Purulia Arms Drop Part-2, सवाल ये था की ये जो हवाई जहाज था ये हथियार कैसे लाया इसकी जाँच की गयी तो पता चला की ये एक कार्गो प्लैन था। जो एक माल ढोने वाला प्लैन होता है और ये जहाज रूस का बना हुआ था और बुल्गारिया से ख़रीदा हुआ था। पहली बार इसने बुल्गारिया से उड़ान भरी वहाँ से उड़ान भरने के बाद ये टर्की गया वहाँ से ईरान, ईरान से कराची गया। कराची होते हुए भारत की वायु सीमा में दाखिल होता है। बनारस में ये जहाज तकरीबन 8 घंटे तक खड़ा रहा। उसके बाद ये ईंधन लेने के बाद पश्चिम बंगाल के लिये उड़ान भरता है और पुरलिया में पैराशूट के जरिये बॉक्स गिराता है। इसके बाद ये जहाज कोलकाता पहुँचता है। कोलकाता से ये थाईलैंड जाता है और थाईलैंड से जब कराची जा रहा था तब इसे मुंबई में पकड़ा गया।

Kim Davy जो की इस का मैंन आदमी था जो पकड़ा नहीं गया इस पर सुरक्षा को लेकर सवाल उठे थे। PV Narsimha Rao उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री थे। इसके बाद इसकी जाँच सीबीआई को शॉप दी गयी । सीबीआई ने जाँच के बाद जो रिपोर्ट दी उसके मुताबिक ये सारे हथियार आनंद मार्गी के लोगो के लिये थे। आनंद मार्गी एक धार्मिक संस्था है। वामपंथी सरकार जो उस वक्त पश्चिम बंगाल में थी उनका 36 का आंकड़ा था। दुनिया भर के कई देशो में इनके आश्रम है। सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक कहा गया की आनंद मार्गी का जो मुख्यालय है वो पुरुलिया में है और पुरुलिया में ही हथियार गिराए गये।

इसमें पहलू-

  1. इनको सरकार के खिलाफ हथियार चाहिए थे।
  2. इनका मुख्यालय वहां पर था।

MI6 का जो एजेंट पकड़ा गया था उसने हथियारों की जो तादाद बताई थी और जो हथियार मिले थे उनकी तादाद में काफी फर्क था। मतलब ये थे की जो हथियार ऊपर से गिराए गये उनमे से काफी काम हथियार मिले थे तो बाकी के हथियार आनंद मार्गी के लोग ले गये। हालाँकि सीबीआई की इस रिपोर्ट को अदालत के सबूतों के अभाव में ख़ारिज कर दिया तो फिर ये था की ये हथियार किसके लिये थे इसपर काफी थ्योरी सामने आई।

  1. पहली ये की बांग्लादेश में कुछ उग्रवादी लोग थे ये उनके लिये थे हथियार को बांग्लादेश में गिराना था मगर पायलट की गलती से पुरुलिया में गिरा दिए गये।
  2. दूसरी ये की ये अमेरिका ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए की करतूत थी। सीआईए ने असल में ये हथियार म्यांमार में काचेन विद्रोहियों के लिये भेजे थे।
  3. तीसरी ये की ये श्रीलंका में LTT जो काम कर रही थी उसके लिये थे।

लेकिन इस साड़ी थ्योरी को लेकर कोई पुख्ता सबूत सामने नहीं आया।

इसके बाद भारत सरकार पर भी ऊँगली उठी उसकी वजह ये थी की ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी का दावा था की भारत सरकार को इस की जानकारी थी। उसके बाद हंगामा हुआ की जब आपको ये जानकारी थी तो आपने पश्चिम बंगाल की सरकार को ये जानकारी क्यों नहीं दी। ब्रिटिश एजेंसी के मुताबिक ये सारे हथियार लेफ्ट सरकार के खिलाफ विद्रोह के लिये थे। जिससे वहाँ हिंसा कराकर राष्ट्रपति शासन लगाकर दोबारा चुनाव कराये जाये। ये सारी बात खुद Kim Davy ने बताई । 2011 में Kim Davy ने एक इंटरव्यू दिया और कहा Purulia Arms Drop के बारे में RAW,IB और भारत सरकार को जानकरी थी। उसने ये भी कहा की एक विदेशी जहाज भारत की वायु सीमा में दाखिल हो पता न चले।

इसके लिये इंतजाम किया गया था की सभी राडार को मेंटेनन्स पर लगा दिया जाये और जहाज पकड़ा न जाये। Kim Davy ने ये भी कहा हथियार पश्चिम बंगाल में हिंसा के लिये इस्तेमाल होने थे।

इसमें सीबीआई ने काफी कोशिस की के किम को भारत लाकर उस पर मुकदमा चलाया जाये। इस पर डेनमार्क ने दो शर्ते रखी थी।

  1. Kim Davy को फांसी की सजा नहीं होगी।
  2. उसे जो भी सजा होगी वो डेनमार्क में भुगतेगा।

लेकिन डेनमार्क के इस फैसले के खिलाफ Kim Davy ने वहाँ के कोर्ट में अपील की और कोर्ट ने Kim Davy को सौंपने से मना कर दिया। सीबीआई ने फिर कोशिस की मगर कोर्ट ने साफ़ इंकार कर दिया और कहा हर चीज की एक टाइम लिमिट होती जो की काफी वक्त गुजर चूका है। इस पर भी सीबीआई पर सवाल उठे थे।

जब नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो उन्होंने डेनमार्क से गुजारिश की के Kim Davy को भारत को सौंप दे लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। कहते की की Kim Davy एक ऐसा शख्स है जो बता सकता है पुरुलिया आर्म्स ड्राप का क्या सच है। लेकिन वो डेनमार्क में है, अगर उसकी मौत हो जाती है तो ये एक राज ही रहेगा । कहते है की इसमें कई देशो की ख़ुफ़िया एजेंसी भी  शामिल थी। इस पर भारत सरकार पर भी ऊँगली उठी थी।

लेकिन आज 25 साल बाद भी ये एक राज ही है?………….

Purulia Arms Drop Part-1

ये भारत के सबसे बड़े रहस्य Purulia Arms Drop की कहानी। एक विदेशी हवाई जहाज हिन्दुस्तान की एयरस्पेस में घुस जाता है, लेकिन कोई उसको पकड़ नहीं पाता। हवाई जहाज आता है, और हथियार गिराकर चला जाता है। अब यहाँ सवाल ये उठता है –

1. वे हथियार क्यों गिराये।
2. जिन्होंने हथियार गिराये वे कौन थे।
3. क्या ये सब भारत सरकार, RAW, IB, को पता था।
4. जिन लोगो को पकड़ा गया उनको उम्रकैद हुई पर बाद में सब को रिहा कर दिया गया।
5. जो इसका मैन आदमी था वो कभी पकड़ा नहीं गया।

जिस वक्त ये जहाज भारत की वायु सीमा में दाखिल हुआ उसी दिन हमारे कई सारे राडार मेंटेनन्स की वजह से बंद थे। ऐसा क्यों हुआ जो उसी वक्त हथियार गिराए गए।

Purulia Arms Drop पश्चिम बंगाल में हुआ-

बात 18 दिसम्बर 1995 की है, पश्चिम बंगाल में पुरुलिया एक जगह है। पुरुलिया की आस पास के गाँव में सुबह के वक्त कुछ लोग उठते है, और जब गाँव में जाते है तो हैरान हो जाते है, वहां देखते है की कई बड़े-बड़े बॉक्स पड़े है। अब अलग-अलग दो तीन गाँव में ऐसे बॉक्स दिखाई दिए।जब बॉक्स को खोला तो हर बॉक्स की अंदर हथियार थे जिन हथियारों में AK47, बुलेट, राकेट लॉन्चर etc. शामिल थे।

ये बात धीरे-धीरे गाँव में फैलने लगी लोग वहां पर टूट पड़े और हर कोई हथियार लेकर भागने लगा। ये बात किसी तरह लोकल पुलिस को पता चली उसके बाद डिस्ट्रिक्ट पुलिस को, उसके बाद कोलकाता और उसके बाद वहाँ के CM तक। अब बात दिल्ली PMO, RAW, IB सबको ये बात पता चल गयी। अब सब अलर्ट पर थे। वहां पर एक टीम भेजी गयी जब टीम ने हथियार देखे तो आँख फटी की फटी रह गयी । इसके बाद गाँव की तलाशी ली गयी और ऐलान किया गया की जिसके पास भी हथियार है वो जमा कर दे वरना बाद में सजा दी जायगी। जब हथियार जमा किये गए तो पता चला जिसमे 300 AK47, 15000 बुलेट, 8 राकेट लॉन्चर और भी हथियार मिले।

लोगो से जब पूछ ताछ की तो पता चला रात में एक हवाई जहाज आया था जिसकी आवाज सुनाई दी। तहक़ीक़ात से पता चला हथियार ऊपर से गिराए गए है। तब पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार थी और Jyoti Basu वहाँ के मुख्यमंत्री थे। वहाँ पर लेफ्ट और राइट की लड़ाई चल रही थी।

उसके बाद अचानक 21 दिसम्बर 1995 को थाईलैंड से कराची जा रहा एक एयरक्राफ्ट जो मुंबई की वायु सीमा में था। जिसकी कोई परमिशन नहीं ली गयी थी तो उसको नीचे उतारा गया । एयरक्राफ्ट उतारने के बाद जब सवारी से पूछताछ की तो पता चला ये वही लोग है जिन्होंने पुरुलिया में हथियार गिराए थे। जो लोग पकडे गए थे उनमे से 5 लोग Latvia के थे और एक ब्रिटिश का था जिसका नाम Peter Bleach था । Peter के बारे में पूछताछ की तो पता चला की ये एक माफिया है और हथियारों का डीलर है और सबसे बड़ी बात ये थी की ये ब्रिटिश ख़ुफ़िया एजेंसी MI6 से भी जुड़ा हुआ है।

इसी छानबीन के दौरान पता चला की ये 6 नहीं 7 लोग थे और सातवा नाम Kim Davy जो Danmark का नागरिक था और इस एयरक्राफ्ट में ही था। जब इस एयरक्राफ्ट को नीचे उतारा गया तो मुंबई एयरपोर्ट से ही वो गायब हो गया। कहा जाता है की उसने Peter Bleach से भी अपने साथ जाने के लिये कहा था । मगर Peter Bleach ने ये कह कर मन कर दिया था की वो गिरफ्तार होना पसन्द करेगा उसके पास काफी Resource है वो छूट जायगा।

उसके बाद कहते है की Kim Davy की एक MP ने मदद की और उसको वहां से निकाल कर काठमांडू ले गए और वो वहाँ से डेनमार्क चला गया।

जिन 6 लोगो को पकड़ा गया था उनको उम्रकैद की सजा हुई सजा होने के बाद वे सभी जेल में थे लेकिन सन 2000 में राष्ट्रपति ने इनकी सजा को माफ़ कर दिया क्योंकि उन्होंने रूस की नागरिकता ले ली थी। उन 6 लोगो को छोड़ दिया गया और वे रूस चले गए । उसके बाद 4 फरवरी 2004 को Peter Bleach को भी रास्ट्रपति ने माफ़ी दे दी और ये ब्रिटिश वापस चला गया।

कहते है की इन सब की रिहाई के पीछे बाहर की ताकत थी। एक तरफ रूस ने उन 5 लोगो को रिहा कराया और फिर ब्रिटिश ने प्रेसर डाला उसके बाद Peter Bleach को भी रिहा कर दिया गया।

Purulia Arms Drop पार्ट-2 भी जरूर पढ़े…………….

आज की जो कहानी है, दुनिया की सबसे परफेक्ट चोरी की है, और लोग मानते है की ये दुनिया की सबसे बड़ी चोरी है। एक रात में इतनी बड़ी चोरी की दुनिया में कोई दूसरी मिशाल नहीं मिलती। तक़रीबन 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कीमत की चोरी हुई और चोर का सुराग देने वाले को 5 लाख डॉलर इनाम देने का ऐलान किया गया। लेकिन 30 साल हो गए 30 सालो में आज तक इसका का कोई सुराग नहीं मिला। दुनिया की सबसे बेहतरीन एजेंसी कहलाने वाली एजेंसी FBI ने इसकी जांच की थी। ये  Boston Museum Art Theft की कहानी है।

जिन चोरो ने इस चोरी को अंजाम दिया था उनका आज तक कोई सुराग नहीं मिला। जो सामान उन्होंने ने चुराया था उसका कोई पता नहीं। कहा जाता है की चोर कोई न कोई सुराग छोड़ जाता है मगर वहाँ उनका फिंगर प्रिंट तक नहीं मिला। उन्होंने हर चीज का ख्याल रखा था इसी लिए आज तक FBI का हाथ खली है।

ये बोस्टन के Isabella Stewart Gardner Museumया  ‘Boston Museum Art Theft’ की कहानी है, बोस्टन अमेरिका का एक शहर है। दरअसल इस म्यूजियम में बहुत अनमोल पेंटिंग रखे हुए थे। जो दुनिया भर से लोग देखने के लिए आते थे। और पेंटिंग की कीमत अपने आप में करोडो थी क्योकि यहाँ पर Sargent, Whistler और Zorn की नायाब पेंटिंग रखी हुई थी। 18 मार्च 1990 की ये वारदात है, करीब 1:30 बजे जब म्यूजियम बंद था।
बोस्टन पुलिस की वर्दी में दो शख्स इस म्यूजियम के गेट पर आते है,और गार्ड से कहते है, उन्हें खबर मिली है की कुछ गड़बड़ है, उन्होंने गार्ड से कहा दरवाजा खोलो हमें चेकिंग करनी है। गार्ड ने बिना किसी शक के दरवाजा खोल दिया। और वो कण्ट्रोल रूम में चले जाते है।

कंटोल रूम में वे गॉर्ड से कहते है, हमें शक है इसी लिए तुम्हे हमारे साथ पुलिस स्टेशन चलना होगा। हमारे पास कॉल आई है तुमने गड़बड़ी की है तो तुम दूसरे साथी को बुलाओ जो यहाँ बैठ कर ड्यूटी संभाले और इत्तेफ़ाक़ से उसी रूम में अलार्म बटन था। जो कुछ भी गड़बड़ होने पर बजाया जा सकता है। गार्ड ने अपने दूसरे साथी को बुलाया जो उस वक्त म्यूजियम में पहरा दे रहे थे। वो सारे गार्ड उस कमरे में आ जाते है। उसके बाद वे उस गार्ड को हथकड़ी पहना देते है और बाकी सभी साथी की आँख पर पट्टी बांध देते है। फिर उन गार्ड को बेसमेंट में बंद कर देते है। उनको को बंद करने के बाद बाहर आते है। 1:30  बजे के आस पास वे म्यूजियम में दाखिल हुए हुए थे।

उसेक बाद तसल्ली से म्यूजियम में दाखिल होते है। एक-एक  करके (One by One) तमाम नायब पेंटिंग उठाते है। पेंटिंग के सिलेक्शन और कलेक्शन से पता चलता है। उनके पास पहले से ही पेंटिंग के बारे में तमान जानकारी थी। वहाँ पर रखी सैकड़ो पेंटिंग में से सिर्फ 13 पेंटिंग उठाते है। उसेक बाद वे म्यूजियम में से निकलते है और गायब हो जाते है।

Boston museum art theft

रात बीतने के बाद जब सुबह में गॉर्ड की शिफ्ट बदलनी थी सुबह की शिफ्ट वाले गार्ड म्यूजियम पहुंचते है, ये देखते है की कोई भी गार्ड ड्यूटी पर नहीं है। ये घबरा कर इधर उधर देखते है। उसके बाद तेखाने में जाते है। अंदर जाकर जो गार्ड बंधे थे उनको खोलते है,और गार्ड रात की पूरी दाश्तान बताते है।और म्यूजियम के अंदर जाते है तो देखते है की 13 नायाब पेंटिंग गायब है।

इसके बाद असली बोस्टन पुलिस को खबर दी जाती है, पुलिस वहाँ पर आती है और म्यूजियम के बाकी लोग भी वहाँ पर पहुँचते है। उसके बाद उन चोरी हुई पेंटिंग की कीमत का अंदाजा लगाया जाता है। जो पेंटिंग चोरी हुई थी उनकी इंटरनेशनल मार्किट में 50 मिलियन डॉलर की कीमत थी। उसके बाद पुलिस छान बीन शुरू कर देती है। वे जो चोर पुलिस बनकर आए थे उन्होंने ख्याल रखा था की उनका चेहरा सही से किसी को न दिखाई दे। इसी वजह से वे रौशनी वाली जगह में चेहरे को ज्यादातर छुपा लेते थे। इसी वजह से किसी भी गार्ड को उनका पूरा चेहरा याद नहीं था। क्योंकि उन्होंने अपना पूरा चेहरा किसी गार्ड को भी नहीं दिखाया। पुलिस तहकीकात करती रही और दुनिया भर में इस चोरी की खबर फेल गयी।

जब लगा की पुलिस इस की सही से छानबीन नहीं कर सकती क्योंकि काफ़ी क़ीमती चोरी हुए थी तो ये केस FBI को दे दिया गया। अब FBI ने अपनी जाँच वही म्यूजियम से शुरू की तमाम गार्ड से पूछताछ की मगर FBI के हाथ सिवा इस कहानी के की चोरी किस तरह हुई कुछ हाथ नहीं लगा।

यहाँ तक की FBI 30 सालो में उनका स्क्रैच तक नहीं बना पाई तो पते की तो अलग बात है। की वो दीखते कैसे है। जब FBI के हाथ भी कुछ नहीं लगा तो म्यूजियम वालो ने पहल की और पेंटिंग या चोरो का पता बताने वाले को 5 लाख डॉलर इनाम देने का ऐलान कर दिया। लेकिन इसके बाद भी कुछ फायदा नहीं हुआ।

FBI 26 साल बाद ऐलान करती है की उनके हाथ एक सबूत लगा है और वो इस केस (Boston Museum Art Theft) को हल कर लेगी। उनको जो सुराग मिला वो दो चीजे थी एक एक तो ये की Konepaketit और दूसरा Filadelfia इन दो जगह पर पेंटिंग को भेजा गया। FBI का कहना था की हमारे पास सबूत है की जो पेंटिंग चोरी हुई थी वो वहाँ भेजी गयी थी। लेकिन उसके बाद से क्या हुआ पेंटिंग किसके पास और कहा है इसकी जानकारी नहीं है।

इसके बाद FBI वहाँ के लोगो से पूछताछ करती है,लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ। 2016 के बाद FBI को जानकारी मिली की पेंटिंग के ताल्लुक से जानकारी किसी शख्स के पास है और वो इस वक्त पुलिस की हिरासत में है। वो जानकारी ये थी की उसके पास से एक लिस्ट मिली थी जिसमे उन पेंटिंग के नाम लिखे थे। लगा की अब मामला सुलझ जायगा मगर इसकी तहकीकात भी एक सिरे पर जाकर ख़त्म हो गयी । दुनिया भर के कई देशो में FBI ने अपने एजेंट भेजे जहा से भी कुछ खबर मिलती मगर हर जगह FBI खली हाथ वापस आई।

इसलिए (Hence) एक्सपर्ट इस (Boston Museum Art Theft) की चोरी को एक रात में हुई सबसे बड़ी और परफेक्ट चोरी मानते है, क्योंकि इससे जुड़ा हुआ कोई भी चोर आज तक नहीं पकड़ा गया।

ये कहानी America के 35 वे President John F Kennedy Murder की है। जिनकी गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। एक तो अमेरिकी राष्ट्रपति और उसके साथ कुछ हो जाये और वो रहस्य रहे ये सुनकर अजीब लगता है । लेकिन ये एक हक़ीक़त है। आज तक ये नहीं पता चला कि अमेरिकी राष्ट्रपति को जो गोली मारी गयी थी वो क्या था वो शाजिस थी या किसी सरफिरे का बदला था।

इस कहानी में कई सारी ऐसी चीजे है जो आज भी लगभग 52 सालो बाद ये नहीं पता चला की John F. Kennedy का जो क़त्ल हुआ था उसके पीछे कौन था। अमेरिकी एजेंसी FBI ने इसकी जांच की थी। अमेरिका में अब तक चार राष्ट्रपति की इस तरह से मौत हो चुकी है । John F. Kennedy जवान होने के साथ-साथ खुबशुरत भी थे। सिर्फ 2 साल 10 महीने 2 दिन ये राष्ट्रपति रहे ।

इनकी मौत लो लेकर दो चीजे थी। क़त्ल के लगभग 2 घंटे के अंदर अमेरिकी पुलिस ने एक शख्स को गिरफ्तार किया। पुलिस ने कहा की यही राष्ट्रपति का क़ातिल है। 48 घंटे के भीतर जिसे राष्ट्रपति का क़ातिल समझ रहे थे। कोई दूसरा आदमी पुलिस हिरासत में गोली मार देता है। जब आरोपी को दूसरी जेल में शिफ्ट किया जा रहा था। मारने वाला शख्स ये कहता है। मैंने इसे सिर्फ इसलिए मारा की मुझसे राष्ट्रपति John F Kennedy Murder बर्दास्त नहीं हुआ। इसलिए मेने इसी गोली मार दी।

लेकिन बात यही नहीं रुकी आरोपी को मारने वाले शख्स की अचानक मौत हो जाती है। अब यहाँ सवाल ये था की इस केस से जुड़ा हुआ हर शख्स मारा गया। कहीं ऐसा तो नहीं था की इस केस के पीछे कोई तीसरा शख्स था जो नहीं चाहता था की ये राज खुले।

उस वक्त शीत युद्ध चल रहा था। क्यूबा से अमेरिका की लगभग जंग की स्थिति आ गयी थी। इस वजह से रूस के साथ भी अमेरिका के रिश्ते सही नहीं थे और ये सब John F Kennedy के कार्यकाल में चल रहा था । उस वक्त ये बात भी सामने आई थी की क्यूबा के राष्ट्रपति की John F Kennedy ने सुपारी दी थी।

लेकिन फिर बाद में रूस के साथ समझौते से जॉन की पॉपुलैरिटी बढ़ गयी और कुछ चीजे सही होने लगी। राष्ट्रपति की मौत के पीछे कुछ लोग क्यूबा का भी हाथ बताते है। कुछ लोग इंटरनल शाजिस बताते है, लेकिन हकीकत किसी को मालूम नहीं।

ये 21 नवम्बर 1963 की बात है, अमेरिका में एक शहर डलास है,उस वक्त डलास में एक चीज और भी थी की जो उस वक्त डलास के गवर्नर और democratic पार्टी के रिश्ते आपस में सही नहीं थे। जॉन फ इस लड़ाई को कम करने के लिए और समझौता कराने के लिए डलास जाने का फैसल करते है। लेकिन उससे पहले एक चीज और भी थी के ये डलास न जाये उसकी वजह ये थी के उस वक्त UN में अमेरिका के जो राजदूत थे उनको लेकर डलास में काफी विरोध प्रदर्शन हुआ था और ख़ास तौर पर वहां के रिटेल कारोबारी ने FBI को चेतावनी दी थी के डलास में John F Kennedy के खिलाफ काफी गुस्सा है और उनकी जान को खतरा है। इस लिए वो डलास ना आये।

John F Kennedy murder
John F Kennedy In Dallas

लेकिन वाइट हाउस और एजेंसी ने इस बात को नहीं माना और 22 नवम्बर 1963 जॉन फ कैनेडी डलास पहुँच जाते है। दोपहर 12 बजे वो डलास पहुँचते है और उनके कहने पर उकनी कार की ऊपर की छत खोल दी गयी। उनका काफिला आगे बढ़ रहा था उनके साथ उनकी बीवी और वहां के गवर्नर थे। उनको देखने के लिए लाखो की तादाद में लोग वह पहुंचे थे। तकरीबन 12:30 PM का वक्त था वो लोगो का स्वागत कर रह थे तभी उनका हाथ गर्दन की तरफ जाता है।

उनके सर का कुछ हिस्सा और खून उनके साथ जो उनकी बीवी थी उनको आकर लगता है, और वो गिर जाते है, चारो तरफ अफरा तफरी थी तभी उनको हॉस्पिटल ले जाया जाता है हॉस्पिटल पहुँचने तक उनकी सांसे चल रही थी मगर हॉस्पिटल पहुँचने के बाद करीब 1:00 PM बजे उनकी मौत जो जाती है।

2 घंटे के अंदर पुलिस एक 24 साल के शख्स को पकड़ती है जिसके पास एक गन मिलती है। पर वो शुरू से मना कर रहा था की उसने खून नहीं किया है। अब वहाँ के उपराष्ट्रपति ने जिद लगाई थी की पहले वो राष्ट्रपति की सपथ लेगे तब राष्ट्रपति John F. Kennedy को वाशिंगटन लेकर जायँगे। अब अमेरिकी राष्ट्रपति John F. Kennedy को वहाँ के उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति  की सपथ लेने के बाद फ़ौरन वाशिंगटन ले गए। जबकि उन की लाश का पोस्टमार्टम वही पर होना चाहिए था। वो जो लड़का गिरफ्तार हुआ था अचानक एक शख्स आकर उसे मार देता है और कहता है की उसने उसे इस वजह से मारा क्योंकि उससे John F. Kennedy की बीवी का दर्द देखा नहीं जा रहा था। कुछ दिनों बाद उसकी भी मौत हो जाती है, बताया ये गया की उसने खुदख़ुशी की।

अब इसके पीछे कौन था आज तक सही से नहीं पता चला । कुछ लोगो का मानना है इस केस की जाँच सही तरीके से नहीं हुई । मगर John F Kennedy Murder के पीछे कौन था। आज तक किसी को नहीं मालूम। वो जो 24 साल का लड़का जो पकड़ा गया था दो साल पहले रूस और क्यूबा गया था। कुछ का शक इस लिए क्यूबा पर भी जाता है। मगर सोचने वाली बात ये है की जहा से गोली चलाई गयी। वहाँ पर शूटर अकेला तो नहीं होगा। कोई तो उसका साथी होगा। मगर आज तक ये एक राज ही है……………

आज बात ऐसी कहानी की है जो जासूसी की दुनिया से ताल्लुक रखती है, दूसरी बात ये की एक ही आदमी को हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्को में एक सी मुकदमा की सजा मिली। ख़ास बात ये है की एक सख्स दो अलग-अलग एजेंसी के लिए काम करता है, और RAW (भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी) और ISI (पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी) को बेवकूफ बनाता है। ये कहानी Ganga Airlines Hijack की है।

कहानी हाशिम कुरैशी की है, जो कश्मीर में श्रीनगर का रहने वाला है। जो पहले RAW के लिए काम करता है, जिसे पाकिस्तान में POK में भेजा जाता जाता है। बाद में इसी उसका दिमाग बदल कर अपने लिए काम करने के लिए तैयार कर लेती है।

जब हाशिम कुरैशी बड़ा होता है, उससे BSF के जरिये RAW से मुलाकात कराई जाती है, उससे कहा जाता है, की वो POK जाये और वहाँ RAW के लिए काम करे क्योंकि वो POK को अच्छी तरह से जनता है।

1969 में पेशावर में किसी रिस्तेदार की शादी में हाशिम कुरैशी जाता है, और वह जाते ही उसकी मुलाकात मकबूल भट्ट से होती हो। जो NLF (नेशनल लिबरेशन फ्रंट) का अध्यक्ष था। ये वही मकबूल भट्ट है जिए बाद में तिहाड़ जेल में फांसी होती है। वह मुलाकात में कश्मीर की आजादी की बाते होती है, इसी बीच उसकी मुलाकात पाकिस्तान की आई अस आई से कराई जाती है। वहाँ हाशिम कुरेशी से कहा जाता है की तुम कश्मीर के लिए काम करो। और वहाँ एक पायलट के जरिये हाशिम कुरैशी को ट्रेनिंग दी जाती है। और उससे राजीव गाँधी का पायलट हाईजैक करने के लिए कहते है। उस वक़्त इंद्रा गाँधी देख की प्रधानमंत्री थी।

अल फतह नाम का एक नया आर्गेनाईजेशन नाता था अल फतह के करीब 36 आदमियों को BSF ने गिरफ्तार कर लिया था। इसको लेकर बाकी की आर्गेनाईजेशन में काफी नाराजगी थी, और वो चाहते थे, की इनको आजाद कराया जाये।

जब कुरैशी को BSF और RAW की तरफ से पकिस्तान भेजा गया था तो वो इसी के बहकावे में आ गया और वो इसी के लिए ही काम करने लगा।

 RAW ने Ganga Airlines Hijack का ड्रामा कैसे किया-

जब पकिस्तान से Training लेने के बाद कुरैशी भारत लौटता है, तो वो यहाँ BSF के हत्ते चढ़ जाता है। BSF के सख्ती पूछने के बाद कुरैशी ने ISI की पूरी पलानिंग के बारे में RAW को बता दिया और हवाई जहाज हाईजैक की पूरी कहानी उगल दी । रॉ ने कहा अगर तुम मौत से बचना चाहते हो तो अब हमारे लिए काम करो और उससे हवाई जहाज हाईजैक करने को कहा जाता है मगर रॉ के तरीके से। इंडिया एयरलाइन का एक हवाई जहाज था जिसका नाम गंगा था वो काफी पुराना था।

गंगा एयर लाइन को श्रीनगर से जम्मू के लिए तैयार किया गया और Ganga Airlines Hijack करने के लिए कहा गया । इसमें कुरैशी का एक कजन अशरफ कुरैशी को भी शामिल किया जाता है। अब इन दोनों को नकली खिलोनो वाला हथियार दिया गया। 30 Jan 1971 को हवाई जहाज उड़ान भरता है। प्लान के तहत इसको अगवा किया जाता है, और लाहौर के एयरपोर्ट पर उतरने की इजाजत मांगी जाती है । पाकिस्तानी अथॉरिटी फौरन उसको उतरने की इजाजत दे देती है। इसमें हाशिम कुरैशी और उसका कजन अशरफ कुरैशी थे। आल इंडिया रेडियो ने फौरन इसकी खबर को ब्रेक कर दिया। अगवा करने के बाद उन्होंने अल फतह के 36 लोगो को रिहा करने की डिमांड राखी । इसके बाद बात चीत हुई । फिर उसमे मौजूद 30 यात्रियों को वाघा बॉर्डर के जरिये भारत लाया गया। करीब 80 घंटे के बाद वो Hijacker उस हवाई जहाज को आग लगा देते है, और वो जलकर राख हो जाता है।

इसके बाद भारत फौरन एक्शन लेता है और पाकिस्तान की नापाक हरकत दुनिया के सामने बताता है। इसके बाद भारत ने अपने एयर स्पेस में पाकिस्तानी हवाई जहाज के लिए रोक लगा दी। इसका फायदा ये हुआ की पाकिस्तानी फ्लाइट को पूर्वी पकिस्तान (जो अब बांग्लादेश है) जाने में 3 गुना वक्त लगा। भारत को इसका फायदा पकिस्तान के साथ 1971 की जंग में हुआ

बाद में जब पाकिस्तान को हाशिम कुरैशी की चाल का पता चला तो कुरैशी को गिरफ्तार कर लिया गया। साथ में अशरफ कुरैशी के साथ 36 और लोगो को गिरफ्तार किया गया। जिसमे मकबूल भट्ट भी था। बाकी तो कुछ दिनों बाद रिहा हो जाते है, हाशिम कुरैशी को सात साल की सजा हो जाती है।

पाकिस्तान में सजा काटने के बाद के बाद तक़रीबन वो कनाडा चला जाता है, 29 दिसम्बर 2001 को कुरैशी भारत वापस आता है पुलिस उसे एयरपोर्ट पर ही गिरफ्तार कर लेती है। उस पर मुकदमा होता है बाद में उसे कश्मीर ट्रांसफर कर दिया जाता है। उसकी एक दलील थी के उस को इस गुनाह की सजा मिल चुकी है। और वो रिहा हो जाता है, क्योंकि भारत का भी यही कानून है। किसी को एक गुनाह की दो बार सजा नहीं मिल सकती।

नोट:- इस सब में पाकिस्तान का दावा था की ये एक भारत की चाल थी वो उसने खेल खेला, और भारत का दावा था की उसने पाकिस्तान की नापाक हरकत को बेनकाब किया, की पाकिस्तान कैसे हिजकेर को अपने यहाँ पनाह देता है।

इजराइल के Mossad Operation Wrath Of God की सबसे खतरनाक कहानी। जर्मनी के Munich City में Olympic हो रहा था।  इस Olympic को शुरू हुए करीब एक हफ्ता बीत चुका था। दुनिया भर के खिलाडी जो Olympic में हिस्सा लेते है। वो हिस्सा ले रहे थे। इसमें इजराइल की टीम भी शामिल थी। पहला एक हफ्ता Olympic का बहुत ही शांतिपूर्ण बीता। लेकिन एक हफ्ते बाद ‘5 September 1972’ को ये वो दिन जिसे Israel कभी नहीं भूलता। इसी दिन इस Operation Wrath Of God की बुनियाद रखी थी। ये operation जो करीब 20 वर्षो तक चला। न जाने यूरोप के कितने ही देशो में चला।

‘5 September 1972’ को Olympic में 8 लोग Tracksuit पहने हुए उस Olympic की दीवार को फांदने की कोशिस केर रहे थे। उनके लिबास से लग रहा था। वो भी Olympic के खिलाडी है। किसी देश के खिलाड़ी है। जो यहाँ आये हुए है। इत्तेफाक से कनाडा के कुछ खिलाडी ने इन्हे देखा। जिन्होंने Tracksuit पहना हुआ था। जो दीवार फांदने की कोशिस केर रहे थे। उन्हें लगा की शायद ये किसी देश के खिलाडी है। जो Olympic में हिस्सा लेने आये हुए है। जो दीवार फांदने की कोशिस केर रहे है। इनसे दीवार Jump नहीं हो रही है। उन 8 खिलाडी की अनजाने में दीवार फांदने में मदद केर दी।

इसरायली खिलाड़ियों पर हमला-

ये सोच केर की ये भी खिलाडी है। इसके बाद वे कनाडा के खिलाडी चले जाते है। अब ये Tracksuit पहने हुए लोग अंदर पहुंचते है। शायद उनके पास जानकारी थी। इजराइल के खिलाड़ियों के कमरे किधर है। इसके बाद ये इजराइल के खिलाड़ियों के कमरे की तरफ बढ़ते है। इनके कपड़ो के अंदर तमाम हथियार छुपे हुए थे। ये इजराइली खिलाडी की तरफ जाते है। उन्हें ढूंढ़ना शुरू केर देते है। उनमे कुछ इजराइल के पहलवान भी थे। जो इनकी गोली चलाने पर इनका चाक़ू से मुकाबला करता है। मगर इस गोलीबारी से इजराइल के दो खिलाडी मारे जाते है। बाकी 9 खिलाडी को ये बंधक बना लेते है ।

ये जो Tracksuit पहने हुए 8 लोग थे। दरअसल खिलाडी नहीं थे। बल्कि Palestine Liberation Organisation के लोग थे। बंधक बनाने के बाद चूँकि Olympic में अफरा तफरी मच चुकी थी। जर्मनी के सरकार परेशान थी। उसके बाद उनकी डिमांड सामने आती है। इजराइल की जेल में Palestine Liberation Organisation के जो 234 लोग कैद है। उनको रिहा किया जाये।

इजराइल का समझौता न करना-

मगर इजराइल के अंदर ये कानून है। किसी दुश्मन के साथ कोई समझौता नहीं करता। इजराइल ने बिना देर किये समझौते से फौरन मना कर दिया। वो कोई समझौता नहीं करेगा। जब ये पैगाम यहाँ पहुँचता है। जो दो खिलाडी मर चुके थे। इन Palestine Liberation Organisation (PLO) के लोगो ने उनकी लाशो को बाहर फेंक दिया। उनसे कहा अगर तुमने हमारी बात नहीं मानी तो हम बाकी खिलाडी को भी इसी तरह मार देंगे। जर्मनी की Authority उन खिलाडी की लाशो को उठा कर ले गयी।

लेकिन (But) इतना कुछ होने बाद भी इजराइल का इरादा नहीं बदला। वो किसी तरह की बात करने के लिए तैयार नहीं था। उस वक़्त Golda Meir इजराइल की प्रधानमंत्री थी। अब सोचने की बात ये थी कि Olympic में हमले के बाद क्या सूरतेहाल होगी। इजराइल क्या करेगा। जबकि उसके खिलाडी कैदी बन चुके है। मगर इजराइल ने साफ़ तोर पर इंकार कर दिया की वो किसी तरह का समझौता नहीं करेगा।

इजराइली फ़ौज भेजने की दरख्वास्त-

मगर इसी बीच इजराइली सरकार ने जर्मनी कि सरकार से से दरख्वास्त कि के वो Munich में अपनी स्पेशल फोर्सेज को भेजना चाहता है। वो एक Operation के जरिये अपने खिलाडी को आजाद कराना चाहता है। इसकी इजाजत जर्मनी कि सरकार दे। ( क्योंकि किसी भी देश में अपनी फोर्सेज भेजने के लिए उस देश की सरकार की इजाजत की जरुरत होती है )। मगर जर्मनी की सरकार ने ये सोच कर की Olympic में कई देशो के खिलाडी है। कही ज्यादा खून ख़राबा न हो जाये इजाजत नहीं दी। इजराइल के लिए ये रास्ता भी बंद हो गया था।

PLO के लोगो की शर्त में बदलाव-

काफी वक्त बीतने के बाद PLO को लगा की इजराइल शायद उनकी शर्त नहीं मानेगा। उन्होंने अचानक अपनी शर्त बदली और कहा कि हमें Munich से निकल जाने कि इजाज़त दो। हम इन इजराइली खिलाडी को बंधक बनाकर ले जायँगे। जर्मनी को लगा कि शायद Olympic से एयरपोर्ट तक जाने में शायद कोई मौका मिल जाये। खिलाडी को आज़ाद करा लिया जाये। जर्मनी ने उनकी शर्ते मानकर उनको बस दे दी।

वे बंधक को लेकर एयरपोर्ट कि तरफ रवाना हो गए। वो शाम का वक़्त था। एयरपोर्ट में जगह-जगह पर शार्पशूटर को बैठाया गया। ये जर्मनी के अपने शूटर थे। जर्मनी को अंदाजा था कि मौका मिलते ही वे खिलाडी को आजाद करा लेंगे। एयरपोर्ट पर पहुँच कर बंधक को बस से उतार कर हेलीकॉप्टर में बैठाया गया। जब ये फलीस्तीन के लोग हेलीकॉप्टर कि तरफ जाने लगे तो शार्पशूटर ने गोली चलाना शुरू कर दी। बदले में फलीस्तीन के लोगो ने भी गोली चलाना शुरू कर दी।

जब उन्हें लगा कि वो घिर गए है। उन्होंने खिलाडी पर भी गोली चलाना शुरू कर दी। सभी खिलाडी को मार दिया। उस वक्त खिलाडी कि मौत कि खबर सामने नहीं आई। मगर सुबह तक सब साफ़ हो गया कि सभी खिलाडी मर चुके है।

Mossad Operation Wrath Of God की बुनियाद-

इजराइल कि प्रधानमंत्री ने फ़ौरन एक बैठक बुलाई। Mossad के चीफ भी उस बैठक में शामिल थे। उस बैठक में ये तय हुआ कि इस फलीस्तीन के ऑपरेशन में जो भी शामिल था। जैसे मास्टर माइंड कौन था। फंडिंग कहा से हुई आदि। उनमे से किसी को भी नहीं छोड़ना। चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में हो। इस का नाम Operation Wrath Of God रखा गया। यानी खुदा का कहर। इसमें ये तय हुआ कि जो इस Mossad के Operation Wrath Of God में शामिल होंगे।

1. वो भूल जाये कि उनका कोई परिवार है।
2. वो किसी परिवार, रिश्तेदार से बात नहीं करेंगे ।
3. अगर वो कही पकडे जाते है तो वो ये नहीं कहेंगे कि वो इसरायली है।

Operation Wrath Of God की शुरुआत-

सबसे पहले मोसाद ने ऐसे लोगो कि लिस्ट बनाई। जिनका ताल्लुक इस हमले से था। फिर ऐसे एजेंटो को तैयार किया गया। जो मिशन को अंजाम दे सके और गुमनाम रहे। वे बिना किसी कि मदद के इस मिशन को अंजाम दे सके। मिशन के शुरू होने के कुछ महीने बाद मोसाद के एक एजेंट ने वेल जवेटर और मेहमूद कुरैशी का क़त्ल कर दिया गया। अब अगले टारगेट कि बारी थी। मोसाद ने एक आदमी पर नज़र रखनी शुरू कर दी। जिसका ताल्लुक इस हमले से था। इस शख्स का नाम हुसैन अल बशीर था। जो एक होटल में रहता था। वो होटल में सिर्फ रात को ही आता था। दिन के शुरू होते ही निकल जाता था। मोसाद ने उसे मारने के लिए उस के बिस्तर में बम लगा दिया। जो कि एक आसान काम था।

मगर मुश्किल ये थी के कैसे पता किया जाये कि धमाके के वक्त हुसैन बिस्तर पर था। इसके लिए मोसाद के एजेंट ने उस के बराबर में एक कमरा ले लिया। जिसकी बालकनी से उस के कमरे में देखा जा सकता था। रात में जैसे ही वो बिस्तर पर लेटा उसी वक़्त पूरा कमरा धमाके से देहल गया।

स्प्रिंग ऑफ़ युथ ऑपरेशन की शुरुआत-

फलीस्तीनी को हथियार देने के शक में बेरुत के प्रोफेसर बासिल अल कुबेसी को गोली मार दी गयी । मोसाद के एजेंटो ने उसे 12 गोली मारी। मोसाद कि लिस्ट में शामिल तीन लोग लेबनान में भरी सुरक्षा के बीच रह रहे थे। मोसाद ने उन तक पहुंचने के लिए एक स्प्रिंग ऑफ़ युथ ऑपरेशन शुरू किया। जो Operation Wrath Of God का ही एक हिस्सा था। 9 अप्रैल 1973 को इजराय़ल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर एक बोट के जरिए पहुंचे।

ये कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे। इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया। इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारे गए। वहीं इजरायल का एक कमांडो घायल हो गया। इस ऑपरेशन के फौरन बाद तीन हमले और किए गए। इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया। वहीं ब्लैक सेप्टेंबर के दो किशोर सदस्य अब्देल हमीन शिबी और अब्देल हादी नाका रोम में कार धमाके में घायल हो गए।

लगातार दुश्मनो को निशाना बनाना-

इसके बाद मोसाद ने फिर अपने मिशन को जारी रखा और इसी तरह अपने दुश्मनो को निशाना बनाते रहे जिनमे ये लोग निशाना बने।

1. 28 जून 1973 को इस हमले से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर लगाकर मार दिया गया।
2. 15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई।
3. 17 जून 1982 को PLO के सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया।
4. 23 जुलाई 1982 को पेरिस में PLO के फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया।
5. 21 अगस्त 1983 PLO के मून मेराइश एथेंस में मार दिया गया।
6. 10 जून 1986 को एथेंस में PLO के खालिद अहमद नजल मारा गया।
7. 21 अक्टूबर 1986 को PLO के मुंजर अबु गजाला को बम से उड़ा दिया।
8. 14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया

अली हसन सालामेह हमले का मास्टरमाइंड-

अगला नंबर अली हसन सालामेह का था। जो Munich के हमले का मास्टरमाइंड था। मोसाद ने हसन सलामेह को एक रेड प्रिंस कोड नाम दिया था। ये बात सलामेह भी जानता था। मोसाद के जासूस अली की तलाश पूरी दुनिया में कर रहे थे। इसीलिए उसने सुरक्षा का घेरा बढ़ा दिया था। नार्वे में साल 1973 और स्विट्जरलैंड में साल 1974 में मोसाद ने सलामेह को जान से मारने की कोशिश की लेकिन वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई।

अली हसन सालामेह की मौत-

इसके बाद साल 1974 में स्पेन में एक बार फिर सलामेह की हत्या की कोशिश की गई। लेकिन वो फिर बच निकला। साल 1979 यानि पांच साल बाद मोसाद ने एक बार फिर सलामेह को लेबनान की राजधानी बेरूत में ढूंढ़ निकाला। 22 जनवरी 1979 को एक कार बम धमाका कर सलामेह को भी मौत के घाट उतार दिया गया। म्यूनिख कत्ल-ए-आम का गुनहगार मारा जा चुका था। लेकिन म्यूनिख क़त्ल-ए-आम के 7 साल बाद तक चले मोसाद के ऑपरेशन में उसके एजेंट्स ने 11 में से 9 फलस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया था। वैसे ये भी एक सच है कि करीब 20 साल तक चले इस सीक्रेट Operation Wrath Of God में Mossad ने कुल 35 फलस्तीनियों को मारा था।

इस पुरे ऑपरेशन मै मोसाद एक गलती कर देती है। जिसकी वजह से इस ऑपरेशन का पर्दाफास हो जाता है। वो ये थी की यूक्रेन मे एक होटल के वेटर को भी इस हमले मे शामिल होने के शक पर मार दिया जाता है। वहाँ की पुलिस इस मर्डर मे मोसाद के कुछ एजेंट को गिरफ्तार कर लेती है। सारी दुनिया ये बात फेल जाती है। यूनाइटेड नेशन के दबाव के बाद मोसाद इस ऑपरेशन को कुछ दिनों के लिए बंद कर देती है। कुछ दिनों बाद फिर से इस ऑपरेशन को शुरू कर देते है।