आज की कहानी Umakant Mishra पर चले Robbery के Case की है। क्योंकि इस कहानी में एक शख्स पर चोरी का इल्जाम लगाया जाता है। 29 साल तक वह शख्स यह मुकदमा अदालत में लड़ता है। 29  साल बाद उसे वहां से बाइज्जत बरी कर दिया जाता है। यह कहानी एक ऐसी ही कहानी यह सोचकर आदमी यकीन भी नहीं कर सकता। मगर यह एक हकीकत है क्योंकि यह कागजात में लिखी हुई बात है।

यह कहानी 1994 की है। उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर में डाकघर में एक शख्स डाकिया के जॉब किया करता था। उसका नाम उमाकांत मिश्रा था। वह उमाकांत मिश्रा के दो बच्चे और बीवी थी।

उमाकांत मिश्रा लोगों के घर चिट्ठियां पहुंचाया करता था। क्योंकि उस दौर में इंटरनेट डिजिटल मार्केटिंग वगैरह कोई चीज नहीं थी। उस दौर में लोगों के घर पैसे मनी ऑर्डर के जरिए भेजे जाया करते थे। उमाकांत मिश्रा चिट्ठी पहुंचाने के अलावा लोगों के मनीआर्डर भी पहुंचाया करता था।

उमाकांत मिश्रा पर जब भी मनी ऑर्डर आया करते थे। वह उनको लोगों के घर पहुंचा दिया करता था। उसका पूरा हिसाब पोस्ट ऑफिस में आकर अपने सीनियर को दे दिया करता था। एक बार उमाकांत मिश्रा को ₹697. 60 के मनीआर्डर लोगों तक पहुंचाने थे। उमाकांत मिश्रा यह पैसे लेकर मनीआर्डर पहुंचाने के लिए डाक ऑफिस से निकल गया। वह लोगों के घर पैसे पहुंचाने चला गया।

umakant misra robbery story
Umakant Mishra

उन रुपयों में से ₹300 तो उसने लोगों के घर पहुंचा दिया। मगर जो लोग वक्त पर नहीं मिले। उनके पैसे लेकर वह वापस डाकघर में आ गया। जो बचे हुए पैसे थे वह ₹397.60 थे।

उन रुपयों को वह डाक ऑफिस में अपने सीनियर को देकर और कागज में लिखवा कर वापस आ गया। मगर अगले दिन जब वह डाकघर गया तो वहां मौजूद दो उसको देखने लगे। उनमें से सीनियर ने कहा कि तुमने कल ₹57.60 कम जमा किए थे। तुमने सिर्फ ₹340 ही जमा किए थे।

क्योंकि कागज में तो पूरे पैसे लिखे हुए थे। मगर उसने कहा कि गिनती में ₹57.60 पैसे कम है।

इसके बाद डाक घर वालों ने उमाकांत मिश्रा के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा दी। इसके बाद उमाकांत मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया। और उनको जेल भेज दिया गया। क्योंकि मामला ज्यादा बड़ा नहीं था।

इसलिए वह जल्दी ही जेल से वापस आ गया। मगर उसको नौकरी से हटा दिया गया था। क्योंकि उस पर चोरी का इल्जाम लगा हुआ था। वह जेल से तो छूट गया था। मगर उस पर यह मुकदमा लगातार चलता रहा।

उमाकांत मिश्रा इस मुकदमे को अदालत में लड़ता रहा। क्योंकि उस पर चोरी का इल्जाम लगा हुआ था तो गांव में भी उसकी काफी बदनामी हो गई थी। इसी वजह से उसे अपने गांव को छोड़ कर आना पड़ा था। कहीं दूसरी जगह पर रहकर वह इस मुकदमे को लड़ रहा था। वह अपने सर से इस चोरी के कलंक को मिटाना चाहता था।

क्योंकि मुकदमे में काफी पैसा खर्च हो रहा था। इस वजह से उसने अपनी कानपुर के घर की जमीन बेच दी। जिससे कुछ साल तक मुकदमे का खर्च, घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई का खर्च चलता रहा।

जब वे पैसे भी खत्म हो गए तो उसको अपनी खेती की जमीन भी बेचनी पड़ी क्योंकि उसकी नौकरी चली गई थी और पैसों की काफी किल्लत हो रही थी। इसी वजह से वह अपने बच्चों की पढ़ाई भी सही से नहीं कर पा रहा था।

इसी दौरान उसके 1 एक लड़के और लड़की की बीमारी की वजह से मौत हो गई क्योंकि वो उनका सही से इलाज नहीं कर पाया।

मगर वह अपना यह मुकदमा लड़ता रहा। इसके बाद उसने अपनी एक लड़की की शादी की। जो उसने पैसा लोगों से लिया था। क्योंकि अब वह काफी गरीब हो चुका था। उसके पास पैसे की बहुत कमी थी। क्योंकि वह पहले ही नौकरी से हटाया जा चुका था। मुकदमे में और घर के खर्चे में उसका काफी खर्च हो रहा था।

उसका जो छोटा लड़का था। उसको उसने प्राइवेट जॉब में लगवा दिया। क्योंकि उसकी अच्छी पढ़ाई तो करवा नहीं सका था। तो इसलिए उसको अफसर नहीं बना सका। मगर हर बाप की एक तमन्ना होती है, कि वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा कर एक अच्छा आदमी बनाये। मगर पैसों की कमी होने की वजह से वह अपने बच्चों को नहीं पड़ा पाया था।

पैसे की वजह से उसने लोगों के घर मजदूरी भी करनी शुरू कर दी थी। जहां पर जो काम मिलता वह कर लिया करता था। आखिर हर किसी को करना ही पड़ता है। मजबूरी हर किसी से हर कोई काम करवा देती है।

इसके बाद सन् 2010 में उसके रिटायरमेंट का वक्त आ गया और वह मुकदमे को लड़के हुए रिटायर हो गया।

उमाकांत मिश्रा हिम्मत नहीं आ रहे थे। वह मुकदमा लड़ रहे थे। ताकि उनको इंसाफ मिले। इसी वजह से लगभग 348 बार वह अदालत में तारीख पर गए। अब सोचने वाली बात यह है, कि इतनी दफा अगर कोई अदालत में तारीख पर जाएगा। उसका कितना खर्च होगा। इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। हम और तुम तो सिर्फ कह ही सकते हैं। मगर जिस आदमी पर यह बीत रही हो उसका अनुमान वही लगा सकता है।

एक तरफ उमाकांत मिश्रा की नौकरी चली गई दूसरी तरफ बच्चों का खर्च और घर का खर्च और मुकदमे का खर्च जिससे आदमी टूट जाता है। मगर उमाकांत मिश्रा हिम्मत नहीं हारा था।

इसके बाद सन 2013, 25 नवंबर को 29 साल बाद उमाकांत मिश्रा को अदालत में इंसाफ दिया। अदालत ने यह फैसला सुनाया की उमाकांत मिश्रा ने उन पैसों की चोरी नहीं की थी। क्योंकि इसका कोई गवाह मौजूद नहीं था। यह बात सिर्फ उन दो आदमियों के बीच मौजूद थे। एक उमाकांत मिश्रा और दूसरा उसका सीनियर अफसर।

मगर सोचने वाली बात है। उमाकांत मिश्रा का चोर ना होना तो अदालत ने मान लिया। मगर उसके 29 साल जो अदालत के चक्कर काटते हुए गुजरे और किस परेशानी में उसने यह वक्त गुजारा उसका हिसाब कौन देगा। कोई भी इस चीज का बदला नहीं दे सकता। अदालत ने तो सिर्फ अपना फैसला सुना दिया। मगर जिस आदमी पर यह बात बीती होगी यह वही जान सकता है।

उमाकांत मिश्रा की जो 29 साल की जिंदगी अदालत के चक्कर काटते हुए गुजर गई उसका हिसाब कौन देगा।

इसके बाद अदालत ने उमा उमा कांत मिश्रा को बेकसूर माना और उसकी जो सर्विस के दिन थे। उनको काउंट कर लिया गया। जब से उसको नौकरी से हटाया गया था। जब से लेकर और जब तक उसका रिटायरमेंट का वक्त था। जब तक उसको नौकरी पर माना गया। मगर अब बहुत देर हो चुकी थी। उमाकांत मिश्रा की जिंदगी बर्बाद हो चुकी थी।

मगर उमाकांत मिश्रा को इंसाफ मिला था। अब वह शान से लोगों में घूम सकता था। जिस बेज्जती का सामना उसने 29 साल तक किया उससे उससे निजात मिल गई।

इसके बाद उमाकांत मिश्रा ने अदालत में याचिका दायर की थी। उसको जब से नौकरी से हटाया गया और अब तक की तनख्वाह का पैसा दिया जाए। उसका PF और DA जो बनता है। वह भी उसको दिया जाए। जाहिर सी बात है, या उसका हक भी है। क्योंकि अदालत ने उसको बेकसूर माना तो उसका यह हक बनता है कि उसको नौकरी का तमाम पैसा दिया जाए। जब से उसको नौकरी से हटाया गया था।

यह कहानी थी एक ऐसे आदमी की जिस पर 29 साल मुकदमा चलता रहा और 29 साल बाद मुकदमा जीता आखिरकार उमाकांत मिश्रा को इंसाफ मिल गया। मगर उसकी पिछली जिंदगी तो बर्बाद  हो गई। जिसका हिसाब अब कोई नहीं दे सकता।