यह कहानी 1990 की नागपुर की है। यह Gangster Akku Yadav की कहानी है। उस वक्त भी काफी क्राइम हुआ करता था। नागपुर में एक इलाका कस्तूरबा नगर, जहां के लोग काफी परेशान थे। इस बस्ती में करीब 300 परिवार रहा करते थे। सब छोटा-मोटा काम किया करते थे। ज्यादा पैसा उनके पास नहीं था। मगर अपनी जिंदगी जी रहे थे।

मगर 1990 के दशक में एक शख्स वहां पर उठता है। जिसका नाम भारत कालीचरण था। मगर भारत कालीचरण के नाम से लोग उसे कम जानते थे। जब तक वह छोटा था। क्राइम की दुनिया में नहीं आया था। तब तक लोग उसे भारत कालीचरण कहा करते थे। मगर  जुर्म की दुनिया में कदम रखने के बाद उसका नाम बदल गया। उसका नया नाम Akku Yadav रखा गया।

धीरे-धीरे छोटे-मोटे क्राइम करते-करते बड़े क्राइम करने लगा। उसके पीछे पुलिस का भी हाथ था। लोकल लीडर का भी हाथ था। वह उसको अपने फायदे के लिए बढ़ावा दिया करते थे। उसके बाद वह बेलगाम होता चला गया। खासतौर से इस बस्ती में उसके आतंक और खौफ का परचम लहराने लगा। जब जो मन में आता वह कर दिया करता था। कोई सुनवाई भी नहीं हुआ करती थी। पूरी बस्ती में खासतौर से औरतों पर उसकी गंदी नजर हुआ करती थी।

जब उसे लगा कि वह ताकतवर हो गया है। पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। इसके अलावा जो नेता है। उनका हमेशा उसके सर पर हाथ है। धीरे-धीरे उसका हौसला इतना बढ़ गया। उसने इस बस्ती की औरतों को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। एक-एक करके उसने इस बस्ती की औरतों को अपना हवस का शिकार बनाया। बेचारी बहुत सारी औरत, पुलिस के पास गई। मगर पुलिस वालों ने कोई मदद नहीं की। एक औरत के साथ जब इस ने रेप किया। उस औरत ने शर्म की वजह से खुद को तेल डालकर जला लिया था। वह बाकी बस्ते के लोगों से नजर नहीं मिला पा रही थी।

gangster akku yadav
अक्कू यादव

Gangster Akku Yadav ने करीब 10 साल के अपने इस आतंक के दौर में तकरीबन 40 से ज्यादाऔरतों को अपनी हवस का शिकार बनाया। कई औरतों को तो उसने रेप करने के बाद चाकू से गोदकर मार डाला। जो वहां का थाना था। वहां पर Gangster Akku Yadav के खिलाफ दर्जनों शिकायत दर्ज थी। लेकिन पुलिस ने कभी कुछ नहीं किया। इससे उसका हौसला बढ़ता चला गया।

बस्ती के लोगों का कत्ल करना औरतों का बलात्कार करना उसकी आदत बन गई थी। एक दौर यह आया जब Akku Yadav बस्ती में आया करता था। बस्ती की औरतें अपने घरों में छिप जाया करती थी। मर्द उससे नजरें नहीं मिलाया करते थे। क्योंकि पता नहीं वह कब किसको मार डाले। जो बच्ची थी और बड़ी हो रही थी। उनके मां-बाप अक्कू यादव और उसके आदमियों से हमेशा उनको बचा कर रखा करते थे। जुल्म अपने चरम पर था। अब कोई यादव की यह दरिंदगी चलती रहे। इन 10 सालों में न किसी नेता न किसी पुलिस वाले ने कुछ किया।

ऐसा लगने लगा कि शायद यह इस बस्ती की तकदीर बन गई है। मगर तभी अचानक एक हादसा होता है। 10 साल के बाद 2004 में जो इस बस्ती में परिवार रहते थे। उनमें से एक परिवार मधुकर और उसकी पत्नी अलका इसी बस्ती में रहती थी। इन 300 परिवारों में से एक लौता परिवार था। जिसने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए बस्ती से बाहर निकाला।

मधुकर और अलका चाहते थे। उनकी बच्ची उसे पढ़ लिखकर कुछ बने। इसी लिए वह अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा उस पर खर्च कर रहे थे। उषा ने कॉलेज में जाकर होटल मैनेजमेंट का कोर्स करना शुरू किया। क्योंकि वह शुरू से ही होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने के लिए कहा करती थी।

कुछ लोगों ने अक्कू यादव के खिलाफ आवाज भी उठाई थी। मगर उनकी लाशें रेलवे ट्रैक के पास पड़ी हुई मिली थी। अक्कू यादव की दहशत पूरी बस्ती में बैठ गयी थी।

इधर उषा के कॉलेज की छुट्टी होने के बाद बस्ती वापस आ जाती है। इत्तेफाक से जब उषा घर आई हुई थी। Gangster Akku Yadav के कुछ लोग जो उसके घर के बराबर में एक परिवार रहता था। उसने पुलिस में कुछ शिकायत कर दी थी। जब अक्कू यादव के लोगों को यह बात पता चली। वह वहां पहुंचकर उषा के पड़ोस में रहने वाले घर पर हमला कर देते हैं। मूसा उस वक्त घर के अंदर थी। जब पड़ोसी चिल्ला रहे थे। वह बाहर आती है। वह देखती है, कि बहुत सारे लोग गुंडागर्दी कर रहे हैं। उनके पड़ोसी को पीट रहे हैं। वह उनके बीच में आ जाती है। उषा काफी बहादुर थी। उसे लगा कि यह तो जुल्म है। उसने उन लोगों को धमकाया।

उषा अपने घर वापस आकर पुलिस को कॉल कर देती। वह 100 नंबर पर कॉल करके पुलिस को वहां बुला लेती है। जब पुलिस आती है, तो अक्कू यादव के लोग डर जाते हैं। देख लेने की धमकी के साथ वहां से वापस चले जाते हैं। उनके जाने के बाद Gangster Akku Yadav को जब यह बात पता चलती है। बस्ती की एक लड़की ने पुलिस को बस्ती में बुलाया। यादव कुछ घंटे के बाद करीब 50 लोगों को लेकर बस्ती में वापस आता है। वह उषा के घर के बाहर आकर खड़ा हो जाता है। एक बोतल तेजाब से भरी हुई उषा के घर के दरवाजे पर मार देता है। उसके बाद घरवालों को गाली देकर बुलाते हैं।

उषा के घर वाले बाहर आते हैं। वह कहता है, कि अगर आज के बाद तुम ने पुलिस को कॉल किया। हमारे बीच में आई तो तुम्हारा भी रेप कर दिया जाएगा। तुम्हारे मां बाप को मार दिया जाएगा। उसने उसकी बात का पलट कर जवाब दिया। उसने कहा तुम अभी रुको मैं पुलिस को फोन करके बुलाती हूं। Gangster Akku Yadav ने फिर धमकी दी। मगर वह अंदर फोन करने के लिए चली गई। उषा को फोन करने से रोकने के लिए तब तक कुछ लोग घर के अंदर घुस आए थे। उषा तब भी नहीं रुकी। उसने घर के गैस का सिलेंडर खोल दिया। माचिस हाथ में ले ली। उसने कहा अगर तुम में से एक भी आगे आया। मुझे हाथ लगाया। मैं माचिस की तीली जला दूंगी। सिलेंडर फट जाएगा। तुम सब भी मारे जाओगे। अक्कू यादव समेत सारे लोग घबरा गए थे।

इसी दौरान में बस्ती के लोग भी अपने घरों से देख रहे थे। उषा लगातार माचिस हाथ में लिए उनको धमका रही थी। इस बहादुरी को देखते हुए पहली बार अक्कू यादव की हालत खराब हो जाती है। वह अपने लोगों को साथ लेकर वापस चला जाता है। यह एक मामला कस्तूरबा नगर बस्ती की तकदीर को पलट देता है। पहली बार बस्ती के लोगों ने देखा कि Gangster Akku Yadav इतने लोगों को लेकर आया। एक लड़की की धमकी के वजह से अपने आदमी को लेकर वापस चला गया।

बस्ती के लोगों को लगा Gangster Akku Yadav भी डर सकता है। जब उसे एक लड़की डरा सकती है। हम क्यों नहीं डरा सकते। यहां से बस्ती के लोगों को हौसला मिल गया। इसके बाद वह सारे बस्ती वाले इखट्टा होते हैं। कहते, हैं कि हम इतने सालों से जुल्म सह रहे हैं। कब तक सहेंगे। अब बहुत हो चुका है। हमें अक्कू यादव का मुकाबला करना चाहिए।

अब उन्होंने फैसला कर लिया था। उनको अक्कू यादव का मुकाबला करना है। अगले दिन यह लोग इकट्ठा हो जाते हैं। इन्हें मालूम था कि, अक्कू यादव घर पर ही है। यह अक्कू यादव के घर पर धावा बोल देते हैं। मगर अक्कू यादव उस वक्त वहां मौजूद नहीं था। उसके घर को आग लगा देते है। अक्कू यादव के गुंडे वहां पर मौजूद थे। गांव वालों को देखकर उनकी भी हालत खराब हो जाती है। वहां से भागने लगते हैं। उनको गांव वाले पीटते हैं, लेकिन अपनी जान बचाकर वहां से मैं भाग जाते हैं। अक्कू यादव का घर जला दिया गया था। भागते हुए लोगों से गांव वालों ने कहा था। अगर अक्कू यादव हमें अब दिखा तो हम उसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे।

जब यह बात शाम को कोई यादव के कानों में पहुंचती है। वह घबरा जाता है। उसे लगता है, कि शायद गांव वाले उसे नहीं छोड़ेंगे। वह सोचता है, कि कुछ दिनों के लिए माहौल शांत कर दिया जाए। उसे लगता है, कि गांव वाले उसे ढूंढ कर मार देंगे। वह अपनी जान बचाने के लिए पुलिस स्टेशन पहुंचकर अपने आप को सरेंडर कर देता है। उसने सरेंडर इसलिए नहीं किया था। वह सजा भुगतना चाहता था। उसने सिर्फ गांव वालों से बचने के लिए पुलिस को सरेंडर किया था।

गांव वालों को इस बात का पता चल गया था। गांव वालों को लगा कि वह जान बचाने के लिए गया है। मगर वह किसी भी दिन जमानत पर आकर किसी से भी बदला ले सकता है। यह बात गांव वालों को समझ आ गई थी।

तभी एक पेशी की तारीख आती है। यह तारीख 13 अगस्त 2004 थी। नागपुर के जिला अदालत में अक्कू यादव को पेश होना था। गांव वाले तक खबर वकीलों के जरिए पहुंच गई थी। शायद इस पेशे के दौरान अक्कू यादव को जमानत मिल जाए। वह रिहा हो जाएगा। रिहा होने के बाद वह गांव वालों से बदला लेगा।

यह खबर 12 अगस्त 2004 की है। जब गांव वालों को यह बात पता चली थी। गांव वालों को पता था कि आपको यादव को 13 अगस्त 2004 को दोपहर में 7 नंबर पर पेश होना है। इस बात से गांव-गांव की औरतों के दिलों में आग भर गई। कि वह कैसे बाहर आ सकता है। पूरे गांव ने एक बैठक की और उन्होंने तय किया कि अब अक्कू यादव का फैसला अब अदालत नहीं करेगी। अक्कू यादव का फैसला अब हमें करना है।

13 अगस्त 2004 को कस्तूरबा नगर बस्ती की 200 औरतें अदालत पहुंच जाती है। इन सभी औरतों के हाथ में लाल मिर्च का पाउडर था। सभी औरतों के हाथ में चाकू था। जिस तरीके का भी नुकीला हथियार था। उसको अपने साथ ले लिया था। उन सबको उन्होंने अपने कपड़ों के अंदर छुपाया हुआ था। वह अदालत पहुंच गई। पुलिस को जब तक इस बारे में कुछ भनक नहीं थी।

जब पुलिस वालों ने इन सब को देखा तो वह भी चौंक गए। इन औरतों ने बताया कि हम सिर्फ तारीख पर आए हैं। औरतों को यादव के खिलाफ गवाही देनी है। पता चला की गवाही ऐसे नहीं दी जाती। उसके लिए तारीख होती ।है मगर पुलिस को इनके इरादों के बारे में कुछ भी शक नहीं था। दोपहर को लंच के बाद अक्कू यादव की सुनवाई थी। शायद उस को जमानत मिल जाती। लंच के बाद पुलिस को यादव को लेकर अदालत पहुंच जाती है।

जब अक्कू यादव अदालत के अंदर जा रहा था। मगर उन्होंने अभी तक कुछ नहीं किया था। मगर अचानक चलते-चलते अक्कू यादव की नजर उन औरतों में से एक औरत पर पड़ती है। यह वही औरत थी। जिसका अक्कू यादव पहले बलात्कार कर चुका था। उसको देखते ही अक्कू यादव कहता है। तू वेश्या है। तब तक औरतें शांतिपूर्ण तरीके से खड़ी हुई थी। शायद वह अदालत के फैसले का इंतजार कर रही थी। उसके बाद कुछ कदम उठाती।

जैसे ही अक्कू यादव ने उस औरत के बारे में यह बात कही। जिसका वह पहले भी रेप कर चुका था। उस औरत को बहुत गुस्सा आ गया। उसने अपना चप्पल निकालकर पुलिस के बीच ही उसको चप्पल से मारना शुरू कर दिया। जैसे ही वह उसको चप्पल मार रही थी। पुलिस उसको हटाने लगी। उन 200 औरतों के लिए यह मौका सही था। अब अचानक वे औरते पुलिस और अक्कू यादव को घेर लेती है। वह जो लाल मिर्च का पाउडर लेकर आई थी। वह पुलिस वालों की आंखों में डाल देती है। ताकि वह कुछ देख ना सके।

क्योंकि पुलिस वालों की आंखों में मिर्च का पाउडर जा चुका था। वे परेशान हो गए थे। तभी वे औरतें अक्कू यादव की आंख में मिर्च का पाउडर डाल देती है। अपने हाथों में खंजर जो लेकर आई थी। वह निकाल लेती है। अक्कू यादव को जब खंजर नजर आते हैं। वह अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश करता है। मगर औरते उसे घेर लेती है। मगर कोर्ट के अंदर जितना जिसको मौका मिला अक्कू यादव को दौड़ा-दौड़ा कर चाकू मारती है। अदालत का कमरा और दीवार अक्कू यादव के खून से लथपथ हो जाता है।

5 मिनट तक जिसको जरा सा मौका मिला उसने अक्कू यादव को उस तरीके से मारा। 5 मिनट से ही कम वक्त में अक्कू यादव का फैसला हो चुका था। 7 नंबर के कमरे में फैसला होना था। उस कमरे से थोड़ा ही बाहर जज की बजाय उन 200 औरतों ने अक्कू यादव का फैसला किया। जो 10 साल तक उसका जुल्म सहती रही।

यह सब होने के बाद पुलिस फोर्स वहां पर पहुंची जाती है। मगर सब औरते जा चुकी थी। मगर पुलिस को उषा की कहानी मालूम थी। क्योंकि पुलिस को अक्कू यादव ने बताया था। पुलिस ने इस मामले का जिम्मेदार उषा को ही बना दिया। क्योंकि इस भीड़ में तो किसी को पहचानना मुमकिन नहीं था। उषा का पुलिस को पता था। उसी को पुलिस ने मुजरिम मान लिया। जैसे ही पुलिस ने उषा को गिरफ्तार किया। उसके साथ कुछ औरतों को भी गिरफ्तार किया था। जैसे ही यह खबर बस्ती के लोगों तक और आसपास की बस्ती तक अखबारों के जरिए पहुंची तो पूरा नागपुर गुस्से में आ गया।

जिस शख्स ने सालों तक बस्ती वालों पर जुल्म किया। आज उसी के क़त्ल में उस लड़की को गिरफ्तार किया गया। जिसने बस्ती वालों का हौसला बढ़ाया। इस बात से गुस्सा  लोगों ने पुलिस थाने के सामने धरना प्रदर्शन किया। जिससे मजबूर होकर पुलिस ने उषा को आजाद कर दिया। क्योंकि अदालत में कत्ल हुआ था। मुकदमा तो बनना ही था। इस लिए पुलिस ने 100 के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। लेकिन आखिर में अट्ठारह के खिलाफ 302 का मुकदमा चलाया गया।

करीब 10 साल तक यह मुकदमा चला। 2014 में अदालत का फैसला आया। इन अट्ठारह की अट्ठारह औरतों को बरी कर दिया गया। क्योंकि इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं था। पुलिस ने पूरी कोशिश की थी। खास तौर पर उषा को घेरने की तो पुलिस ने काफी कोशिश की थी। मगर पुलिस को कोई सबूत नहीं मिला था। क्योंकि पूरी बस्ती एक हो गई थी। यहां तक कि शहर भी एक हो चुका था। यह सब देखकर अदालत भी भावना समझ चुकी थी। सबूत के अभाव में सब को बरी कर दिया गया।

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