यह कहानी भारत के एक ऑपरेशन की जिसका नाम Operation Cactus था। अगर हम बात करें कि आजाद भारत के बाद हमने कई ऐसे ऑपरेशन किए। विदेश में जाकर किसी सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। उसमें से Operation Cactus अपने आप में एक बेहतरीन ऑपरेशन साबित होगा। उस वक्त बहुत सारे देशों ने सोचा भी नहीं था।

हम इस तरह से कर सकते हैं। जबकि जिस मुल्क में यह ऑपरेशन अंजाम दिया गया। उसने ब्रिटेन,यूएस, पाकिस्तान, श्रीलंका कई ऐसे देश से मदद की अपील की थी। हर एक की अपनी-अपनी कई मजबूरियां थी। कुछ सोचते ही रह गए। वक्त पर अगर किसी ने कदम उठाया और फैसला लिया तो वह भारत ही था। सिर्फ 9 घंटे के अंदर-अंदर भारत ने यह फैसला लेकर अपनी फौज को भेजकर पूरी तस्वीर बदल कर रख दी थी।

ऑपरेशन में से जुड़ी हुई कई चीजें हैं-

इस ऑपरेशन में से जुड़ी हुई कई चीजें हैं। जिस वक्त ऑपरेशन के लिए सेना को भेजा जा रहा था। सेना में भी इस चीज को लेकर पूरी तैयारी नहीं थी। क्योंकि (because) सब कुछ अचानक हो रहा था। वक्त नहीं था। आतंकवादी और विद्रोही लगातार आगे बढ़ रहे थे। उस देश के जो राष्ट्रपति थे उनको खतरा था। उन को अगवा किया जाना था। अगर वक्त गंवा देते तो बहुत कुछ गवा देते। इसलिए जल्द से जल्द इस ऑपरेशन को शुरू करना था। लेकिन (But) दिक्कत ये थी। हमारी सेना में उस वक्त जिन लोगों को कहा गया।

इस ऑपरेशन की तैयारी कीजिए। कुछ (Some) तो ऐसे थे। जिनको पता भी नहीं था। यह देश है कहाँ पर। दूसरा यह कि हमें जिस देश में अपनी सेना को भेजना है। वहां पर कौन-कौन से हवाई अड्डे हैं। जो विद्रोहियों के कब्जे में चले गए हैं।  एयरपोर्ट के रनवे की लंबाई कितनी है।  वहां पर हमारे प्लेन लैंड कर सकते हैं, कि नहीं। यह छोटी-छोटी जानकारी नहीं थी। फिर भी इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया।

Maldives के बारे में-

यह कहानी हमारे पड़ोसी देश मालदीप की है। जो काफी खूबसूरत है। लोग वहां पर काफी छुट्टी मनाने आते हैं। हमारे बॉलीवुड स्टार के काफी पसंदीदा है। जो वहां पर घूमने आते हैं। कई फिल्मों की शूटिंग हुई है। हमारे देश के लोगों का शौक है। वहां पर जाकर छुट्टी मनाये। यही वजह है, कि मालदीव में एक बड़ी तादाद हिंदुस्तानियों की होती है।

जो वहां पर छुट्टी मनाने जाते हैं। कभी करीब 25000 इंडियन वहां पर रहते है। जो अपना कारोबार करते हैं। एक छोटा सा देश है। जिस के करीब 4 से 5 लाख तक की आबादी है। यह सिर्फ छोटा देश इस वजह से भी है।   पूरे एशिया में सबसे कम आबादी और सबसे कम एरिया वाले सबसे छोटा मुल्क है। चारों तरफ समुंदर है इसमें करीब छोटे-छोटे 1200 के करीब दीप है। उनको मिलाकर Maldives बना।

Maldives के लिए खतरा-

इस कहानी को आगे बढ़ाया जाए। इससे पहले दो चीजें मालदीप को लेकर जब जलवायु परिवर्तन इन सारी चीजों की बात आ रही थी। उसमें यह भी था कि जिस तरीके से सारी चीजें बदल रही है। एक वक्त ऐसा आएगा कि इस Maldives का नामो निशान मिट जाएगा। समुंदर के लहरे इसको अपने होश में ले लेगी। यह पूरी तरीके से डूब जाएगा। एक वजह यह भी है, कि मालदीव का कोई सा भी ऐसा दीप नहीं है। जो 6 फीट से ज्यादा ऊंचाई का हो। मतलब सबसे ज्यादा ऊंचाई जो है वह 6 फीट की है।

जाहिर सी बात है कि हाइट काफी कम है।  ऐसे में अगर कोई समुद्री तूफान आता है। यह पूरी तरीके से बह जाएगा। इस सब को लेकर मालदीव के नेता इन चीजों को लेकर कदम उठाते रहे। बल्कि एक कैबिनेट की मीटिंग जो मालदीव की सरकार थी। उसने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था।  एक वक्त ऐसा आएगा कि समुंदर हमारे ऊपर होगा और हम समुंदर के नीचे होंग।

जब भी मालदीव के चुनाव होते हैं। वहां के नेता यह वादा करके चुनाव लड़ते हैं। हम यहां से अपनी जनता को कहीं और ले जाकर बसा देंगे। ताकि समुंदर के डूबने की वजह से हमारी जनता महफूज रहें।

मालदीव में नई सरकारका आगाज –

मालदीव में अंग्रेजों से आजादी के बाद शुरू के कुछ साल राजशाही रही। महाराजाओं ने वहां पर हुकूमत की। मगर कुछ वक्त के लिए। उसके बाद वहां पर डेमोक्रेसी के नाम पर एक नई सरकार आई। Abdul Gayoom वहां के पहले राष्ट्रपति बने। उसके बाद करीब 30 साल तक यह सत्ता में रहे। क्योंकि विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं थी। वहां पर कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। इसी वजह से Abdul Gayoom 30 साल तक वहां पर राष्ट्रपति रहे।

उसके बाद एक जनरलिस्ट ने वहां पर आवाज उठाई। सरकार के लिए कुछ नए कानून और सुधारों के लिए मांग की। क्योंकि बेरोजगारी बढ़ रही थी। वहां के लोगों का सिर्फ पर्यटन पर ही गुजारा होता था। जो उनके लिए सबसे बड़ा Source था। उन जनरलिस्ट का नाम Nasheed था। जिन्होंने यह कैंपियन चलाया। उसके बाद 2008 में 30 साल के बाद मोमिन अब्दुल गयूम चुनाव लड़ने के बाद वहां पर हार गए। Nasheed वहां पर चुनाव जीत गए। उन्होंने वहां पर सत्ता संभाली लेकिन वहां पर उथल-पुथल चलती रही।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom-

यह कहानी नवंबर 1988 की है जब Abdul Gayoom वहां के राष्ट्रपति थे। उनके भारत के साथ काफी अच्छे रिश्ते थे। उस वक्त हमारे यहां पर कांग्रेस की सरकार थी। राजीव गांधी यहां के प्रधानमंत्री थे। 3 नवंबर 1988 को मालदीव के प्रेसिडेंट Abdul Gayoom हिंदुस्तान को दौरे पर आना था। इस दौरे की दावत उनको राजीव गांधी ने दी थी। क्योंकि मालदीव एक छोटा सा देश है। भारत के प्रधानमंत्री ने मालदीव के राष्ट्रपति Abdul Gayoom को लाने के लिए वहां पर एक जहाज भेजा। आप इस जहाज में बैठकर भारत दिल्ली आ जाइए।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom के खिलाफ बगावत-

इस दौरे की जानकारी लोगों को पहले से ही थी। तब मालदीप में कुछ लोग बगावत पर उतरे हुए थे। Abdul Gayoom को सत्ता से हटाकर सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे। इस विद्रोह को जो लीड कर रहे थे। वह वहां का एक कारोबारी था। उसका नाम Abdullah Latoofi था। Abdullah Latoofi और उसके साथ उसका एक दोस्त था जिसका नाम अहमद स्माइल मलिक।

इन दोनों ने मिलकर यह प्लानिंग की थी। उनकी सरकार को गिराएंगे। हम यहां पर कब्जा कर अपनी सत्ता चलाएंगे। लेकिन अपने बलबूते पर नहीं सकते थे। क्योंकि मालदीव की सेना में इनकी पूरे तरीके से सेंध नहीं लगी थी। इन्होंने पड़ोसी मुल्क श्रीलंका से श्रीलंका के कट्टरपंथी गिरोह यह एक आतंकवादी टाइप का संगठन था। जो व्यापारी Abdullah Latoofi और मलिक ने मिलकर इस ग्रुप से बात की। उससे कहा कि हम ऐसे-ऐसे सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं।

हमें यहां का तख्ता पलटना है। श्रीलंका के संगठन के 200 आतंकवादी Boat के जरिए मालदीप पहुंच जाते हैं। 3 नवंबर 1988 को यह Maldives पहुंचते हैं। यह लोग पर्यटक के भेष में वहां पर आए थे। इनके सामान के साथ सारे हथियार थे। सिक्योरिटी की चिंता को लेकर वहां पर कोई ऐसी बात नहीं थी। इसलिए कोई ज्यादा Checking भी नहीं हुई। 200 आतंकवादी मालदेव पहुंच जाते हैं। पर्यटन की शक्ल में 3 नवंबर को यहां पर इसलिए पहुंचे थे। क्योंकि वहां के राष्ट्रपति Abdul Gayoom 3 नवंबर को ही भारत का दौरा करना था। भारत सरकार ने वहां पर अपना जहाज में भेज दिया था।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom का भारत दौरा रद्द करना-

अचानक (suddenly) भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अचानक से कोई काम आ गया। चुनाव के सिलसिले में उन्हें दिल्ली से कहीं बाहर जाना था। अब प्लेन मालदीप जा चुका था। वह प्लेन में लगभग प्लेन में बैठने ही जा रहे थे। भारत से वहां पर संदेश चला गया कि आप भारत का यह दौरा कुछ दिनों के लिए मुल्तवी कर दीजिए। क्योंकि यहां के प्रधानमंत्री Busy हैं। हम आपको एक नई तारीख बताएंगे। आप फिर भारत आ जाना। इसके बाद फिर Abdul Gayoom अपना दौरा टाल देते हैं। वह फिर वहीं मालदेव की राजधानी में रुक जाते हैं।

वह वापस अपने राष्ट्रपति हाउस में चले जाते हैं। इस दौरान में जो वहां पर बगावत करने अब्दुल्लाह लतीफी और उसके साथी की यह प्लानिंग थी। जब अब्दुल कयूम दिल्ली में रहेंगे। हम उनके पीछे यहां का तख्ता पलट कर देंगे। यहां पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन आखिरी वक्त में यह हुआ कि राजीव गांधी की वजह से मालदीव के राष्ट्रपति का दौरा रद्द हो गया। विद्रोह क्यों यह तय करना था। राष्ट्रपति के यहां होते हुए तख्तापलट करना मुश्किल है। अब आखिर में तय हुआ कि बात बहुत आगे बढ़ चुकी है।

अब श्रीलंका के जो ग्रुप हमने यहां बुलाए थे। वह 200 लोग भी यहां पर आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब चाहे जो हो जाए आज ही विद्रोह करना है, और तख्तापलट करना है।  3 नवंबर को ही जिन राष्ट्रपति को दिल्ली आना था। उसी दिन उनके इस दौरे के कैंसिल होने के बावजूद मालदीव में बगावत शुरू हो जाती है।

मालदीव की राजधानी में बगावत की शुरुआत-

मालदीव की राजधानी Malé में अचानक यह विद्रोही धीरे-धीरे कर वहां की जो वहां की सारी चीजें थी। सरकारी बिल्डिंग इसके अलावा टेलीफोन एक्सचेंज, बैंक इन सब पर कब्जा करना शुरू कर देते हैं। उनके साथ लड़ना शुरू कर देते हैं। काफी गोलीबारी शुरू हो जाती है और यह सब कुछ चल ही रहा था। तभी वहां के राष्ट्रपति Abdul Gayoom को पता चल गया। कि यहां पर तख्तापलट की साजिश हो रही है। वह परेशान हुए। उन्होंने फौरन US, Britain, Pakistan, Srilanka हर एक से मदद मांगी। कहा कि यहां पर हालत खराब हो गए हैं। आप हमारी मदद कीजिए।

राजीव गांधी से मदद की अपील-

उन्होंने राजीव गांधी से भी बात की और कहा यहां पर हालत खराब है। आप अपनी सेना भेजकर मालदीप को बचा लीजिए। उस वक्त जो वहां पर हमारे राजदूत थे वह दिल्ली आए हुए थे। क्योंकि प्रेसिडेंट को दिल्ली आना था। आमतौर पर जब किसी देश का राष्ट्रीय अध्यक्ष आता है। उस देश से वापस आ जाते हैं। इसी वजह से वहां के राजदूत भी दिल्ली वापस आ गए।

वह राजदूत अपने घर दिल्ली में सो रहे थे। सुबह-सुबह उनके पास मालदीप जो एंबेसी थी। उनके पास फोन आता है। वह बताते हैं कि यहां पर गोली चलने की आवाज आ रही है। विद्रोहियों ने तख्ता पलटने की कोशिश शुरु की है। सड़कों पर घूम रहे है। वह Abdul Gayoom को ढूंढ रहे हैं और विद्रोही उनको कब्जे में लेना चाहते हैं। ज्यादातर सरकारी बिल्डिंग में यहां तक के एयरपोर्ट पर कब्जा करते जा रहे हैं तो हमारे जो वहां पर राजदूत थे वह फौरन इसकी जानकारी हमारे विदेश मंत्रालय में देते हैं । विदेश मंत्रालय के Trough  यह खबर पी एम ओ में जाती है फिर इस वक्त तक राजीव गांधी दिल्ली से बाहर थे लेकिन यह खबर मिलने के बाद वह दिल्ली वापस आते हैं। इसके बाद एक मीटिंग होती है और यह तय होता है कि क्या किया जाए क्योंकि राष्ट्रपति ने इनसे मदद मांगी थी।

तो राजीव गांधी ने कहा हमें उनकी मदद करनी पड़ेगी और अब्दुल कयूम राष्ट्रपति को बचाना पड़ेगा क्योंकि उनका गहरा तंग होता जा रहा है क्योंकि जो विद्रोही थे और जो विद्रोह को लीड कर रहे थे उनका मकसद यह था कि Abdul Gayoom एक बार हाथ आ जाए उसके बाद तो सौदेबाजी चलती ही रहेगी तो इसलिए जरूरी था कि जो भी किया जाए जल्द से जल्द किया जाए। आनन-फानन में मीटिंग बुलाई गई और वहां  का जायजा लिया गया तो पता चला तो जो वहां की राजधानी का एयरपोर्ट है वह भी विद्रोही के कब्जे में चला गया है और अब यहां पर यह चीजें थी कि कहां जाए और उनकी कैसे मदद पहुंचाई जाए।

आर्मी चीफ को बुलाया गया और इनके साथ बातचीत हुई।  उनसे बात हुई कि क्या किया जाए कई लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि मालदीव का नक्शा कैसा है और वहां का माहौल कैसा है अब यह प्लानिंग की गई कि वहां के किस एयरपोर्ट पर हमें अपने फोर्स कोआना है। यह भी पता करना था कि कौन सा एयरपोर्ट अभी तक विद्रोहियों के कब्जे में नहीं है उस वक्त राजीव गांधी ने अपने सेक्रेटरी से कहा था कि वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट से कांटेक्ट करें कि जो अक्सर मालदीव के ऊपर उड़ते हैं उनके जरिए आनन-फानन में जानकारी ली गई इसके बाद मालदीव और इसके आसपास के इलाके की जानकारी के लिए जो पर्यटन विभाग है उनसे मदद ली गई कि वहां किस शहर में कैसे पहुंचा जा सकता है। इसके बाद जब वहां के सभी एयरपोर्ट के बारे में जानकारी ली गई तो यह हुआ कि जो नक्शे में गए और उन सबको देखा गया और आखिर में यह तय हुआ कि हमारी फौज वहां पर जाएगी और वहां जाने के बाद वह ऑपरेशन को अंजाम देगी क्योंकि Malé Airport विद्रोहियों के कब्जे में था तो वहां पर सिर्फ एक ही एयरपोर्ट बचा था जिसका नाम hul-hule airport है।

उस एयरपोर्ट की खबर यह थी कि कि उसे एयरपोर्ट पर कब्जा नहीं है। पूरे तरीके से मगर यह पता नहीं था कि उस पर पूरे तरीके से कब्जा है या नहीं अब तरीका यह था कि वहां जाए और देखा जाए कि कब्जा है या नहीं और देखा जाए और फिर कुछ किया जाए अब hul-hule airport के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं कि वहां का Runway  कितना लंबा है तो उन सारी जानकारी को इकठ्ठा किया गया। अब हमारी सेना ने यह तय किया कि वहां पर हमारी embassy में जो राजदूत हैं कि अगर वह हमारे साथ चलें जो मिस्टर बनर्जी थे। जब उनसे कहा गया कि आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा तो उन्होंने उस वक्त 2 शर्ते रखी

  1. आप विदेश मंत्रालय से परमिशन लीजिए क्योंकि मैं विदेश मंत्रालय को रिपोर्ट करता हूं।
  2. दूसरा मैंने जिंदगी में कभी सुबह जो बिना सेव किए कोई काम नहीं करता तो आप मेरे लिए एक रेजर का इंतेजाम कीजिए

उनको विदेश मंत्रालय से फौरन इजाजत मिल गई क्योंकि इसमें खुद राजीव गांधी भी शामिल थे। उसके बाद जो आगरा में एयर फोर्स का अपना बेस है वहां की कैंटीन को खुलवाया गया। उसी रात को और फिर उनके लिए वहां से रेजर टूथपेस्ट चीजों का इंतजाम किया गया और वह इसके बाद तैयार हो गए।

आगरा से उड़ान भरी जाती है और इसके बाद जो इस पूरे ऑपरेशन को लीड कर रहे थे उनका नाम बुलसारा था। वह अपने पैरा कमांडो के साथ यहां से निकलते हैं। Maldives की तरफ बढ़ते हैं यह बिना रुके maldives की तरह बढ़ते हैं यह जिस वक्त maldives में लैंड करते हैं। उस वक्त वहां पर रात थी और काफी अंधेरा था। करीब 150 कमांडो एक वक्त में वहां पर उतरते हैं और नसीब अच्छा यह था कि Hul-Hule Airport पर विद्रोही का कब्जा नहीं हुआ था और उन्होंने यह भी सोचा भी नहीं था कि यहां से हम पर अटैक हो सकता है।

एयर फोर्स का Hul-Hule Airport पर लैंड कर जाता है और कमांडो नीचे उतर जाते हैं और वहीं पर एटीसी के द्वारा क्योंकि तमाम टेलीफोन और रेडियो एक्सचेंज विद्रोही के कब्जे में थी। इस बीच में वहां पर एक चीज और होती है वहां पर डिफेंस मिनिस्ट्री के जो ऑफिसर थे वह दिल्ली में बात कर रहे थे और उन्होंने फोन किया और उन्होंने कहा कि मैं यहां देख रहा हूं कि सभी सरकारी बिल्डिंग पर विद्रोहियों का कब्जा है और गोलियां चल रही है और टेलीफोन एक्सचेंज मेरे घर के सामने हैं और उस पर भी कब्जा हो चुका है और दिल्ली से उनको कहा गया कि ठीक है पर आप यह फोन मत काटना क्योंकि अगर आपने फोन कट कर दिया तो वहां के एक्सचेंज में पता चल जाएगा कि आप कहां पर बात कर रहे थे और किस बारे में बात कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने अपना फोन काटा नहीं और अपना रिसीवर ऐसे ही नीचे रख दिया। 18 घंटे तक यह फोन ऐसे ही रखा रहा था।  जब तक कि यह ऑपरेशन खत्म नहीं हो गया था यह एक बीच की बात थी फिलहाल Hul-Hule Airport पर पहुंचने के बाद एटीसी के द्वारा Abdul Gayoom वहां के जो राष्ट्रपति थे उनसे संपर्क किया जाता है और उन्हें बताया जाता है कि भारतीय सेना वहां पर आ गई है और आप बता दीजिए कि आप कहां पर हैं वह वहां से एक सेफ जगह पर चले गए थे क्योंकि उनको अपने घर पर खतरा था।

उन्होंने बताया उनके साथ कुछ गार्ड थे और उनसे कहा गया कि हमारे कुछ लोग वहां पर आ रहे हैं और आप अपने गार्ड से बता दीजिए कि आप उनको ना रोके इसके बाद वहीं से भारतीय सेना उस हाउस के लिए रवाना होती है। लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन वार्ड तक यह मैसेज नहीं पहुंचा था कि भारतीय सेना को आने दिया जाए। वह गार्ड और कुछ समझते हैं और भारतीय सेना को रोकने लगते हैं। स्थिति यहां तक आ गई थी कि भारतीय सेना को उन पर गोली चलानी पड़ी मगर इत्तेफाक से उसी बीच में कहीं से यह मैसेज आ जाता है और वह गार्ड भारतीय सेना को अंदर जाने की इजाजत दे देते हैं उसके बाद वे राष्ट्रपति Abdul Gayoom उनको वहां से लेकर निकल जाते हैं। उस वक्त सुबह के 2:10 मिनट हुए थे जब भारतीय सेना Abdul Gayoom उनके पास उस हाउस में पहुंची थी।

बात यह थी कि Abdul Gayoom को वहां से निकालकर भारत ले जाए क्योंकि वहां के हालात सही नहीं थे लेकिन Abdul Gayoom इस बात से इनकार कर देते हैं और उन्होंने कहा कि आप मुझे यही के नेशनल सिक्योरिटी का जो Headquarter है वहां पर ले चलो और वहां पर हमारे अभी भी काफी गार्ड हैं। हमारे सेना 3:15 पर वहां से निकलती है और भारत के एंबेसी में पहुंचते हैं और देखते हैं कि ऑफिस के चारों तरफ विद्रोही के लाशें से हैं। कुछ गार्ड की भी लाशें थी और दीवारों पर अनगिनत गोलियों के निशान थी। मतलब यह कि वहां पर काफी तबाही मची थी विद्रोही के कब्जे को लेकर मगर यह सब देखकर प्रेसिडेंट Abdul Gayoom अपने आप को काबू में किए हुए थे। वहां पहुंचने के बाद आखिर में वह महफूज थे क्योंकि भारतीय सेना भी थी और उनके अपने गार्ड भी वहां मौजूद थे तो वह पहली बार यह सोच रहे थे कि अब मैं महफूज हूं यानी वह अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। उन्होंने ब्रिगेडियर बुलसारा से कहा कि वह प्रधानमंत्री राजीव गांधी से बात करना चाहते हैं सुबह ठीक 4:00 बजे सेटेलाइट फोन के जरिए क्योंकि सभी फोन पर विद्रोह में कब्जा कर रखा था तो सेटेलाइट फोन के जरिए राजीव गांधी को फोन किया गया उस वक्त राजीव गांधी जाग रहे थे। उन्होंने राजीव गांधी से शुक्रिया कहा इसके बाद जो हमारी सेना थी क्योंकि पहला काम राष्ट्रपति को सुरक्षित करना था और उन्होंने उसको सुरक्षित कर लिया था।

अब विद्रोहियों को खदेड़ना बाकी था अब भारतीय सेना के सभी जहाज और कमांडो वहां पर पहुंच चुके थे। उन सब को भी खबर मिल गई कि यह लोग यहां पर पहुंच चुके हैं और अब यहां जमना मुश्किल है। यह वहां से भागने लगे जो श्रीलंका से वहां पर आए थे वह अपनी Speed Boat से श्रीलंका भागने लगे उस वक्त भारतीय जल सेना भी एक्टिव हो चुकी थी और जो विद्रोही Boat के जरिए श्रीलंका जा रहे थे उनके साथ काफी मुठभेड़ हुई। 19 आतंकी इस मुठभेड़ में मारे गए। इधर maldives की सेना और नेशनल सिक्योरिटी की Guard थे उन्होंने इनको भगाना शुरू किया तो 48 घंटे के अंदर-अंदर maldives पूरे तरीके से शांत हो गया। वापस प्रेसिडेंट Abdul Gayoom के हाथ में कंट्रोल आ गया। जिन्होंने विद्रोह किया था उन सब को गिरफ्तार कर लिया गया । जो श्रीलंका से आए थे वह भाग गए और उनमें से कुछ मारे गए।

फिर पूरी दुनिया में इस ऑपरेशन के बारे में पता चला यहां तक कि अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक और काफी देशों ने भारतीय सेना और सरकार की काफी तारीफ की किस तरीके से  वक्त पर जाकर एक देश को तख्ता पलटने से और उसके राष्ट्रपति को अगवा होने से बचाया। एक-दो देश ऐसे भी थे जो इस ऑपरेशन को लेकर नाराज हुए जिनमें से एक श्रीलंका भी था श्रीलंका का यह कहना था किसी एक इलाके में भारतीय सेना का ऑपरेशन करना गलत है तो इस ऑपरेशन के जरिए भारतीय सेना ने दिखाया था कि हम सिर्फ अपने ही देश में नहीं बल्कि दूसरे देश में जाकर भी दूसरों की मदद कर सकते हैं और कामयाबी से कर सकते हैं इसीलिए जब भी Operation Cactus की बात आती है तो यह भारतीय सेना और भारत के लिए एक गौरव वाली चीज है। किस तरीके से इस ऑपरेशन को अंजाम देते हैं और पूरे सही तरीके से अंजाम देते हैं उसके बाद 2008 तक राष्ट्रपति Abdul Gayoom सत्ता में रहे।

One Reply to “Maldives के President को भारतीय जवानों ने कैसे बचाया था। Operation Cactus”

  • AffiliateLabz
    AffiliateLabz
    Reply

    Great content! Super high-quality! Keep it up! 🙂

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *