku Yadav बस्ती में आया करता था। बस्ती की औरतें अपने घरों में छिप जाया करती थी। मर्द उससे नजरें नहीं मिलाया करते थे। क्योंकि पता नहीं वह कब किसको मार डाले। जो बच्ची थी और बड़ी हो रही थी। उनके मां-बाप अक्कू यादव और उसके आदमियों से हमेशा उनको बचा कर रखा करते थे। जुल्म अपने चरम पर था। अब कोई यादव की यह दरिंदगी चलती रहे। इन 10 सालों में न किसी नेता न किसी पुलिस वाले ने कुछ किया।

ऐसा लगने लगा कि शायद यह इस बस्ती की तकदीर बन गई है। मगर तभी अचानक एक हादसा होता है। 10 साल के बाद 2004 में जो इस बस्ती में परिवार रहते थे। उनमें से एक परिवार मधुकर और उसकी पत्नी अलका इसी बस्ती में रहती थी। इन 300 परिवारों में से एक लौता परिवार था। जिसने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए बस्ती से बाहर निकाला।

मधुकर और अलका चाहते थे। उनकी बच्ची उसे पढ़ लिखकर कुछ बने। इसी लिए वह अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा उस पर खर्च कर रहे थे। उषा ने कॉलेज में जाकर होटल मैनेजमेंट का कोर्स करना शुरू किया। क्योंकि वह शुरू से ही होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के लिए कहा करती थी।

कुछ लोगों ने अक्कू यादव के खिलाफ आवाज भी उठाई थी। मगर उनकी लाशें रेलवे ट्रैक के पास पड़ी हुई मिली थी। अक्कू यादव की दहशत पूरी बस्ती में बैठ गयी थी।

इधर उषा के कॉलेज की छुट्टी होने के बाद बस्ती वापस आ जाती है। इत्तेफाक से जब उषा घर आई हुई थी। Gangster Akku Yadav के कुछ लोग जो उसके घर के बराबर में एक परिवार रहता था। उसने पुलिस में कुछ शिकायत कर दी थी। जब अक्कू यादव के लोगों को यह बात पता चली। वह वहां पहुंचकर उषा के पड़ोस में रहने वाले घर पर हमला कर देते हैं। मूसा उस वक्त घर के अंदर थी। जब पड़ोसी चिल्ला रहे थे। वह बाहर आती है। वह देखती है, कि बहुत सारे लोग गुंडागर्दी कर रहे हैं। उनके पड़ोसी को पीट रहे हैं। वह उनके बीच में आ जाती है। उषा काफी बहादुर थी। उसे लगा कि यह तो जुल्म है। उसने उन लोगों को धमकाया।

उषा अपने घर वापस आकर पुलिस को कॉल कर देती। वह 100 नंबर पर कॉल करके पुलिस को वहां बुला लेती है। जब पुलिस आती है, तो अक्कू यादव के लोग डर जाते हैं। देख लेने की धमकी के साथ वहां से वापस चले जाते हैं। उनके जाने के बाद Gangster Akku Yadav को जब यह बात पता चलती है। बस्ती की एक लड़की ने पुलिस को बस्ती में बुलाया। यादव कुछ घंटे के बाद करीब 50 लोगों को लेकर बस्ती में वापस आता है। वह उषा के घर के बाहर आकर खड़ा हो जाता है। एक बोतल तेजाब से भरी हुई उषा के घर के दरवाजे पर मार देता है। उसके बाद घरवालों को गाली देकर बुलाते हैं।

उषा के घर वाले बाहर आते हैं। वह कहता है, कि अगर आज के बाद तुम ने पुलिस को कॉल किया। हमारे बीच में आई तो तुम्हारा भी रेप कर दिया जाएगा। तुम्हारे मां बाप को मार दिया जाएगा। उसने उसकी बात का पलट कर जवाब दिया। उसने कहा तुम अभी रुको मैं पुलिस को फोन करके बुलाती हूं। Gangster Akku Yadav ने फिर धमकी दी। मगर वह अंदर फोन करने के लिए चली गई। उषा को फोन करने से रोकने के लिए तब तक कुछ लोग घर के अंदर घुस आए थे। उषा तब भी नहीं रुकी। उसने घर के गैस का सिलेंडर खोल दिया। माचिस हाथ में ले ली। उसने कहा अगर तुम में से एक भी आगे आया। मुझे हाथ लगाया। मैं माचिस की तीली जला दूंगी। सिलेंडर फट जाएगा। तुम सब भी मारे जाओगे। अक्कू यादव समेत सारे लोग घबरा गए थे।

इसी दौरान में बस्ती के लोग भी अपने घरों से देख रहे थे। उषा लगातार माचिस हाथ में लिए उनको धमका रही थी। इस बहादुरी को देखते हुए पहली बार अक्कू यादव की हालत खराब हो जाती है। वह अपने लोगों को साथ लेकर वापस चला जाता है। यह एक मामला कस्तूरबा नगर बस्ती की तकदीर को पलट देता है। पहली बार बस्ती के लोगों ने देखा कि Gangster Akku Yadav इतने लोगों को लेकर आया। एक लड़की की धमकी के वजह से अपने आदमी को लेकर वापस चला गया।

बस्ती के लोगों को लगा Gangster Akku Yadav भी डर सकता है। जब उसे एक लड़की डरा सकती है। हम क्यों नहीं डरा सकते। यहां से बस्ती के लोगों को हौसला मिल गया। इसके बाद वह सारे बस्ती वाले इखट्टा होते हैं। कहते, हैं कि हम इतने सालों से जुल्म सह रहे हैं। कब तक सहेंगे। अब बहुत हो चुका है। हमें अक्कू यादव का मुकाबला करना चाहिए।

अब उन्होंने फैसला कर लिया था। उनको अक्कू यादव का मुकाबला करना है। अगले दिन यह लोग इकट्ठा हो जाते हैं। इन्हें मालूम था कि, अक्कू यादव घर पर ही है। यह अक्कू यादव के घर पर धावा बोल देते हैं। मगर अक्कू यादव उस वक्त वहां मौजूद नहीं था। उसके घर को आग लगा देते है। अक्कू यादव के गुंडे वहां पर मौजूद थे। गांव वालों को देखकर उनकी भी हालत खराब हो जाती है। वहां से भागने लगते हैं। उनको गांव वाले पीटते हैं, लेकिन अपनी जान बचाकर वहां से मैं भाग जाते हैं। अक्कू यादव का घर जला दिया गया था। भागते हुए लोगों से गांव वालों ने कहा था। अगर अक्कू यादव हमें अब दिखा तो हम उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।

जब यह बात शाम को कोई यादव के कानों में पहुंचती है। वह घबरा जाता है। उसे लगता है, कि शायद गांव वाले उसे नहीं छोड़ेंगे। वह सोचता है, कि कुछ दिनों के लिए माहौल शांत कर दिया जाए। उसे लगता है, कि गांव वाले उसे ढूंढ कर मार देंगे। वह अपनी जान बचाने के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपने आप को सरेंडर कर देता है। उसने सरेंडर इसलिए नहीं किया था। वह सजा भुगतना चाहता था। उसने सिर्फ गांव वालों से बचने के लिए पुलिस को सरेंडर किया था।

गांव वालों को इस बात का पता चल गया था। गांव वालों को लगा कि वह जान बचाने के लिए गया है। मगर वह किसी भी दिन जमानत पर आकर किसी से भी बदला ले सकता है। यह बात गांव वालों को समझ आ गई थी।

तभी एक पेशी की तारीख आती है। यह तारीख 13 अगस्त 2004 थी। नागपुर के जिला अदालत में अक्कू यादव को पेश होना था। गांव वाले तक खबर वकीलों के जरिए पहुंच गई थी। शायद इस पेशे के दौरान अक्कू यादव को जमानत मिल जाए। वह रिहा हो जाएगा। रिहा होने के बाद वह गांव वालों से बदला लेगा।

यह खबर 12 अगस्त 2004 की है। जब गांव वालों को यह बात पता चली थी। गांव वालों को पता था कि आपको यादव को 13 अगस्त 2004 को दोपहर में 7 नंबर पर पेश होना है। इस बात से गांव-गांव की औरतों के दिलों में आग भर गई। कि वह कैसे बाहर आ सकता है। पूरे गांव ने एक बैठक की और उन्होंने तय किया कि अब अक्कू यादव का फैसला अब अदालत नहीं करेगी। अक्कू यादव का फैसला अब हमें करना है।

13 अगस्त 2004 को कस्तूरबा नगर बस्ती की 200 औरतें अदालत पहुंच जाती है। इन सभी औरतों के हाथ में लाल मिर्च का पाउडर था। सभी औरतों के हाथ में चाकू था। जिस तरीके का भी नुकीला हथियार था। उसको अपने साथ ले लिया था। उन सबको उन्होंने अपने कपड़ों के अंदर छुपाया हुआ था। वह अदालत पहुंच गई। पुलिस को जब तक इस बारे में कुछ भनक नहीं थी।

जब पुलिस वालों ने इन सब को देखा तो वह भी चौंक गए। इन औरतों ने बताया कि हम सिर्फ तारीख पर आए हैं। औरतों को यादव के खिलाफ गवाही देनी है। पता चला की गवाही ऐसे नहीं दी जाती। उसके लिए तारीख होती ।है मगर पुलिस को इनके इरादों के बारे में कुछ भी शक नहीं था। दोपहर को लंच के बाद अक्कू यादव की सुनवाई थी। शायद उस को जमानत मिल जाती। लंच के बाद पुलिस को यादव को लेकर अदालत पहुंच जाती है।

जब अक्कू यादव अदालत के अंदर जा रहा था। मगर उन्होंने अभी तक कुछ नहीं किया था। मगर अचानक चलते-चलते अक्कू यादव की नजर उन औरतों में से एक औरत पर पड़ती है। यह वही औरत थी। जिसका अक्कू यादव पहले बलात्कार कर चुका था। उसको देखते ही अक्कू यादव कहता है। तू वेश्या है। तब तक औरतें शांतिपूर्ण तरीके से खड़ी हुई थी। शायद वह अदालत के फैसले का इंतजार कर रही थी। उसके बाद कुछ कदम उठाती।

जैसे ही अक्कू यादव ने उस औरत के बारे में यह बात कही। जिसका वह पहले भी रेप कर चुका था। उस औरत को बहुत गुस्सा आ गया। उसने अपना चप्पल निकालकर पुलिस के बीच ही उसको चप्पल से मारना शुरू कर दिया। जैसे ही वह उसको चप्पल मार रही थी। पुलिस उसको हटाने लगी। उन 200 औरतों के लिए यह मौका सही था। अब अचानक वे औरते पुलिस और अक्कू यादव को घेर लेती है। वह जो लाल मिर्च का पाउडर लेकर आई थी। वह पुलिस वालों की आंखों में डाल देती है। ताकि वह कुछ देख ना सके।

क्योंकि पुलिस वालों की आंखों में मिर्च का पाउडर जा चुका था। वे परेशान हो गए थे। तभी वे औरतें अक्कू यादव की आंख में मिर्च का पाउडर डाल देती है। अपने हाथों में खंजर जो लेकर आई थी। वह निकाल लेती है। अक्कू यादव को जब खंजर नजर आते हैं। वह अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करता है। मगर औरते उसे घेर लेती है। मगर कोर्ट के अंदर जितना जिसको मौका मिला अक्कू यादव को दौड़ा-दौड़ा कर चाकू मारती है। अदालत का कमरा और दीवार अक्कू यादव के खून से लथपथ हो जाता है।

5 मिनट तक जिसको जरा सा मौका मिला उसने अक्कू यादव को उस तरीके से मारा। 5 मिनट से ही कम वक्त में अक्कू यादव का फैसला हो चुका था। 7 नंबर के कमरे में फैसला होना था। उस कमरे से थोड़ा ही बाहर जज की बजाय उन 200 औरतों ने अक्कू यादव का फैसला किया। जो 10 साल तक उसका जुल्म सहती रही।

यह सब होने के बाद पुलिस फोर्स वहां पर पहुंची जाती है। मगर सब औरते जा चुकी थी। मगर पुलिस को उषा की कहानी मालूम थी। क्योंकि पुलिस को अक्कू यादव ने बताया था। पुलिस ने इस मामले का जिम्मेदार उषा को ही बना दिया। क्योंकि इस भीड़ में तो किसी को पहचानना मुमकिन नहीं था। उषा का पुलिस को पता था। उसी को पुलिस ने मुजरिम मान लिया। जैसे ही पुलिस ने उषा को गिरफ्तार किया। उसके साथ कुछ औरतों को भी गिरफ्तार किया था। जैसे ही यह खबर बस्ती के लोगों तक और आसपास की बस्ती तक अखबारों के जरिए पहुंची तो पूरा नागपुर गुस्से में आ गया।

जिस शख्स ने सालों तक बस्ती वालों पर जुल्म किया। आज उसी के क़त्ल में उस लड़की को गिरफ्तार किया गया। जिसने बस्ती वालों का हौसला बढ़ाया। इस बात से गुस्सा  लोगों ने पुलिस थाने के सामने धरना प्रदर्शन किया। जिससे मजबूर होकर पुलिस ने उषा को आजाद कर दिया। क्योंकि अदालत में कत्ल हुआ था। मुकदमा तो बनना ही था। इस लिए पुलिस ने 100 के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। लेकिन आखिर में अट्ठारह के खिलाफ 302 का मुकदमा चलाया गया।

करीब 10 साल तक यह मुकदमा चला। 2014 में अदालत का फैसला आया। इन अट्ठारह की अट्ठारह औरतों को बरी कर दिया गया। क्योंकि इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं था। पुलिस ने पूरी कोशिश की थी। खास तौर पर उषा को घेरने की तो पुलिस ने काफी कोशिश की थी। मगर पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला था। क्योंकि पूरी बस्ती एक हो गई थी। यहां तक कि शहर भी एक हो चुका था। यह सब देखकर अदालत भी भावना समझ चुकी थी। सबूत के अभाव में सब को बरी कर दिया गया।