ये कहानी BhadreshKumar ChetanBhai Patel FBI Most Wanted की है। यह शख्स गुजरात के वीरमगाम इलाके में पैदा हुआ। जिसका नाम भद्रेश कुमार चेतन भाई पटेल था। पैदाइश के बाद से यह वही पर रहता है। 2015 में गुजरात में ही इसकी शादी हो जाती है। इसकी वाइफ का नाम पलक था। शादी के कुछ दिन बाद ही भद्रेश अमेरिका जाने का फैसला करता है। उसकी वजह यह थी कि भद्रेशकुमार चेतन भाई पटेल के बहुत सारे रिश्तेदार अमेरिका में थे। अच्छी पोजीशन पर थे। शुरुआत में तो यह हनीमून मानाने के इरादे से वहां पर जाता है। इसी हिसाब से इसको वहां पर Visa मिला था। अमेरिका जाने के बाद भद्रेश का मन बदल जाता है। वह सोचता है, वह यहीं पर रहेगा। यहीं पर अपनी जिंदगी गुजारेगा।

पलक का अमेरिका में रहने से मन करना-

मगर पलक वहां पर रहने से मना कर देती है। वह वहां घूमने और हनीमून मनाने के इरादे से ही गयी थी। इसके बाद इन दोनों में टकराव शुरू हो जाता है। पत्नी का कहना यह था कि अपने घर वापस चले। अपने देश में ही रहे। वहीं पर नौकरी करें पति चाहता था कि अब अमेरिका को छोड़कर नहीं जाएंगे। इस दौरान में उसके एक रिश्तेदार थे। जिनका वहां पर अपना एक Dunkin Donuts Store था। वहीं पर अपने रिश्तेदार के यहां इन्होंने पार्ट टाइम जॉब करना शुरू कर दिया। इस Dunkin Donuts Store में यह दोनों पति पत्नी काम करते थे।

Bhadreshkumar Chetanbhai Patel FBI Most Wanted
Bhadresh Kumar Chetan Bhai Patel

अप्रैल आते-आते इनका वीजा खत्म हो चुका था। अब इनको इंडिया वापस आना था। लेकिन भद्रेश मन बना चुका था कि वह वापस भारत नहीं लौटेगा। वीजा खत्म होने के बावजूद भी वह अमेरिका में रह रहा था। क्योंकि वहां पर उसके रिश्तेदार थे। इसी वजह से एजेंसी भी उसको नहीं पकड़ पा रही थी। वह वहीं पर dunkin donuts store में ही काम करने लगा।

पलक का क़त्ल-

12 अप्रैल 2015 की बात है। रात करीब 9:30 के आसपास दोनों की रात की ड्यूटी थी। यह स्टोर में जाते हैं। सीसीटीवी कैमरे में यह दिख रहा है। यह दोनों स्टोर में जाने के बाद अपने कपड़े चेंज करते हैं। स्टोर के कपड़े पहन लेते हैं। उसके बाद अंदर की तरफ जाते हैं। करीब 1:30 मिनट के बाद सीसीटीवी कैमरे में उसी जगह पर अचानक एक तस्वीर दिखाई देती है। भद्रेश और पलक दोनों एक साथ अंदर गए थे। लेकिन वापस 1:30 मिनट के बाद सिर्फ भद्रेश ही आता है। वहां से तेजी से निकल जाता है। पलक इस सीसीटीवी कैमरे की तस्वीर में नहीं थी। उसके अंदर जाने की तस्वीर तो थी पर बाहर निकलने की तस्वीर नहीं थी। स्टोर खुला हुआ था।

क़त्ल का पता चलना-

इसी दौरान में कुछ ग्राहक आते हैं। वह अंदर आकर आवाज देते हैं। वह कुछ आर्डर देना चाहते थे। वहां पर कोई आवाज नहीं सुनता। ग्राहक कई बार आवाज देते हैं। उन्हें लगता है, कि स्टोर खुला हुआ है। यहां पर कोई नहीं आ रहा। उनको शक होता है। Store आसपास चारों तरफ देखता है। बाहर निकलता है। इत्तेफाक से बाहर एक पुलिस वाला टहल रहा था। वह उस पुलिस वाले के पास जाता है। कहता है कि मैं स्टोर में आया हूं। मुझे लगता है कि कुछ गड़बड़ है। यहां पर कभी ऐसा नहीं  होता है। तुम यहां ऑर्डर देने आए और पर कोई ना मिले।

एक बार आप आकर देख लीजिए। पुलिसवाला सुनकर अंदर आ जाता है। स्टोर की तलाशी लेना शुरू कर देता है। तलाशी लेते-लेते वह उस तरफ जाता है। जहां कुछ देर पहले भद्रेशकुमार और पलक अंदर की तरफ जाते दिखाई देते हैं। पुलिसवाला अंदर की तरफ जाता है। थोड़ी देर के बाद घबराते हुए वापस आता है। अपने बाकी पुलिस वालों को फोन करता है। वह पुलिस वाले भी वह आते हैं।

देखते है, कि पीछे फर्श पर पलक की लाश पड़ी हुई थी। लाश ऐसी थी की उसके पूरे शरीर पर चाकुओं के घाव थे। मारपीट के भी निशान थे। ऐसा लगा था कि बड़ी बहरमी से उसे मारा गया है। फर्श पर चारों तरफ खून पड़ा हुआ था। खून से लगा हुआ एक चाकू भी वहां पड़ा हुआ मिला। पुलिस फौरन लाश को उठाकर हॉस्पिटल ले जाती है। मगर पलक पहले ही दम तोड़ चुकी थी।

पुलिस का छानबीन शुरू करना-

अब इसके बाद पुलिस छानबीन शुरू कर देती है। सबसे पहले वह सीसीटीवी कैमरे को देखती है। जो उस स्टोर में लगा हुआ था। इस कैमरे में 9:30 पर दोनों अंदर जाते हुए दिखा देते हैं। 1:30 मिनट के बाद सिर्फ पति बाहर की तरफ आता है। जिस तेजी से वह निकलता है। उसको देखकर पुलिस का शक होता है। उसके बाद ना कोई गया और ना ही आया। अब सीधा शक पुलिस को उस शख्स पर ही गया। जो बाहर निकला था। जब तक पुलिस को यह नहीं मालूम था, कि यह दोनों पति-पत्नी है। इसके बाद उस स्टोर के मालिक को फोन किया जाता है। वह वहां पर आ जाता है। वह बताता है कि यह पलक है। सीसीटीवी कैमरा देख कर बताता है, कि भद्रेशकुमार इसका पति है।

वहां से निकलने के बाद भद्रेश एक अपार्टमेंट की तरफ जाता है। जहां पर वो रहता था। वहां से अपनी जरूरत की तमाम चीजें लेता है। एक टैक्सी करके वही एयरपोर्ट के करीब एक होटल में चला जाता है। होटल में जाने के बाद वह वहां पर एक रूम किराए पर ले लेता है। रिसेप्शन पर बाकायदा उसकी सीसीटीवी कैमरे की तस्वीर मौजूद है। सुबह-सुबह वह होटल खाली कर देता है।

यह उस होटल से निकलने की उसकी आखिरी तस्वीर-

होटल खाली करने के बाद वह वहां से न्यूयॉर्क के लिए निकल जाता है। यह उस होटल से निकलने की उसकी आखिरी तस्वीर थी। उसके बाद से उसका कोई सुराग नहीं मिलता। इस दौरान पुलिस इसको चारों तरफ ढूंढती है। रिश्तेदारों से भी पता करती है। लेकिन भद्रेशकुमार (BhadreshKumar ChetanBhai Patel FBI Most Wanted) का कोई सुराग नहीं मिलता। सबसे कमाल की बात यह थी। जब वह निकला और टैक्सी ड्राइवर उसको होटल तक लेकर गया। यह सारी चीजें पता करने में पुलिस को रात से सुबह हो गई थी। सुबह जब तक पुलिस को इन सभी चीजों के बारे में पता चलता। जब तक वह होटल से निकल चुका था। जो कीमती वक्त था। वह निकल चुका था। उस वक्त वहां की लोकल पुलिस जांच कर रही थी।

टैक्सी ड्राइवर का उसके बारे हैरत वाली बात बताना-

टैक्सी ड्राइवर ने बताया कि जब वह आया तो वह बिल्कुल नॉर्मल लग रहा था। उसके चेहरे से बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। ये ऐसा करके आया है। होटल के सीसीटीवी कैमरे में भी साफ दिख रहा है। वह बिल्कुल कूल और नॉर्मल है। पुलिस को अजीब लगा कि एक शख्स इतनी बेरहमी से अपनी पत्नी का कत्ल कर गया है। वह इतना नॉर्मल उसके हाव-भाव से नहीं लग रहा था कि वह कत्ल करके आया है।

न्यूयॉर्क जाने के बाद से भद्रेशकुमार (BhadreshKumar ChetanBhai Patel FBI Most Wanted) का कोई सुराग नहीं मिलता। पुलिस अपनी जांच में लगी रहती है। जितने भी भद्रेश के रिश्तेदार थे। उन सब से पूछताछ करती है। उसके तमाम लोगों से पूछताछ करती है। इंडिया में उसके जानने वालों को भी खबर दी जाती है। लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। धीरे-धीरे वक्त बीता चला गया और आखिर में यह केस पुलिस से लेकर FBI को दे दिया गया। FBI भी अपनी तरफ से पूरी जांच करती है। क्योंकि यह गुजरात से था। गुजरातियों की काफी बड़ी आबादी अमेरिका में है। FBI हिंदी, इंग्लिश और गुजराती Language में काफी पर्चे छपवाती है। अमेरिका के अलग-अलग शहरों में देती है। धीरे-धीरे उसकी तलाश तेज हो जाती है। लेकिन कहीं से भी भद्रेशकुमार की कोई जानकारी नहीं मिलती।

FBI का उसके ऊपर एक लाख डॉलर का इनाम रखना-

जब जानकारी नहीं मिलती तो FBI उसके ऊपर एक लाख डॉलर का इनाम रख देती है। बाद में जो FBI को जानकारी मिली। वह यह थी कि इस का वीजा खत्म हो चुका था। वह अमेरिका से कानूनी तरीके से बाहर नहीं जा सकता। क्योंकि इसके पास वीजा नहीं था। सोचने वाली बात यह है, कि वह अमेरिका से बाहर कहां निकल सकता।

अब इसमें दो बातें थी-

  • वह गैरकानूनी तरीके से अमेरिका से बाहर निकल गया।
  • वह अपने किसी रिश्तेदार के यहां पर छुपा हुआ है।

FBI के पास विकल्प-

विकल्प थे कि वह अमेरिका से बाहर कहां-कहां गया है। इस पर FBI ने काफी छानबीन की। उसके सुराग कनाडा में पाए गए। कनाडा में जांच की गई। दूसरा यह कि न्यू जर्सी और इंडिया इन सब जगहों पर इसके होने की गुंजाइश थी। इन्हीं जगह पर पुलिस ने अपने तरीके से छानबीन की। लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली। धीरे-धीरे वक्त बीतता चला गया। आज 2020 आ गया। तीन बार से FBI के टॉप टेन लिस्ट में भद्रेशकुमार ने जगह बना रखी है। मगर इसका कोई सुराग नहीं मिला। गुजरात में भी तमाम ठिकानों पर इसकी छानबीन की गई। मगर (But) कहीं पर भी कोई इसका सुराग नहीं मिला। भारत की एजेंसी के द्वारा भी इसको तलाश करने और पकड़ने की मदद ली गई।  मगर सब बेकार चली गई। कनाडा में भी तलाश करने की कोशिश की गई। मगर वह भी बेकार गई।

FBI ने (BhadreshKumar ChetanBhai Patel FBI Most Wanted) की कई थ्योरी पेश की-

अब (Now) सवाल यह दुनिया कितनी बड़ी एजेंसी ऐसे शख्स को नहीं पकड़ पाई। जो एक किलर भी नहीं था। FBI ने इसकी कई थ्योरी पेश की। जिसमें यह थी एक पत्नी घर वापस आना चाहती थी। पति नहीं आना चाहता था। इस वजह से उन दोनों में झगड़ा हुआ। उसने अपनी पत्नी को कत्ल कर दिया। फिर इसकी कोई और वजह है। यह कातिल के पकड़े जाने के बाद ही पता चलेगी। मगर कातिल 5 साल से गायब है।

FBI ने अपनी पूरी कोशिश कर ली है। अब भी कोशिश में लगी हुई। यही वजह है, कि हर साल अपने Most Wanted में उसका नाम शामिल करती है। FBI ने तो यहां तक भी बयान दिया है। BhadreshKumar ChetanBhai Patel FBI Most Wanted ने जितनी बेरहमी से अपनी पत्नी को मारा है। यह एक खतरनाक Killer और इसके पास खतरनाक हथियार हो सकते हैं। जो भी इसे देखें वह सावधान रहें और फौरन इंफॉर्मेशन कर दें।

ऐसे कई हवाई रहस्य है। जो आज तक नहीं सुलझ पाए। यह उन्हीं में से एक रहस्य की कहानी है। यह Santiago Flight 513 की कहानी है। तब जर्मनी एक नहीं हुआ करता था। वेस्ट जर्मनी के एक छोटे से एयरपोर्ट से Santiago Flight 513, 4 सितंबर 1954 को उड़ान भर्ती है। इसको ब्राजील के शहर Porto Alegre International Airport जाना था। यह दूरी करीब 18 घंटों में पूरी होनी थी। हवाई जहाज में कुल 88 यात्री थे। 4 क्रू मेंबर थे।

Santiago Flight 513 का उड़ान भरना और गायब हो जाना-

दोपहर के बाद जर्मनी से यह हवाई जहाज उड़ान भरता है। उसके बाद सब कुछ सही चल रहा होता है। यह ATC (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) के संपर्क में रहता है। कुछ देर के बाद यह अटलांटिक के ऊपर से उड़ान भरने लगता है। अटलांटिक के ऊपर जाने के बाद अचानक इस हवाई जहाज का संपर्क ग्राउंड से टूट जाता है। इसके बाद एयर ट्रेफिक कंट्रोल से संपर्क टूट जाता है।

यह हवाई जहाज गुम हो जाता है। ATC (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) काफी कोशिश करती है। मगर संपर्क नहीं हो पाता। Santiago Flight 513, ATC के रडार से गायब हो जाता है। आमतौर पर जब एटीसी से ऐसी चीजें गायब होती है। यह मान लिया जाता है, कि हवाई जहाज के साथ कोई हादसा हुआ है। इसके बाद हवाई जहाज की तलाश की जाती है। जहां पर यह संपर्क टूटा था। वहां पर बचाव दल की एक टीम जाती है। वेस्ट जर्मनी और ब्राजील दोनों देशों की टीमें इस हवाई जहाज की खोज में लग जाती है। दूसरे देश भी इसमें मदद करते हैं।

यह खोजबीन का सिलसिला चलता रहता है। मगर ना हवाई जहाज मिलता है। ना हवाई जहाज का कोई मलबा मिलता है। मगर तलाश जारी रहती है। धीरे-धीरे वक्त बीता चला गया। यहां तक कि महीने सालों बीत गए। लेकिन हवाई जहाज का कोई सुराग नहीं मिलता। अब उस वक्त अजीब-अजीब चीजें दिमाग में आ रही थी। आखिरकार हवाई जहाज के साथ क्या हुआ है। लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंचते।

इस हवाई जहाज के बारे में रिपोर्ट-

जब काफी वक्त बीत जाता है। जो टीम इसकी जांच कर रही थी। वह अपनी एक रिपोर्ट पेश करती है। अब इस हवाई जहाज (Santiago Flight 513) को ढूंढने की कोई उम्मीद नहीं है। क्योंकि हवाई जहाज का मलबा भी नहीं मिला और ना ही लाशें मिली। यह हवाई जहाज हादसे का शिकार हो गया है।  यह अटलांटिक के ऊपर हुआ है। यह मान लिया जाए कि इसमें जो लोग सवार थे, क्रु मेंबर समेत उन को मरा हुआ मान लिया जाए। यह एक ऑफीशियली रिपोर्ट दर्ज हो जाती है। उस हवाई जहाज के जितने भी यात्री थे। उन सब को मरा हुआ करार दिया जाता है।

इसकी जांच ऑफिशियल तौर पर तो बंद कर दी गई। मगर थोड़ी बहुत इसकी छानबीन शुरू रहती है। अब कोई उम्मीद बाकी नहीं थी। इसके बाद धीरे-धीरे वक्त बीता चला गया। करीब 35 साल बीत जाते हैं 1954 से लेकर 1989 आ चुका था। अब 35 साल पूरे हो चुके थे।

Santiago Flight 513 का अचानक दिखाई देना-

35 साल के बाद दोपहर के वक्त 12 अक्टूबर 1989 को। इसी Porto Alegre Airport पर एटीसी को अचानक एक हवाई जहाज आसमान में दिखाई देता है। मगर वह हवाई जहाज एटीसी से संपर्क नहीं कर रहा था। वह बता नहीं रहा था कि उसे उतरना है। ATC लगातार उस हवाई जहाज को देख रहा था। पर कोई फायदा नहीं हुआ। क्योंकि वहां से कोई संपर्क ही नहीं कर रहा। था धीरे-धीरे वह हवाई जहाज Runway के करीब आ जाता है। ATC में हड़कंप मच जाता है। उधर से पायलट कोई जवाब नहीं दे रहा था।

हवाई जहाज का एयरपोर्ट पर लैंड करना-

धीरे-धीरे वो प्लेन रनवे के करीब आ जाता है। इत्तेफाक से एयरपोर्ट पर कई और रनवे थे। आनन-फानन में रनवे को खाली कराया गया। वह हवाई जहाज जिसने ATC से संपर्क नहीं किया और कोई परमिशन नहीं ली थी। वह सीधा Porto Alegre Airport के एक रनवे पर लैंड कर जाता है। बिल्कुल सही तरीके से लैंड करता है। लैंड करने के बाद हवाई जहाज रुक जाता है। इधर एटीसी ने तमाम सिक्योरिटी को इस बारे में बता दिया था। एक हवाई जहाज है। एटीसी से संपर्क नहीं कर रहा है। लैंड करने के लिए भी इजाजत नहीं मांगी है। वह बगैर किसी परमिशन के रनवे पर लैंड कर गया।

हड़बड़ाहट और बौखलाहट सब तरफ थी। इसके बाद एयरपोर्ट के जितने भी सिक्योरिटी स्टाफ थे। वह गाड़ी में बैठकर हवाई जहाज की तरफ Runway  पर जाते हैं। पहली बार देखकर तो यह लगा कि यह हवाई जहाज बिल्कुल न्यू है। वहां पर जाने के बाद दूसरी चीज देखते हैं। हवाई जहाज का इंजन अभी भी चालू है। तीसरी चीज पर जैसे ही नजर पड़ती है। सभी चौक जाते हैं।

Santiago Flight 513 की हकीकत का पता चलना-

जिसके ऊपर Santiago Airlines लिखा हुआ है। उनको एहसास हुआ कि Santiago Airlines के हवाई जहाज ने यहां कैसे लैंड किया। जबकि Santiago Airlines को बंद हुए करीब 33 साल हो चुके थे। 1954 को जब Santiago Airlines के हवाई जहाज ने उड़ान भरी थी। यह गायब हुआ था। उसके 2 साल के बाद 1956 को Santiago Airlines ही कंपनी बंद हो गई थी। दुनिया में कहीं भी Santiago Airlines की कोई उड़ान नहीं थी।

इसके बाद जब वह उस हवाई जहाज को देखते हैं। उनके दिमाग में ख्याल आता है। Santiago Airlines के हवाई जहाज को इस एयरपोर्ट पर 35 साल पहले लैंड करना था। पर वह गायब हो गया था। उसने लैंड नहीं किया था। बाकी सिक्योरिटी स्टाफ को उसके बाद बुलाया जाता है । उसका हवाई जहाज को बाहर की तरफ से खोला जाता है। क्योंकि वह अंदर से बंद और कोई खोल नहीं रहा था।

हवाई जहाज के अंदर दाखिल होना-

हवाई जहाज को खोलने के बाद सिक्योरिटी स्टाफ के आला अधिकारी इस हवाई जहाज के अंदर दाखिल होते हैं। वह जितनी तेजी से हवाई जहाज के अंदर दाखिल हुए थे। उतनी तेजी के साथ चीखते हुए हवाई जहाज से बाहर की तरफ आते हैं। वह देखते हैं, कि हवाई जहाज के अंदर सभी यात्री अपनी सीट पर बैठे हुए हैं। सबके सीट बेल्ट भी लगे हुए हैं। लेकिन वह सब कंकाल है। उनमें से कोई भी जिंदा नहीं है।

इसके बाद उनके बाकी साथी को यकीन नहीं हुआ। वह भी हवाई जहाज के अंदर दाखिल हो गए। अब उसके बाद धीरे-धीरे सभी सीटों पर देखते हैं। उनको गिनते हुए जाते हैं। पूरे 88 यात्री थे। जो कंकाल बने हुए थे। इसके बाद वह हिम्मत करके Pilot की तरफ जाते हैं। वहां पर भी दो एयर होस्टेस कंकाल की सूरत में वहां पर बैठी हुई थी। कॉकपिट को खोलते हैं। अंदर Pilot और Co-Pilot वह दोनों भी हवाई जहाज के अंदर मौजूद थे। दोनों बैठे हुए हैं। मगर वह दोनों भी कंकाल बने हुए हैं। हैरानी की बात यह थी। उस हवाई जहाज का जो पायलट था। उसका हाथ भी जो हवाई जहाज को कंट्रोल करता है। उस पर रखा हुआ था।

कई बार उस हवाई जहाज (Santiago Flight 513) की तलाशी ली गई। देखा गया तो पता चला कि सभी के सभी कंकाल है। अब हैरानी की बात यह थी कि इस हवाई जहाज ने लैंड कैसे किया। इसमें एक भी जिंदा शख्स मौजूद नहीं था।

कई बातो का सामने आना-

इसके बाद यह बात ज्यादा ना फैले ब्राजील सरकार ने इस पर रोक लगा दी थी। इसकी जांच शुरू हो गई। एक मुर्दा पायलट हवाई जहाज को कैसे लैंड करा सकता है।

इसके बाद दो तीन चीज है। इसको लेकर सामने आई-

  1. यह हवाई जहाज टाइम ट्रेवल के अंदर फस गया और एडिशन की वजह से सभी लोग मारे गए और कंकाल बन गई।
  2. दूसरी बात यह सामने आई जो दूसरे ग्रह के लोग हैं उन्होंने इस हवाई जहाज को हाईजैक कर लिया। इसकी वजह से यह हवाई जहाज उसका शिकार बना।
  3. तीसरी बात यह सामने आई कि यह किसी इंसानी साजिश यानी किसी रिसर्च का ही हिस्सा था। जिसकी वजह से इस हवाई जहाज के ऊपर कोई ऐसा टेस्ट किया जा रहा था। यानी उसके मुसाफिर पर जिसके नतीजे में यह सब चीजें हुई।

लेकिन पुख्ता तरीके से कोई जवाब नहीं दे पाया।

  1. पहली चीज तो यह कि 35 साल तक यह हवाई जहाज कहां रहा।
  2. दूसरी चीज कि इस हवाई जहाज ने बगैर किसी जिंदा इंसान के कैसे लैंड किया।
  3. तीसरी चीज यह किए सारे जो कंकाल बने वह कैसे बने।
  4. इस हवाई जहाज को जहां पर लैंड करना था। वहीं पर आकर इसने कैसे लैंड किया।
  5. यह सारे सवाल अपने आप में बने हुए थे। लेकिन इसका जवाब नहीं।

एक पत्रकार का इस खबर के बारे में अख़बार में छापना-

अब इसके बाद दूसरी चीज सामने आ गई। एक पत्रकार था। जिसने यह खबर पहली बार अखबार में छापी। उस वक्त जब यह खबर छपी लेकिन ऐसी कोई तस्वीर सामने नहीं आई की हवाई जहाज के अंदर कंकाल बैठे हुए हो। सिर्फ हवाई जहाज की ही तस्वीर सामने आई थी। बात यह थी कि इस पत्रकार के पास सही तरीके से यह जानकारी नहीं थी। दूसरी यह थी कि यह हवाई जहाज किसी रहस्य का शिकार हुआ। इस बारे में जर्मनी के सरकार ने भी गोपनीयता बरती। इंटेलिजेंस को भी इससे दूर रखा। वैज्ञानिकों ने इसका काफी विरोध किया। यह विज्ञान के लिए काफी मायने वाली चीज थी। लेकिन 35 साल के इस रहस्य से पूरे तरीके से कभी पर्दा नहीं उठ पाया।

आज तकरीबन 66 साल हो गए मगर इस रहस्य पर आज भी पर्दा पड़ा हुआ है। कुछ लोग यह कहते हैं कि यह हादसा बिल्कुल सच है। दूसरे लोग यह कहते हैं, कि यह सिर्फ एक कहानी है। मगर इस हवाई जहाज ने उस एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी। यह भी एक सच्चाई है। यह हवाई जहाज कभी ब्राजील के उस एयरपोर्ट पर लैंड नहीं किया।

हकीकत क्या है-

यह भी एक सच्चाई है। हवाई जहाज का संपर्क अटलांटिक के ऊपर ऐसे टूटा था। इसके बाद 35 साल बाद ब्राजील के एयरपोर्ट पर लैंड करने की कहानी के बारे में कई राय हैं-

  • एक यह है कि यह सिर्फ फर्जी है।
  • यह कहानी बनाई गई है।
  • पत्रकार ने यह गलत खबर छापी है।

जिसकी वजह से पूरी दुनिया में एक चर्चा का विषय बना। पूरी दुनिया में इस खबर को लेकर बातें होने लगी।

इसमें दो बातें सामने आती है-

  • एक यह कि 35 साल तक इस हवाई जहाज का एक रहस्य ही है।
  • दूसरी बात यह कि 35 साल बाद इस हवाई जहाज ने ब्राजील के एयरपोर्ट पर लैंड किया ।लेकिन इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं है।

तमाम लोगों ने इस सच्चाई की तह तक जाने की कोशिश की। लेकिन (But) पूरे तरीके से सच्चाई सामने नहीं आ पाई।

हम जब भी अंडरवर्ल्ड की बात करते हैं, तो (so) हमारे दिमाग में सिर्फ खून खराबा, बंदूक, गोली जैसी बातें आती है। यह हिंदुस्तान का इकलौता (only) ऐसा डॉन है जिसने ना कभी गोली चलाई ना कभी चाकू उठाया ना किसी को मारा। यहां तक कि उसने किसी को भी अपने हाथ से कोई नुकसान (loss) ही नहीं पहुंचाया। आज हम Mumbai के Don Haji Mastan की बात करने वाले है।

दूसरा यह कि करीब उसने 20 साल तक मुंबई पर राज किया। इन 20 सालों में उस पर एक भी क़त्ल का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। उसने कोई (someone) मर्डर ही नहीं किया। तीसरी बात यह है कि उसका दबदबा इतना था एक बार जब वह गिरफ्तार किया गया। उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थी। उसने बाकायदा दिल्ली इंदिरा गांधी के पास प्रधानमंत्री के ऑफिस तक मैसेज पहुंचाया था। वह जितना कहेंगे उतना पैसा उनको मिल जाएगा। इसके बदले वह उनको जेल से बाहर निकाल दे। हालांकि (although) उनकी यह बात नहीं मानी गई।

हाजी मस्तान के बारे में मुंबई पुलिस की राय-

कई (many) पुलिस वाले तो इस बात को भी कहते हैं। अगर मुंबई से अंडरवर्ल्ड खत्म ना हो यहां तक कि पुलिस भी उसको खत्म ना कर पाए। उनकी चाहत यह है, की अंडरवर्ल्ड Haji Mastan के दौर का हो। उसमें एक वजह (reason) यह थी कि उस वक्त जो भी काम हुआ करता था वह लिमिट में होता था। उससे  (thereby) आम आदमी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता था। वहां खून खराबा भी नहीं हुआ करता था। हाजी मस्तान की एक खासियत थी। यहां तक कि एक नसीहत थी। अगर (If) गलत काम भी करो तो उसमें किसी आम आदमी को ना घसीटो। जिसका उससे कोई लेना-देना नहीं हो और ना ही किसी को तंग करो, ना किसी को परेशान करो।

Haji Mastan के दौर में और भी डॉन हुआ करते थे। जिनमें से Karim Lala और वर्धराजन भी शामिल थे। जो हाजी मस्तान के साथ ही मिलकर काम किया करते थे।  यह तीनों डॉन अपने अपने अलग-अलग इलाकों में काम कर रहे थे। किसी में कोई मतभेद भी नहीं था। इनमें कभी लड़ाई भी नहीं हुई। उस वक्त Karim Lala और वृद्धा राजन के शराब के अड्डे और जुए अड्डे चला करते थे। मगर हाजी मस्तान का स्मगलिंग का धंधा था। जिसमें वह गोल्ड इलेक्ट्रॉनिक की चीजें वगैरह की स्मगलिंग किया करता था। जिससे जनता को नुकसान पहुंचे जैसे ड्रक्स और हथियार वह इन चीजों की स्मगलिंग नहीं किया करता था।

हाजी मस्तान की पैदाइश-

आज की कहानी मुंबई के डॉन Haji Mastan की है । जिसका जन्म तमिलनाडु के बनाई कुला जो तमिलनाडु में एक गांव है । वहां पर 1 मार्च 1926 को हाजी मस्तान का जन्म हुआ था । हाजी मस्तान का असली नाम मस्तान हैदर था । वह एक गरीब परिवार में था उसका बाप किसान था पर जमीन इतनी नहीं थी कि जिससे खेती-बाड़ी करके पूरा परिवार पाला जा सके । कई-कई बार ऐसा हुआ करता था कि दो-दो दिन तक घर में खाना नहीं बना करता था ।

हाजी मस्तान के पिता जिस वक्त हाजी मस्तान 8 साल का था, उसको लेकर मुंबई आ जाते हैं, सोचते हैं कि शहर में जाकर कुछ काम करेंगे तो घर की हालत सुधरेगी । मुंबई आने के बाद हाजी मस्तान के वालिद एक साइकिल रिपेयरिंग की दुकान खोल लेते हैं । वहीं पर मस्तान हैदर मिर्जा उसी दुकान पर काम करने लगा ।

वहां पर एक साइकिल मैकेनिक के तौर पर वहां काम करने लगा । धीरे-धीरे वक्त बीत गया पर आमदनी उतनी नहीं हो रही थी । हाजी मस्तान की उम्र अब 18 साल हो चुकी थी । वह इस वक्त भी साइकिल की दुकान पर ही काम कर रहा था ।वहाँ पर जिस सड़क के किनारे यह दुकान थी किरा फोर्ट मार्केट है मुंबई में  वहां पर अक्सर कई बार दिन भर में कई महंगी गाड़ियां गुजरा करती थी तो अक्सर हाजी मस्तान उन गाड़ियों को बहुत हसरत भरी नजरों से देखा करता था । वह यही सोचा करता था कि 1 दिन मेरे पास भी ऐसी गाड़ी होगी और जो यह मकान बने हुए हैं इस तरह का मेरा भी एक बंगला होगा।

haji mastan
Haji Mastan

Smuggling की शुरुआत-

लेकिन कमाई उतनी हो नहीं रही थी और 10 साल बीत चुके थे इसी दौरान साइकिल की दुकान पर काम करते हुए कुछ लोगों से उसकी दोस्ती हो जाती है। उनमें से कुछ ने राय दी कि तू यहां पर जितने पैसे कमाता है। इससे अच्छा तो तू बंदरगाह पर जाकर कुली बन जा वहां पर तो इससे अच्छे पैसे कमा लेगा। पहली बार दोस्तों के कहने पर मस्तान हैदर मिर्जा अपने वालिद के साथ यह काम छोड़कर बंदरगाह पर चला जाता है। वहां पर कुली बन जाता है और वहां पर कुली का काम शुरू कर देता है।

वहीं पर उसकी एक लड़के से और दोस्ती हो जाती है, क्योंकि (Because) वह लड़का देखता है कि मस्तान हैदर काफी तेज है तो वह कहता है कि तू कुछ पैसे कमाना चाहेगा तो मस्तान पूछता है, कि कैसे तो उसने बताया कि यहां पर बहुत सारी चीजें स्मगलिंग से आती है। तुझे अपने कपड़ों में छुपा कर उसे बाहर तक पहुंचाना है क्योंकि (Because)  वहां पर कस्टम वाले होते हैं और तुझे बंदरगाह से सामान बाहर पहुंचाना है तो उसने कहा ठीक है। उस वक्त स्मगलिंग में सिर्फ सोना चांदी और इलेक्ट्रॉनिक की चीजें जो बाहर से आया करती थी और घड़ी की स्मगलिंग हुआ करती थी।

Don Haji Mastan ने इस तरह जो बाहर से सामान आया करता था-

हाजी मस्तान ने इस तरह (This way) जो बाहर से सामान आया करता था उसको बंदरगाह से बाहर निकालना शुरू कर दिया ।  इससे उसे काफी आमदनी होने लगी इसी बीच काम करते हुए बंदरगाह पर क्योंकि पानी के जहाज से काफी लोग आया करते थे तो उसे एक अरब दोस्त मिला और उसका नाम शेख मुहम्मद अल गालिब था वह जो शेख मुहम्मद अल गालिब था। गोल्ड स्मंगलिंग का काम किया करता था तो इत्तेफाक से हैदर मिर्जा मस्तान से उसकी मुलाकात होती है। वह उसे अपने साथ काम करने के ऑफर देता है। हाजी मस्तान मान जाता है, और इसके बाद यह स्मगलिंग का काम उसके साथ शुरू कर देता है।

शेख मुहम्मद अल गालिब की गिरफ्तारी और रिहाई-

एक ऐसी ही खेप में शेख मोहम्मद अल गालिब सोना लेकर बंदरगाह पर पहुंचता है, और उसे यह सोना हाजी मस्तान को देना था। मगर कोई कस्टम ऑफिसर को मुखबरी (Informant) कर देता है, तो शेख मुहम्मद अल गालिब को पकड़ लिया गया मगर तब तक उसने काफी सोना हाजी मस्तान को दे दिया था । इसके बाद शेख मोहम्मद अल गालिब को 3 साल की सजा हो जाती है। वह 3 साल जेल में बिताता है। 3 साल जेल में बिताने के बाद जब वह बाहर आता है। वह उसी बंदरगाह पर पहुंचता है। उसके बाद वह हाजी मस्तान से मिलता है। वहां पर मिलने के बाद हाजी मस्तान उसको अपने घर पर ले जाता है।

वहां पर ले जाकर उसको वह जो सोने का बॉक्स था वह उसको दिखाता है। वह ऐसा का ऐसा ही बॉक्स रखा हुआ था जैसा उसे मिला था। यह देखकर शेख मुहम्मद अल ग़ालिब खुश हो जाता है और उसमें से आधा सोना हाजी मस्तान को दे देता है और मिर्जा की जिंदगी यहीं से पलट जाती है। वह काफी अमीर हो जाता है। अब उसको इसके सारे गुण मालूम हो गए थे, कि स्मगलिंग का काम कैसे होता है, तो अब धीरे-धीरे यह सारी चीजें होती गई और स्मगलिंग में हाजी मस्तान का नाम बढ़ता चला गया अब मिर्जा को अपने शौक पूरे करने की बारी आई।

Don Haji Mastan के शौक और प्यार-

क्योंकि उसे लंबी लंबी गाड़ियों का शौक था तो उसने सबसे पहले मर्सिडीज गाड़ी खरीदी और एक अच्छे से एरिया में उसने एक बंगला लिया। फिल्मों का वह काफी बड़ा शौकीन था तो बॉलीवुड में उस वक्त जितने भी स्टार थे उनके साथ बैठना, उठना और उनके साथ फोटो खिंचवाने का शौक पूरा करने लगा। इस स्मगलिंग के सफर में इसने इतने पैसे कमा लिए थे वह एक तरीके से डॉन बन चुका था।

उसे हमेशा सफेद कपड़े पहनने का शौक था तो वह हमेशा सफेद कपड़े पहन के रखता था। सिगरेट और सिंगार पीने का शौकीन था और सिगरेट भी 555 कि पिया करता था। क्योंकि फिल्म इंडस्ट्रीज से काफी लगाव था तो उसने जब मधुबाला को पहली बार देखा तो उसको उससे प्यार हो गया। वह से शादी करना चाहता था और यह बात कहीं ना कहीं मधुबाला तक भी पहुंच गई थी।

उसे मालूम था कि ऐसा हो नहीं पाएगा तो वह प्यार एक तरफा ही था। मधुबाला ने कभी हाजी मस्तान से प्यार नहीं किया। इसी बीच बॉलीवुड में उसे एक लड़की दिखाई दी जिसका नाम सोना था उसकी शक्ल मधुबाला से काफी मिला करती थी तो उसे लगा कि मधुबाला ना सही पर मधुबाला की हमशक्ल ही सही तो फिर उसको सोना से प्यार हो गया तो उसने सोना की कई फिल्मों में पैसा भी लगाया उसको प्रमोट करने की कोशिश की मगर सोना फिल्मों में चली नहीं आखिर (finally) में लेकिन हाजी मस्तान ने सोना से शादी कर ली।

हाजी मस्तान का चढ़ाव-

इस दौरान में हाजी मस्तान का कद और शोहरत लगातार बढ़ता जा रहा था और बिना गोली चलाएं बिना लड़े वह एक तरह से मुंबई का डॉन हो चुका था। इस बीच वृद्धा राजन भी साउथ वापस लौट गया और करीम लाला का धंधा भी सिमटने लगा कुछ नया गैंग आ गए जैसे दाऊद इब्राहिम और पठान यह जो अभी थे हाजी मस्तान के चेले ही थे। क्योंकि हाजी मस्तान ने इन सब को बताया कि स्मगलिंग कैसे होती है और बगैर किसी भेदभाव के हाजी मस्तान की बात को मानना होता था।

क्योंकि हाजी मस्तान को यह सब अपना गुरु माना करते थे। इस दौरान में हाजी मस्तान कभी गिरफ्तार भी नहीं हुआ। Because वह हमेशा पुलिस और कस्टम अधिकारी को बहुत महंगे तोहफे दिया करता था। उनको खरीद लिया करता था। जो कस्टम अधिकारी और पुलिस वाले नहीं बिका करते थे। वह उनका ट्रांसफर करा दिया करता था । उसकी पहुंच बहुत ऊपर तक चली गई थी।

एक अधकारी के बारे में हाजी मस्तान की सोच-

मुंबई पुलिस ने इस बारे में एक बात बताई थी। एक कस्टम अधिकारी जो Don Haji Mastan को काफी परेशान कर रहा था। यह करीब 1974 की बात है। वह किसी भी तरीके से हाजी मस्तान के सामान को पकड़ लिया करता था। हाजी मस्तान को बहुत नुकसान हो रहा था। हाजी मस्तान ने उसे खरीदने की कोशिश की वह काफी ईमानदार था। वह नहीं बिका। बाद में हाजी मस्तान ने राजनीति में अपना संपर्क किया और उस अधिकारी का वहां से तबादला करा दिया।  जब उसका तबादला हुआ और वह अधिकारी एयरपोर्ट से अपने घर जा रहा था।

ट्रांसफर का पेपर उसे 1 दिन पहले मिल गया था। उसने सोचा कि नई जगह जॉइनिंग करने से पहले घर होकर आ जाता हूं। वह एयरपोर्ट गया और फ्लाइट में बैठ गया। जब वह फ्लाइट में बैठा इतने में हाजी मस्तान एयरपोर्ट पर उस फ्लाइट में जाता है और उस अधिकारी से ऑल द बेस्ट कहता है। जबकि (while) हाजी मस्तान पर इंग्लिश नहीं आती थी। जो कोई भी हाजी मस्तान से इंग्लिश में बातें किया करता था। वह सबको या-या में जवाब दिया करता था और उस अधिकारी से भविष्य के लिए विश किया और हाथ मिला कर वापस आ गया।

Don Haji Mastan की गिरफ्तारी-

उसके बाद (After that) 1974 में एक महाराष्ट्र के मंत्री के दबाव (Pressure) में दिल्ली में धरने पर बैठ जाते हैं। Don Haji Mastan की गिरफ्तारी की मांग करते हैं। जिसके बाद दबाव में आकर महाराष्ट्र पुलिस से कहा जाता है कि हाजी मस्तान की गिरफ्तार किया जाए। हाजी मस्तान को गिरफ्तार किया जाता है, मगर (But) उसको जेल नहीं ले जाया गया। बल्कि उसको एक कोल्हापुर में गेस्ट हाउस में रखा गया। वहां पर हर ऐसो आराम की चीजें मुहैया कराई गई। दो पुलिस अफसर बाकायदा ड्यूटी पर थे। अभी तक हाजी मस्तान जेल नहीं गया था। अब जो गिरफ्तारी हुई थी।उस में भी गेस्ट हाउस में ही रखा गया था।

लेकिन (But) इसके 1 साल बाद ही इधर (here) देश में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी (Emergency) लगा देती है, तो सभी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो जाती है। इंदिरा गांधी ने भी तब तक हाजी मस्तान के बारे में काफी सुना हुआ था। उस वक्त मुंबई में भी नेता की गिरफ्तारी शुरू हो गई थी। हाजी मस्तान गायब हो गया था। मगर पुलिस उसको ढूंढ लेती है और हाजी मस्तान को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

इसके बाद उसको जेल में डाल दिया जाता है और मिर्जा ने इंदिरा गांधी तक मैसेज भेजा कि आप मुझे रिहा करवा दे और बदले में जितना पैसा चाहोगी मैं आपको दे दूंगा लेकिन इंदिरा गांधी ने मना कर दिया जेल जाने के बाद पहली बार Don Haji Mastan की मुलाकात जयप्रकाश नारायण से होती है, और कहते हैं कि इस जेल में हाजी मस्तान करीब 18 महीने बंद रहा और इन्हीं 18 महीने ने मिर्जा मस्तान को बदल दिया और बदलने की सबसे बड़ी वजह थी जयप्रकाश नारायण।

Don Haji Mastan का शियासत में कदम-

वहां पर जेपी नारायण ने कसम दिलाई थी कि तुम अब कोई भी ऐसा काम नहीं करोगे जो देश के खिलाफ हो। मस्तान मिर्जा ने भी  यह कसम खाई थी कि अब मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा। 18 महीने जेल में बिताने के बाद हाजी मस्तान बाहर आया। इस दौरान जब चुनाव हुए तो इंदिरा गांधी उस चुनाव में हार गई। जनता पार्टी की जीत हुई।   जनता की सरकार आने के बाद तकरीबन 40 कैदियों को रिहा किया गया।

जिनमें हाजी मस्तान भी शामिल था। क्योंकि उसने कोई ऐसा क्राइम तो किया नहीं था। बल्कि इमरजेंसी के दौरान कई नेताओं की मदद की थी। इसके बाद 1980 में हाजी मस्तान हज करने के लिए चला जाता है। हज करने के बाद मस्तान हैदर मिर्जा का नाम बदल जाता है। लोग उसे Haji Mastan कहना शुरू कर देते हैं। वह हज कर कोई आ चुका था। हज से वापस आने के बाद हाजी मस्तान एक राजनीतिक पार्टी का गठन करते हैं। महाराष्ट्र में उस वक्त एक दलित नेता थे। जिनका जोगेंदर कावड़े था इन्होंने उसी के साथ मिलकर पार्टी बनाई थी।

1984 में यह एक पार्टी दलित मुस्लिम सुरक्षा महासंघ के नाम से एक पार्टी का गठन करते हैं। लेकिन 1990 में इसका नाम बदलकर भारतीय अल्पसंख्यक महासंघ कर दिया जाता है। कई जगह पर निकाय वगैरह के चुनाव भी लड़ते हैं। इस पार्टी के प्रचार में दिलीप कुमार ने काफी मदद की थी। वह कई रैलियों में प्रचार के दौरान गए भी थे।  हालांकि कहते हैं कि पार्टी बनाने के बाद हाजी मस्तान को बहुत ज्यादा कामयाबी नहीं मिली। मगर इन चुनाव के दौरान काले धन की काफी खपत हो गई थी। लोग कहते हैं कि उसी वक्त से चुनाव में काले धन का इस्तेमाल होना शुरू हुआ।

Don Haji Mastan के काम करने के नियम-

इस बीच दाऊद इब्राहिम लगातार हाजी मस्तान के लिए काम कर रहा था। यह जो अरुण गवली हो या छोटा राजन यह सारे उभर कर आ रहे थे। हाजी मस्तान के उत्तराधिकारी के तौर पर दाऊद इब्राहिम का नाम था।  हाजी मस्तान के बाद वही उसकी जगह लेगा। लेकिन हाजी मस्तान के दो तीन नियम थे।

  1. उसमें ड्रग्स  नहीं होगा।
  2. उस में शराब नहीं होगी।
  3. उसमें हथियार नहीं होंगे।

जब तक हाजी मस्तान पावरफुल थे जब तक यह नियम चलते रहे। हाजी मस्तान ने दाऊद इब्राहिम को एक नसीहत भी की थी। पुलिस जब तक तुम्हारे पीछे नहीं पड़ेगी जब तक के तुम आम आदमी को इस काम में ना घसीटो। अगर तुम अपना काम करते रहे तो तुम्हें पुलिस कभी भी नहीं छुएगी।

एक नियम था कि जो भी गलत काम करना हो वह रात को 9:00 बजे से लेकर सुबह के 5:00 बजे तक करना है। क्योंकि सुबह के 5:00 बजे के बाद आम आदमी बाहर आ जाते हैं। जब तुम यह करोगे तो तुम आम आदमी के बीच में नहीं आओगे और जब तुम आम आदमी के बीच में नहीं आओगे तो पुलिस तुम्हारे बीच में नहीं आएगी। लेकिन धीरे-धीरे राजनीति में आने के बाद हाजी मस्तान की पकड़ ढीली होती चली गई। उधर दाऊद इब्राहिम का कद बढ़ता चला गया। दाऊद इब्राहिम ने फिर हाजी मस्तान का गैंग ही छोड़ दिया। वह अपना खुद का गैंग चलाने लगा।

दाऊद इब्राहिम फिर व सारे काम करने लगा जो हाजी मस्तान ने उसे मना किए थे

  • ड्रग्स की स्मगलिंग।
  • शराब।
  • हथियार।
  •  यहां तक कि बॉलीवुड से पैसा भी वसूल करने लगा।

हाजी मस्तान के ऊपर बनाई गयी फिल्म-

अंडरवर्ल्ड बदलता चला गया। इसके बाद हाजी मस्तान के ऊपर एक फिल्म बनाने की राय पेश की गई। इस फिल्म की कहानी सलीम जावेद साहब ने लिखी। जिसका करैक्टर अमिताभ बच्चन ने किया। इस फिल्म का नाम दीवार था। हाजी मस्तान के जिंदगी के करैक्टर को समझने के लिए सलीम खान और अमिताभ बच्चन कई-कई बार उनके घर पर जाकर काफी वक्त बिताया करते थे। ताकि उनके इस कैरेक्टर को समझा जा सके। यह फिल्म काफी सुपरहिट हुई थी। इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन की जिंदगी बदल कर रख दी थी। इसके बाद हाजी मस्तान के ऊपर एक और फिल्म आई जिसका नाम वंस अपॉन ए टाइम था। इसमें अजय देवगन ने हाजी मस्तान का रोल किया था।

हाजी मस्तान की मौत-

1994 में हाजी मस्तान की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई और वह आखिरी वक्त उसने अपने परिवार के साथ ही बिताए थे और इसी के साथ करीम लाला और वृद्धा राजन भी चल बसे थे हाजी मस्तान के परिवार में अभी दो बेटी और उसका एक गोद लिया हुआ बेटा है क्योंकि इसका कोई बेटा नहीं था तो उसने एक लड़के को गोद ले लिया था उसका नाम सुंदर है

यह कहानी एक पति पत्नी की है। पति पत्नी के बीच खेले गए एक खेल की कहानी है। लेकिन उस खेल के पीछे कैसी खूनी साजिश थी। इससे पति या पत्नी में से एक अनजान था। मगर दूसरे को सब कुछ पता था। पति पत्नी के बीच एक खेल खेला जा रहा है। यह बात राजस्थान के शहर जोधपुर की है। जहां पर यह खेल खेला जा रहा था। कत्ल से पहले पत्नी, पति को कहती है।  मुझे तुम्हारे दोनों हाथ बांधने हैं। पति कहता है ठीक है, बांध दो। कत्ल से पहले हाथ बांधने के बाद पत्नी, पति से कहती है। मुझे तुम्हारा गला दबाना है। पति मुस्कुरा कर कहता है। कि दबा दो।

पति के साथ खेल-

गला दबाने के बाद पत्नी, पति से कहती है। मैं तुम्हें सचमुच मारने जा रही हूं। पति फिर हंसकर कहता है कि मार डालो। इसके बाद वह अपने पति का गला जोर से दबाती है। पति भी मजाक ही समझ रहा है। हंस रहा है, और अपनी पत्नी की तरफ देख रहा है। लेकिन पत्नी के हाथ का जो दबाव है। वह गले पर लगातार तेज होता जा रहा है। तकलीफ हो रही है मगर पति अब भी मजाक ही समझ रहा है। वह मुस्कुरा रहा है, हंसते-हंसते गले पर दबाव इतना तेज था कि पति कुछ देर बाद बेहोश हो जाता है। वो फिर गला दबाती है। लेकिन (But) पति अब बेहोश है। ना वह चीख पाता है, ना चिल्लाता है। और थोड़ी देर के बाद उसकी सांसे रुक जाती है, पर खेल भी जारी था।

पति की मौत-

पत्नी उसको देखती है। उसके सीने की धड़कन सुनती है। पति के दोनों हाथ पैर अभी भी बंधे हुए हैं। गले से हाथ हटाकर देखती है। कि नवज नहीं चल रहा है। लेकिन उसे यकीन नहीं होता कि यह भी जिंदा है, या मर गया। फिर वह एक ब्लेड उठाती है। पति के बंधे हुए हाथ में से एक हाथ की कलाई को काट देती है। जैसे ही कलाई काटती है।  खून की धार निकलने लगती है। उसके बाद वह उसी कुर्सी के पास बैठ जाती है। अगले 2 घंटे तक वह अपने पति के करीब ही बैठी रहती है।

बदन से खून निकलने का सिलसिला जारी था। धीरे-धीरे (slowly) जिस्म से सारा खून बाहर निकल जाता है। 2 घंटे बाद वह फिर उठती है। पति के करीब जाती है। देखती है, कि जिस्म से अब खून निकलना बंद हो चुका था। बल्कि खून अब नीचे जमना शुरू हो चुका था। उसके बाद वह फिर उसकी धड़कन सुनती है। अब उसको यकीन हो गया था कि वह मर चुका है। इसके बाद वह खड़ी होती है।

पति पर ख़ुदकुशी का इल्जाम-

दरवाजा खोलती है, और चीखती हुई दरवाजे से बाहर निकलती है। रोते हुए यह कह रही थी कि मेरे पति ने खुदकुशी कर ली। सास ससुर बाहर सो रहे थे। बहु की आवाज सुनकर वह फौरन कमरे से बाहर निकलते हैं। बदहवास अपने बेटे के कमरे की तरफ भागते हैं। देखते हैं, कि बेटा कुर्सी पर है। लेकिन तब तक उसने उसके हाथ खोल दिए थे। बेड नीचे पड़ा हुआ था कलाई का नस कटा हुआ था। पहली नजर में तो यही लगा था। हाथ का नस काटा गया है। खुदकुशी की गई है। घर के अंदर रोना पीटना शुरु हो जाता है। इसके बाद पड़ोसी भी वहां आ जाते हैं। एक पड़ोसी पुलिस को फोन कर देता है। पुलिस वहां पर पहुंच जाती है। उस लाश को वहां से उठाकर ले जाती है। मगर जब तक उसकी जान निकल चुकी थी।

पुलिस की छानबीन की शुरुआत-

उसके बाद वह घर वालों के एक-एक करके सभी के बयान लेती है। उसमें यही आता है, कि पति और पत्नी दोनों सो रहे थे। रात को अचानक बीवी चीखती हुए निकलती है।   मेरे पति ने खुदकुशी कर ली है। उसके बाद की सारी चीजें तो सभी को मालूम थी। हाथ जिस तरीके से कटा हुआ था, क्योंकि बाए हाथ की नस कटी हुई थी। जाहिर सी बात है, कि आदमी दाएं हाथ से ही बाए हाथ की नस काटता है। क्योंकि वह राइट हैंडर ही था। इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नहीं थी। लेकिन सवाल मौजूद था। उस सवाल के पीछे एक मजबूत वजह थी। उसने खुदकुशी क्यों की। अब इस सारी चीजें को समझने के लिए इसके बैकग्राउंड को जानना बहुत जरूरी है। सवाल यह कि वह खुदकुशी क्यों करेगा।

पति के पीछे की जिंदगी की छानबीन-

इस खूनी खेल से ठीक 6 महीने पहले जनवरी 2016 में जोधपुर के रहने वाले रोहित की शादी सीमा से होती है। शादी के बाद रोहित बहुत खुश था। नई-नई दुल्हन उसकी जिंदगी में आई थी। वह उसे बहुत प्यार करता था। इसकी बीवी भी बहुत खूबसूरत थी। रोहित की जिंदगी बड़ी खुशगवार चल रही थी। लेकिन दूसरी तरफ सीमा की जिंदगी में खुशियां नहीं थी। शादी तो कर ली लेकिन वह इस शादी से खुश नहीं थी। अब इसके पीछे दो तीन चीजें थी सीमा की पहले भी एक शादी हो चुकी थी। लेकिन वह शादी टूट गई थी। उसके बाद उसके घर वालों ने उसकी दूसरी शादी कर दी थी। क्योंकि सीमा काफी खूबसूरत थी तो दूसरी शादी होने में मुश्किल भी पेश नहीं आई।

वहां पर शादी का तरीका-

वहां पर शादी का एक तरीका है। लड़के और लड़की के घरवाले रिश्ता देखकर शादी नहीं करते। बल्कि बीच में दलाल के जरिए शादी कराई जाती है। वह इस चीज का पैसा लेते हैं। यह मशहूर है की दलाल पैसों के लालच में 1 तरीके से लड़की को बेच देते हैं। यह जो बिरादरी है, यह पैसे लेकर शादी कराती है। जिस लड़की की शादी हो रही हो उसके घर वालों को भी पैसे मिलते हैं। एक चीज यह भी थी कि सीमा के घर वालों ने सीमा की शादी कराने के लिए कुछ ऐसे ही लोगों को पकड़ा। जिससे उसकी शादी हो जाए। कहते हैं, कि उस दलाल ने बाकायदा सीमा के घर वालों को पैसे दिए।

रोहित के घर वालों ने भी सीमा के घर वालों को पैसे दिए थे। दूसरी यह कि जिस बिरादरी से सीमा थी ।वहां पर एक और रिवाज था। शादी होने के बाद लड़की 12 महीने तक अपने मायके वापस नहीं आएगी। जैसे सभी जगह अलग-अलग रिवाज है। कहीं शादी के अगले दिन मायके पहुंच जाते हैं।कहीं 4 दिन के बाद, कहीं 3 दिन के बाद। लेकिन जोधपुर में जहाँ की सीमा रहने वाली थी। उनकी बिरादरी में यह रिवाज था। लड़की 12 महीने तक अपने मायके नहीं आती। मगर मायके वाले अपनी लड़की से मिलने उसकी ससुराल जा सकते हैं।

सीमा के खुश न होने की वजह-

इस शादी से रोहित तो बहुत खुश था मगर सीमा खुश नहीं थी। उसकी पहली वजह यही थी कि-

  1. उसकी पहले अभी एक शादी हो चुकी थी। जिसकी बात बाद में खुलकर सामने आई।
  2.  सीमा को अपने ही इलाके में किसी लड़के से प्यार था। वह उससे शादी करना चाहती थी ।लेकिन उसकी शादी उससे नहीं हुई।

लेकिन सीमा के घर वालों ने दलाल के जरिए रोहित से उसकी शादी करा दी और इसके बदले उन्हें पैसे भी मिले।

दूसरी वजह  यहीं की सीमा अब एक साल तक घर वापस नहीं जाएगी। वह वहां पर अपने आशिक से नहीं मिल पाती। यह बात सीमा को बहुत चुभ रही थी। इस दौरान में जब उसके मां-बाप उससे उसके ससुराल में मिलने आए। उसने कहा भी था कि मुझे जाना है। उसने यहां तक भी कहा था, कि मैं यह शादी तोड़ना चाहती हूं। उसके मां बाप ने समझाया, अब वह मां-बाप की बातों में आकर वहां रहे तो रही थी। मगर दिल से नहीं रह रही थी।

मैसेज के जरिये आशिक को बुलाना-

इसी बीच उसने एक मैसेज किसी के जरिए अपने आशिक को भिजवाया। उसको ससुराल पर बुलवाया गया। उसको अपने भाई की तरह मिलाया कि यह मेरा भाई है। वह बाकायदा उसके ससुराल में रहा।  इसके बाद वह एक दो बार और वहां पर आया।  जिससे उसका आना-जाना शुरू हो गया। उसे लगा कि यह बात ज्यादा दिन तक छुपी नहीं रहेगी। उसका राज खुल जाएगा। इसलिए वह चाहती थी। किसी तरह यह रिश्ता टूटे और मैं यहां से चली जाऊं। लेकिन ऐसा कोई मौका मिल नहीं रहा था। क्योंकि जिससे वह प्यार करती थी। उसका आना जाना यहां शुरू हो चुका था। इन दोनों ने मिलकर एक प्लान बनाया। कुछ ऐसा करते हैं। जिससे रास्ता साफ हो जाए। इस दौरान में सीमा ने एक दो बार भागने की कोशिश भी की थी मगर वह नाकाम रही।

अब वह अपने आशिक के साथ मिलकर यह प्लान बनाती है। कि जब तक हम रोहित को अपने रास्ते से नहीं हटाएंगे। हम दोनों की शादी नहीं हो सकती। लेकिन खतरा यह था कि अगर कत्ल हुआ तो हम पर शक होगा। ऐसा क्या किया जाए कि जिससे किसी को शक ना हो।

रोहित को मरने का Plan-

इस दौरान में सीमा ने न्यूज़ चैनल पर यह खबर देखी। यह खबर गुजरात की थी। दो भाई-बहन आपस में लुका छुपी का खेल खेलते हैं। आंख पर पट्टी बांधकर वह खेल खेलते हैं। बहन अपने भाई की आंख पर पट्टी बांध देती है। फिर बाद में धोखे से उसकी जान ले लेती है। यह सब कुछ खेल-खेल में हुआ था। इत्तेफाक से यह कहानी सीमा ने न्यूज़ चैनल पर देखी। उसके बाद अचानक उसको यह आइडिया कि अगर इस तरीके से किया जाए। पहला तो यह कि मुझे अपने पति को कंट्रोल करने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। दूसरा यह कि इस तरीके से मारेंगे कि लगे के जैसा वह खुदकुशी कर रहा हो।

इसी के बाद 6 मई 2016 को सीमा अपने घर में खाना खाने के बाद जब पूरा परिवार सोने चला गया। अपने पति रोहित से कहती है, कि आओ एक खेल खेलते हैं। रोहित गुजरात की उस खबर से बिल्कुल अनजान था। क्योंकि वह अपनी बीवी से बेशुमार मोहब्बत करता था ।उसके मन में जरा सा भी शक नहीं था। रोहित तैयार हो गया। वह उसको कुर्सी पर बैठा देती है। उसके बाद उसके दोनों हाथ बांधती है। फिर वह उसका मजाक मजाक में गला दबाती है। उसका पति कहता है दबा दो। इसी खेल खेल वह उसको को मार देती है।

पुलिस की छानबीन-

अब पुलिस के लिए छानबीन में मुश्किल था।  ये खुदकुशी है, या कत्ल किया गया है। उधर सीमा का रो-रो कर बुरा हाल था। इसकी शादी 6 महीने पहले ही हुई थी। पुलिस अपनी चुपचाप जांच करती रही। घर से ऐसा कोई सबूत भी नहीं मिला। पुलिस को था की कोई तो वजह होगी जिससे रोहित ने खुदकुशी की हो। क्योंकि रोहित शादी के बाद से ही बहुत खुश था। उसका कारोबार भी सही चल रहा था।  मां-बाप से भी सही रिश्ता चल रहा था।उसके सारे दोस्त भी अच्छे थे। कोई ऐसी वजह भी नहीं लग रही थी कि वह खुदकुशी कर सके।

पुलिस का क़त्ल का यकीन-

जब पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि ऐसी कोई भी वजह नहीं है। कि वह खुदकुशी कर सकता हो। फिर पुलिस ने इसको कत्ल की नजर से देखना शुरू कर दिया। क्योंकि कमरे के अंदर सिर्फ दो लोग थे। और कमरा अंदर से बंद था। सीमा रोती हुई कमरे से बाहर आई थी। इसलिए लगा कि जो भी हुआ कमरे के अंदर हुआ। फॉरेन एक टीम वहां पर गई। उन्होंने जांच शुरू कर दी। कुछ फिंगरप्रिंट्स उठाएं। फिंगरप्रिंट्स के जरिए बहुत सारी चीजें सामने आई।

पुलिस को सीमा पर फ़ौरन शक हो गया। ये खुदकुशी नहीं बल्कि कत्ल किया गया है। इसको खुदकुशी की शक्ल देने की कोशिश की गई है। इसके बाद पुलिस सीमा से सख्ती के साथ पूछताछ करती है। क्योंकि सीमा  एक प्रोफेशनल किलर नहीं थी। जब पुलिस सख्ती के साथ पूछती है, तो सीमा आसानी से टूट जाती है। वह सारी कहानी बोल देती है। जो आपने अभी ऊपर पढ़ी।

क्योंकि सीमा का आशिक इस क़त्ल में शामिल नहीं था। मगर उसको पता था कि रोहित का कत्ल होने वाला है। पुलिस ने उसको भी गिरफ्तार कर लिया। यह मामला अब अदालत में चल रहा है। इसका फैसला आना अभी बाकी है। आगे इसमें जो भी अपडेट होगा वह आपको जरूर बताया जाएगा।

यह कहानी  Sohail Hingora Kidnapping की है। इसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती ।सबसे बड़ी बात यह है के फिरौती मिलने के बाद जो अगवा किए गए हैं । उनको छोड़ दिया जाता है । इस कहानी में यह होता है कि एक शख्स को किडनैप किया जाता है । उसके बाद उसको 1 महीने तक अपने पास ही रखा जाता है। उसे ढूंढने की पुलिस पूरी कोशिश करती है पर वह नहीं मिलता फिर 1 महीने के बाद जब वह अपने घर लौटता है। तब असली कहानी शुरू होती है तब सभी राज और सभी बातें खुलकर सामने आती है तो यह थोड़ी अजीब सी कहानी है।

Sohail Hingora Kidnapping को जब अंजाम दिया गया –

बात 2013 की है। 29 अक्टूबर गुजरात के शहर सूरत मैं एक बहुत बड़े बिजनेसमैन जिनका नाम हनीफ हिंगोरा था और उनके अलग-अलग कारोबार थे। वह बहुत रईस आदमी थे। वह अपने परिवार के साथ सूरत में रहते थे। दमन के अंदर भी उनका काफी बड़ा कारोबार था । वहां पर भी उनकी एक फैक्ट्री थी । उनका एक बेटा था जिसकी उम्र लगभग 40 साल थी जो उनका कारोबार देखता था जिसका नाम सोहेल हिंगोरा था। 29 अक्टूबर 2013 को सोहेल हिंगोरा अपनी फैक्ट्री जो दमन में थी वहां पर गया हुआ था। वह काफी मजबूत आदमी था दो चार आदमी से अकेला निपट सकता था। जब वह फैक्ट्री से निकल रहा था तो कुछ लोग उसका बाहर इंतजार कर रहे थे । वह चार पांच गाड़ियों में थे और जैसे ही सुहेल बाहर आता है तो यह लोग उस पर काबू पाने की कोशिश करते हैं, क्योंकि सुहेल भी काफी ताकतवर था तो उनमें काफी झड़प हुई मगर वे तादाद में ज्यादा थे तो इसलिए उन्होंने किसी तरीके से सुहेल पर काबू पा लेते हैं और  उसको अपनी गाड़ी में डाल लेते हैं । उस पर काबू पाने के लिए उसको एक नशे का इंजेक्शन लगा देते हैं जिससे वह बेहोश हो जाता है और इसके बाद वह ज्यादा विरोध नहीं कर पाता और भी उसको लेकर चले जाते हैं।

उस वक्त फैक्ट्री के लोगों ने देखा तो उसके बाप हनीफ हिंगोरा को Sohail Hingora kidnapping के बारे में बताया गया। हनीफ हिंगोरा परेशान हो गया इसके बाद वह पुलिस में रिपोर्ट कर देता है पर पुलिस को भी कोई जानकारी नहीं मिली। 3 दिन बाद हनीफ हिंगोरा के पास एक फोन आता है और फोन करने वाला कहता है आपका बेटा सोहेल हिंगोरा हमारे कब्जे में है और हमने उस को अगवा कर लिया है और उससे अपनी डिमांड मानने के लिए कहते हैं। लेकिन फोन पर जो फिरौती मांगी गई थी उसने हनीफ हिंगोरा को हिला कर रख दिया। भले ही हनीफ हिंगोरा एक कारोबारी आदमी था मगर उससे सौ करोड़ की फिरौती मांगी गई थी । अब सौ करोड़ का अचानक से इंतजाम करना और देना यह बहुत मुश्किल काम है।

इसके बाद वह सारी बातें पुलिस को बता देते हैं पुलिस वालों ने पहले से ही इनके फोन सर्विलेंस पर लगा रखे थे। इसके बाद अगले दिन दूसरा फोन आता है और बातचीत होती है और फिर तीसरा फोन आता है इसी तरह फोन का सिलसिला चलता रहा पर कोई बात नहीं बनी क्योंकि डिमांड 100 करोड़ की थी बात चौकाने वाली यह थी कि हर बार फोन जो आता था वह एक नए नंबर से आता था और नई लोकेशन से और वह फोन काटने के बाद फॉरेन बंद कर दिया करता था इसी वजह से उसकी लोकेशन पता करना मुश्किल हो गया करीब 10 से 15 कॉल आई थी और हर फोन नए नंबर से आया थी इसका मतलब यह था कि जिसने भी अगवा किया है वह बहुत होशियार था और उसे हर चीज का पता था ।इसी लिए वह हर चीज के लिए सही कदम उठा रहा था।

Kidnapping की फिरौती की रकम –

जैसे जैसे दिन बीत रहे थे वैसे ही हिंगोरा परिवार की धड़कन तेज हो रही थी और पुलिस को भी डर लग रहा था कि कहीं सोहेल हिंगोरा के साथ कुछ गलत ना हो जाए । पुलिस को कोई सुराग मिल नहीं रहा था और इधर फोन पर बात जारी थी आखिर में हनीफ हिंगोरा ने उनको समझाया कि मेरे लिए 100 करोड़ रुपए जमा करना आसान नहीं होगा । इसी लिए वह रकम फिरौती में मांगे जो मैं दे सकता हूं, कहते हैं कि बाद में 9 से 25 करोड़ के बीच में बातें हो गई मगर इसमें पुख्ता क्या है यह सही से पता नहीं पर यह पता है कि 9 से 25 करोड़ के बीच में बात तय हुई थी। उधर उनको भी लगा कि उन्होंने 100 करोड़ ज्यादा मांग लिए तो उन्होंने भी रकम कम कर ली।

इसके बाद जब पुलिस ने उन सभी नंबरों की लोकेशन को निकाला तो उनमें से एक कॉल गुजरात का था, दूसरा कॉल उत्तर प्रदेश का था, तीसरा कॉल उड़ीसा से था, बिहार से भी था इसके अलावा और भी  6-7 जगह से कॉल की जा रही थी। इसका मतलब यह था कि उनका गैंग बड़ा है, जो अलग-अलग जगह पर है, और हर अलग-अलग जगह से कॉल कर रहा है।

जब पैसों की बात हो गई तो किडनैपर ने कहा कि वह एक जगह बताएगा तो वहां पर पहुंच जाना । इसके बाद 25 नवंबर को हनीफ हिंगोरा के पास फोन आता है कि आप पैसे लेकर बिहार पहुंच जाएं तब तक उनको जगह नहीं बताई गई थी उनको सिर्फ पटना पहुंचने के लिए कहा गया था । फिर पटना पहुंचने के बाद उनको छपरा बुलाया गया जो वहां पर एक जगह है।

हनीफ हिंगोरा से यह बात कही जाती है कि वह यह बात किसी को ना बताएं वरना उसके लड़के को मार दिया जाएगा। अभी पुलिस भी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी । वह पहले उनके लड़कों को छुड़ाना चाहती थी । उसके बाद में सारा मसला हल करना चाहती थी । इसीलिए हनीफ हिंगोरा पैसे लेकर छपरा पहुंच गया। वहां पर उससे पैसे ले लिए गए और उससे बताया गया कि तुम्हारा लड़का पटना में एक गंगा सेतु पुल है वहां पर वह आपको मिलेगा और उनको टाइम और जगह बता दी पैसा देकर हनीफ हिंगोरा वापस पटना लौट जाते हैं। जब यह पटना में उस बताई हुई जगह पर जाते हैं तो उसी बताई भी जगह पर उस पुल के नीचे सोहेल हिंगोरा मौजूद था किडनैपर पर उसको वहां छोड़कर निकल गए थे। इसमें उन्होंने पुलिस को भी धोखा दिया था क्योंकि पुलिस को लगा था कि सोहेल हिंगोरा किडनैपर के पास ही होंगे मगर उसको उन्होंने दूसरी जगह पर रखा था और पैसा लेने के बाद वह जगह बताई थी इसी लिए  पुलिस को धोखा देने में भी कामयाब हो गए।

जब सोहेल हिंगोरा उनको पुल के नीचे मिला था तो वह पूरी टीम उसको वापस लेकर सूरत आ जाती है । करीब 27 दिन किडनैपर के कब्जे में रहने के बाद सोहेल हिंगोरा की हालत काफी खराब हो गई थी इसीलिए उसको सबसे पहले डॉक्टर को दिखाया गया और इसकी हालत को नार्मल करने की कोशिश की गई। एक-दो दिन के बाद जब वह नॉर्मल हो जाता है तब गुजरात पुलिस पहली बार सुहेल से बातचीत करती है पूरे किडनैपिंग की कहानी पूछना चाहती है। इसके बाद सोहेल से जब पूछताछ होती है तो सोहेल अपनी कहानी सुनाता है, कि दमन से उसे अगवा किया गया था लेकिन उसे पूरा रास्ता नहीं मालूम क्योंकि जब भी उसे होश आता था वह उसे इंजेक्शन दे दिया करते थे और वह बेहोश हो जाया करता था और उसकी आंखों पर पट्टी थी कई बार जब उसे होश आया और उसने जाहिर नहीं किया कि मैं होश में हूं आंखें बंद रखता था मगर उनकी बातें सुना करता था लेकिन उससे कोई आईडिया नहीं मिला और वह लगातार सफर कर रहा था फिर उसके बाद उसको एक घर में ले जाया गया इसी तरह दो तीन अलग-अलग घर में रखा गया और इसके बाद एक घर में ले जाया गया जिसमें वह लगभग 20-25 दिन रहा।

उस घर में ले जाने तक भी उसकी आंख पर पट्टी थी । इस बारे में उसको कुछ नहीं पता था। उसको आसपास के इलाकों और घर के बारे में भी कुछ नहीं पता था क्योंकि उसे उस घर से बाहर निकलने ही नहीं दिया गया। इसीलिए कोई बता नहीं सकता था कि वह इतने दिन तक कहां था और किस इलाके में था क्योंकि जो किडनैपड थे वह भी उसके सामने नाम लेकर बातें नहीं किया करते थे और उसने कहानी बताइ जिस घर में उसे रखा गया था उस घर में शादी थी और उस शादी के लिए जिस कमरे में था तो उसे एक कमरे से निकाल कर दूसरे कमरे में ले जाया जाया करता था और जो दूल्हा था उसके पास आया करता था और उन्होंने सोहेल हिंगोरा से दूल्हे के कमरे का पेंट भी कराया था क्योंकि वह दिन भर वही रहता था तो इस लिए उससे काम भी कराया करते थे । जिस घर में उसको रखा था उस घर से एक बारात गई थी और जब बारात गई तो कुछ लोग को उसकी हिफाजत के लिए छोड़ा गया था।

वह सारी चीजें पुलिस को बता देता है पर इससे पुलिस को कुछ मालूमात नहीं मिलती जिससे कि वह लोकेशन का सही पता कर सके । पुलिस उससे कहती रही कोई ऐसी चीज बताएं कि जिससे हमें कोई रास्ता मिले। जो भी याद आता रहा पुलिस से बताता चला गया और उसे यह भी पूछा गया है कि तुम रोजाना क्या किया करते थे उसने बताया कि मैं घर मुझसे वह घर का काम भी करवाया करते थे उन्होंने मेरे लिए कमरे में एक टीवी भी लगवा दिया था तो मैं टीवी पर फिल्में और कई ऐसी चीजें देख लिया करता था जिससे मेरा वक्त गुजर जाया करता था।

इसके बाद एक दिन अचानक उसने पुलिस को एक बात बताई। वहीं से सारी (Sohail Hingora Kidnapping) कहानी पलट गई। उसने बताया दरवाजा बंद कर दिया जाता था और बाहर से कुछ लोग पहरेदारी करते थे। वह निगरानी भी ऐसी होती थी कि किसी को पता ना चले। वह दिन भर अंदर टीवी देखा करता था कभी-कभी जब टीवी का रिचार्ज खत्म हुआ तो एक-दो बार टीवी के डिस्प्ले पर रिचार्ज के बारे में आया था। उसने बताया कि उस घर में एयरटेल का कनेक्शन लगा हुआ था शायद एयरटेल की डिश में कुछ टेक्निकल प्रॉब्लम थी या शायद उसका रिचार्ज खत्म हो गया होगा ।जिसकी वजह से उस का नंबर उसकी स्क्रीन पर आता था। वह कई बार आया करता था। जिसकी वजह से वह उसको याद हो गया था।

उसने वह नंबर पुलिस को बता दिया। यह नंबर काम कर गया और पुलिस ने पता लगाया कि यह नंबर कहां का है। यह कनेक्शन कहां लगा हुआ है, तो पता चला कि यह बिहार में छपरा का है। फिर छपरा में कहां का है। फिर सभी जो कनेक्शन प्रोवाइडर होते हैं। उनसे पता करते-करते आखिर पुलिस एक घर को पहचान लेती है, और उस घर में जाती है।

यह जो डिश का नंबर था यह उस घर में लगे हुए टीवी का नंबर था । उसके बाद पता किया गया उस घर में कौन रहता है तो पता चला कि इस घर में अभी हाल ही में एक शादी हुई है जो मेन आदमी था रंजीत सिंह जिसकी शादी हुई थी और उसके सभी भाई जो वहां रहे थे उनको पुलिस गिरफ्तार कर लेती है और मामला सीआईडी को सौंप दिया गया था। जब उनसे पता किया गया कि इनके पिता कौन है तो पता चला कि इनके पिता झारखंड में एक सब इंस्पेक्टर है। अब यह अजीब कनेक्शन था फिर उसको उठाया गया । इन सब को उठाने के बाद पता चला कि इस किडनैपिंग में यही परिवार शामिल था और इनका अपना एक गैंग था और इन लोगों को किसी ने मुखबरी की थी जो इसी गैंग से मिले हुए होते हैं और इन लोगों ने इस किडनैपिंग की प्लानिंग की। इसमें करीब 50 लोग शामिल थे। जिन्होंने Sohail Hingora kidnapping को अंजाम दिया था। हर एक को इसमें अलग किरदार दिया गया था।

  1. इंफॉर्मेशन किसी ने दी।
  2. गाड़ी एक शहर से दूसरे शहर में कोई और ले कर गया।
  3. एक स्टेट से किसी दूसरे स्टेट में गाड़ी कोई और ले कर गया।
  4. सिम कार्ड किसी और ने खरीदा।
  5. फोन करने के लिए अलग-अलग स्टेट में कोई और जाया करता था।
  6. इसकी निगरानी कोई और करता था।
  7. पैसे के लिए जो फिरौती की रकम आई कोई और गया।
  8. छोड़ने के लिए कोई और गया।

इस तरीके से करीब 50 लोग इस Sohail Hingora kidnapping में शामिल थे। इसके बाद ऑफीशियली खबर आती है। 9 करोड़ रुपए दिए गए थे। बाद में फिर खबर आई कि 25 करोड़ दिए गए थे। सुहैल हिंगोरा को बचाने के लिए।

यह सभी पैसे इन 50 लोगों में बांटे गए थे। इन्होंने इन रुपए को अपने अकाउंट में जमा कर दिए थे। जिनको बाद में पुलिस ने सीज कर दिया।इनमें से एक आदमी तो बाकायदा दिल्ली फ्लाइट से आया था और पजेरो गाड़ी खरीद कर बाय रोड बिहार गया था। जिसको बाद में पुलिस ने जप्त कर ली थी। इस तरह पुलिस ने इन सभी को गिरफ्तार कर लिया। जो इस Sohail Hingora Kidnapping में शामिल थे।

लोगों के बीच में जब भी कभी अंडरवर्ल्ड डॉन का जिक्र होता है, तो लोग हमेशा दाऊद इब्राहिम का ही नाम लेते हैं। मगर हकीकत में जो डॉन नाम का शब्द आया था, वो कहीं और से आया था। कुछ लोग हाजी मस्तान को मुंबई का पहला डॉन मानते हैं। हकीकत में  Mumbai First Don Karim Lala था। इस बात का इकरार खुद हाजी मस्तान ने भी किया है।

इस कहानी की शुरुआत करीब 1925-35 के बीच में हुई। Karim Lala असल में हिंदुस्तानी नहीं था। वह अफगानिस्तान का रहने वाला था। वह अफगान में ही पैदा हुआ था। वह अफगानिस्तान में एक जगह है। वहां पर पैदा हुआ था। एक शाही परिवार में पैदा हुआ था। उनका अच्छा खासा कारोबार था। उस वक्त हिंदुस्तान आजाद नहीं हुआ था। हिंदुस्तान अंग्रेजो के कब्जे में था। करीम लाला का असली नाम अब्दुल करीम शेरखान था।

करीम लाला का हिंदुस्तान आना-

करीब 21 साल की उम्र में अब्दुल करीम शेरखान यानी करीम लाला पेशावर पहुंचा। क्योंकि पेशावर भी उस वक्त हिंदुस्तान में ही था। उस वक्त हिंदुस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था। पेशावर के रास्ते वह मुंबई पहुंच गया। मुंबई का नाम उस वक्त बॉम्बे हुआ करता था। मुंबई आने के बाद करीम लाला का सबसे पहला ठिकाना ग्रैंड ट्रंक रोड था। यहां पर उसने अपना एक किराए का घर लिया। वहीं पर उसने अपना कारोबार शुरू किया। मगर इसका असली कारोबार एक जुए का अड्डा था। यह वहां पर जुए का अड्डा चलाने लगा। जुआ का अड्डा चलाते-चलाते इसके पास काफी पैसे आ गए। उस वक्त तक मुंबई में कोई गैंग या डॉन नाम की कोई चीज नहीं थी। वहां पर उस वक्त छोटा-मोटी गुंडा गुंडागर्दी चलती रहती थी। यह आमतौर पर हर जगह होती है।

इसी के साथ-साथ (together) करीम लाला ने लोगों को ब्याज पर पैसा देना शुरू कर दिया। उसने धीरे-धीरे शराब के अड्डे भी खोलिए। यह सारी चीजें चलती रही। पुलिस को भी इन सब चीजों के बारे में पता चल गया। मगर (But) करीम लाला हमेशा यह सोचता था। दुश्मन को भी दोस्त बनाकर काम किया जाए। फिर उसने पुलिस वालों के साथ मिलकर काम करना शुरू किया। उनको अपना दोस्त बना लिया। उनको उनका हिस्सा दे दिया करता था।

हीरे और सोने की तस्करी का काम शुरू करना-

तकरीबन 1940 में जब तक हिंदुस्तान अंग्रेजों के चंगुल से आजाद नहीं हुआ था। हीरे और सोने की तस्करी की काफी डिमांड चल रही थी। यह सिर्फ छोटे-मोटे पैमाने पर चल रहा था। लेकिन जब (when) Karim Lala का इस तरफ ध्यान गया। उसने सोचा क्यों ना हम भी सोने और हीरे की तस्करी का काम करें। यह सोचकर उसने हीरे और सोने की तस्करी का काम शुरू कर दिया। इस हीरे और सोने की कमाई से उसे काफी आमदनी होने लगी।

इन पैसों के साथ उसका कद बढ़ता गया। उन लोगों से हफ्ता वसूली वगैरह भी करने लगा। यहां तक कि वह एक तरीके से वहां का दादा बन गया था। यह करते-करते उसने अपना एक नया गैंग शुरू कर दिया। उस गेम का नाम पठानी गैंग था। वह हमेशा पठानी सूट पहना करता था। मगर जब उसका कद बढ़ना शुरू हो गया। उसने पठानी सूट छोड़कर सिर्फ सूट पहनना शुरू कर दिया। लगभग अब करीम लाला मुंबई का एक बहुत बड़ा नाम बन चुका था। उसके सामने कोई रुकावट नहीं थी।

हाजी मस्तान की Entry-

इसी के बाद एक और शख्स सामने आता है। उसका नाम Haji Mastan था। हाजी मस्तान ने भी तस्करी का काम करना शुरू कर दिया। हाजी मस्तान को पता था कि इस पूरे काम को चलाने वाला करीम लाला है। करीम लाला की मर्जी के बगैर यह काम करना मुश्किल था। क्योंकि (Because) हाजी मस्तान और कलीम करीम लाला के मिजाज (mettle) आपस में मिलते थे। दुश्मनी करके काम नहीं करेंगे। हाजी मस्तान और करीम लाला (Mumbai first don Karim Lala) में दोस्ती हो गई। एक समझौता हो गया। समझौता यह था कि समुद्री इलाका जहां-जहां से माल उतरता है।

वह तुम्हारा और बाकी का माल हमारा। पठानी गैंग उस माल को उतारने में मदद कर देगी। उसमें जो तुम्हारा हिस्सा होगा वह तुमको मिल जाएगा। यह दोनों में समझौता हो गया। दोनों गैंग बड़े प्यार से अपना धंधा चलाने लगे। धीरे-धीरे करीम लाला और हाजी मस्तान में दोस्ती भी हो गई। बिल्कुल सही चल रहा था मुंबई के लगभग 2 हिस्से हो चुके थे। जिसमें एक तरफ हाजी मस्तान काम कर रहा था। दूसरी तरफ करीम लाला।

वरदा राजन की Entry-

इसी बीच में तीसरे शख्स की एंट्री होती है। उसका नाम वरदा राजन था। वरदा राजन जब आता है। उसे मालूम था कि स्मगलिंग का धंधा करीम लाला की मर्जी के बगैर करना आसान नहीं है। अगर वह अपने बलबूते पर करेगा तो यह करना आसान नहीं होगा। वरदा राजन ने भी करीम लाला और हाजी मस्तान से दोस्ती कर ली। इन तीनों के बीच अब एक समझौता हो गया। अब स्मगलिंग का काम तीन हिस्सों में हो रहा था। तीनों अपना धंधा आपस में चलाने लगे। यहां तक कि बगैर खून खराबा के वह धंधा चला रहे थे।

करीम लाला की छड़ी का Style-

इसी दौरान करीम लाला के पैर में कुछ तकलीफ हो गई। उसे चलने में दिक्कत होने लगी। उसने एक छड़ी लेकर चलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वह छड़ी करीम लाला का स्टाइल बन गया। करीम लाला की लंबाई लगभग 7 फुट थी। वह जब भी भीड़ में खड़ा होता था। अलग ही दिखता था। अब उस छड़ी के साथ चलना एक अलग ही स्टाइल हो गया था। इस छड़ी की भी अपनी एक कहानी बन गई।

एक वक्त ऐसा आया कि पूरे मुंबई में करीम लाला की तूती बोलने लगी। बॉलीवुड में भी उसका अपना अलग ही दबदबा था। वह हर रात अपने घर पर दरबार लगाने लगा।उस दरबार में तमाम लोग अपनी परेशानी को लेकर आया करते थे। चाहे वह हिंदू हो मुस्लिम हो सिख हो इसाई हो आम लोग हो पुलिस हो। यहां तक कि जज भी कई बार कोई झगड़ा और बाकी चीजें सुलझाने के लिए वहां पहुंच जाया करते थे। करीम लाला वहां पर फैसला सुनाया करता था। कई बार ऐसा हुआ जो भी करीम लाला ने फैसला सुनाया। सरकारी औंधे पर बैठे हुए लोग ने उस फैसले को माना।

घर खाली करवाने का तरीका-

किसी का घर खाली करवाना हो या कब्जा छुड़वाना हो। एक दौर ऐसा आया करीम लाला खुद नहीं जाया करता था। वह अपने घर में बैठा रहा करता था। अगर कोई अपना घर खाली नहीं किया करता था। करीम लाला के आदमी जो छड़ी करीम लाला के पास थी। काले रंग की उसी की जैसी कई छड़ी बनाई गई थी। उसके बाद वह छड़ी उस घर के दरवाजे पर रख देते थे। छड़ी रखने का मतलब यह था कि यह छड़ी करीम लाला ने भेजी है। यानी करीम लाला खुद आया है। तुम यह घर खाली कर दो। वरना अंजाम बुरा होगा।  वह छड़ी जिस घर जिस दुकान पर रख दिया करते थे। वह कुछ घंटों के अंदर ही अपने आप खाली हो जाया करता था। करीम लाला का यह खौफ लोगों के अंदर बैठ गया था।

करीम लाला (Mumbai first don Karim Lala) की बॉलीवुड में भी ऐसी पहचान थी। कई बॉलीवुड स्टार के पैसे डूब गए थे तो करीम लाला ने उनके पैसे वहां से निकलवाए। यह सारी चीजें चलती रही। सब कुछ ठीक चल रहा था 1940 से लेकर 1980 तक Karim Lala ने मुंबई पर राज किया। उस वक्त उससे बड़ा डॉन कोई भी नहीं हुआ।

शाबिर कासकर और दाऊद इब्राहिम की Entry-

1980 के बाद कुछ नए गैंग उभरने लगे। जिनमें से दो ना मशहूर थे। एक शाबिर कासकर दूसरा दाऊद इब्राहिम। यह दोनों भी इस स्मगलिंग के कारोबार में उतर गए। लेकिन शाबिर कासकर को पता था कि हम जिस धंधे में उतरे हैं। इस धंधे को पहले से ही 3 लोग कर रहे हैं।

लेकिन वरदा राजन अपना धंधा धीरे-धीरे समेट चुका था। हाजी मस्तान धीरे-धीरे राजनीति की तरफ आ गया था। एक समाज सेवा के तौर पर काम करना शुरू कर दिया।   करीम लाला और उसका पठानी गैंग अब तक Active था। दाऊद को पता था कि अगर मुंबई में काम करना है। अपना दबदबा दबाना है तो करीम लाला से पंगा लेना पड़ेगा। दाऊद इब्राहिम यह चाहता था। वह कोई ऐसा काम करें जिससे कि लोग पूछे जाने पहचाने।

लेकिन Karim Lala को यह पता था। अगर वह पलट कर कोई वार करेंगे तो इसमें दाऊद इब्राहिम का ही नाम होगा। उसकी पहचान बढ़ेगी तो इसलिए (Hence) कई बार कई मामले करीम लाला ने अपने लड़के के जरिए से ही निपटाने की कोशिश की। 1981 से 1985 के बीच इन दोनों बैंकों के बीच में काफी झड़पें हुई। कई लोग इसमें मारे गए। 1985 के आसपास की ही बात है। जब इन दोनों गैंग के बीच झगड़ा चल रहा था। Shabir Kaskar जो दाऊद इब्राहिम का भाई था। उसका नाम बढ़ रहा था।  करीम लाला की गैंग ने Manya Surve को जो वहां का एक गुंडा था। जो बाद में चलकर काफी पॉपुलर हो गया था। उसको Shabir Kaskar की सुपारी दे दी। शाबिर को Manya Surve ने मार दिया। इस मौत से दाऊद इब्राहिम घबरा गया। उसको बहुत बड़ा झटका लगा।

गैंग वॉर की शुरुआत-

Dawood को इस बात का पता चल गया था। पठान गैंग ने उसके भाई को मरवाया है। अब दाऊद इब्राहिम पठान गैंग से अपने भाई का भाई की मौत का बदला लेना चाहता था। उसे मौका नहीं मिल रहा था। इस दौरान में दोनों तरफ से काफी खूनी लड़ाई हुई। कई बार यह चीजें कई लोगों की जान लेकर गई। तब  (Than) जाकर मुंबई पुलिस ने कहा दरअसल यह एक गैंग वॉर है। गैंग वॉर जो शुरू हुआ असल में वह पठान गैंग और दाऊद इब्राहिम की गैंग के बीच में जो लड़ाई थी। मुंबई पुलिस ने उन दोनों के बीच की लड़ाई को गैंग वॉर का नाम दिया था।

दाऊद इब्राहिम के भाई की मौत का बदला-

दाऊद इब्राहिम लगातार अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए बेताब था। करीब 5 साल बीत गए थे। 5 साल तक उसको मौका नहीं मिला था। मगर 5 साल के बाद उसको मौका मिलता है। उसके बाद 1986 में दाऊद इब्राहिम ने मौका मिलते ही करीम लाला के भाई रहीम खान को मार डाला। इसके बाद लगा कि अब बहुत खून बहेगा। क्योंकि Karim Lala बैठेगा नहीं। मगर तब तक करीम लाला की काफी उम्र हो गई थी

पठान गैंग और दाऊद इब्राहिम के बीच झड़पों में काफी खून बह रहा था। पठान गैंग कमजोर होता जा रहा था। इसकी वजह से यह था कि करीम लाला अब इतना ताकतवर नहीं रहा। दूसरी बात यह थी कि करीम लाला हाजी मस्तान और वरदा राजन के बीच जो उसूल थे। उनमें यह था कि-

  1. किसी के परिवार को नहीं छूना
  2. औरत और बच्चों को नहीं मारना

यह सारी जो शर्ते थी। वह दाऊद इब्राहिम के आने के बाद सब खत्म हो गयी। पठान गैंग और दाऊद गैंग के बीच झगड़ों में दाऊद इब्राहिम की गैंग ने इस बात की कभी परवाह नहीं की। ना ही इन उसूलों का कभी पालन नहीं किया।

Mumbai First Don Karim Lala की मौत-

करीम लाला अब बूढ़ा हो गया था। उसने धीरे-धीरे अपना धंधा समेटना शुरू कर दिया। इसके भाई की जान चली गई थी। इस तरीके से उसने दाऊद के लिए रास्ता साफ कर दिया। 1986 के बाद मुंबई पर दाऊद इब्राहिम का राज चलने लगा। हाजी मस्तान पहले से ही राजनीति की तरफ चला गया था। करीम लाला ने अपनी गैंग के कमजोर होने के बाद किनारा पकड़ लिया था। वरदा राजन इस बीच में था ही नहीं। करीम लाला (Mumbai first don Karim Lala) एक आम जिंदगी बिताने लगा। इसके बात सन 2002 में 90 साल की उम्र में करीम लाला की मौत मुंबई में ही हो गई। उसकी मौत के बाद अब दाऊद इब्राहिम के लिए कोई भी अड़चन नहीं बची थी। अब पूरे मुंबई पर दाऊद का ही राज था।

यह कहानी भारत के एक ऑपरेशन की जिसका नाम Operation Cactus था। अगर हम बात करें कि आजाद भारत के बाद हमने कई ऐसे ऑपरेशन किए। विदेश में जाकर किसी सफल ऑपरेशन को अंजाम दिया गया। उसमें से Operation Cactus अपने आप में एक बेहतरीन ऑपरेशन साबित होगा। उस वक्त बहुत सारे देशों ने सोचा भी नहीं था।

हम इस तरह से कर सकते हैं। जबकि जिस मुल्क में यह ऑपरेशन अंजाम दिया गया। उसने ब्रिटेन,यूएस, पाकिस्तान, श्रीलंका कई ऐसे देश से मदद की अपील की थी। हर एक की अपनी-अपनी कई मजबूरियां थी। कुछ सोचते ही रह गए। वक्त पर अगर किसी ने कदम उठाया और फैसला लिया तो वह भारत ही था। सिर्फ 9 घंटे के अंदर-अंदर भारत ने यह फैसला लेकर अपनी फौज को भेजकर पूरी तस्वीर बदल कर रख दी थी।

ऑपरेशन में से जुड़ी हुई कई चीजें हैं-

इस ऑपरेशन में से जुड़ी हुई कई चीजें हैं। जिस वक्त ऑपरेशन के लिए सेना को भेजा जा रहा था। सेना में भी इस चीज को लेकर पूरी तैयारी नहीं थी। क्योंकि (because) सब कुछ अचानक हो रहा था। वक्त नहीं था। आतंकवादी और विद्रोही लगातार आगे बढ़ रहे थे। उस देश के जो राष्ट्रपति थे उनको खतरा था। उन को अगवा किया जाना था। अगर वक्त गंवा देते तो बहुत कुछ गवा देते। इसलिए जल्द से जल्द इस ऑपरेशन को शुरू करना था। लेकिन (But) दिक्कत ये थी। हमारी सेना में उस वक्त जिन लोगों को कहा गया।

इस ऑपरेशन की तैयारी कीजिए। कुछ (Some) तो ऐसे थे। जिनको पता भी नहीं था। यह देश है कहाँ पर। दूसरा यह कि हमें जिस देश में अपनी सेना को भेजना है। वहां पर कौन-कौन से हवाई अड्डे हैं। जो विद्रोहियों के कब्जे में चले गए हैं।  एयरपोर्ट के रनवे की लंबाई कितनी है।  वहां पर हमारे प्लेन लैंड कर सकते हैं, कि नहीं। यह छोटी-छोटी जानकारी नहीं थी। फिर भी इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया।

Maldives के बारे में-

यह कहानी हमारे पड़ोसी देश मालदीप की है। जो काफी खूबसूरत है। लोग वहां पर काफी छुट्टी मनाने आते हैं। हमारे बॉलीवुड स्टार के काफी पसंदीदा है। जो वहां पर घूमने आते हैं। कई फिल्मों की शूटिंग हुई है। हमारे देश के लोगों का शौक है। वहां पर जाकर छुट्टी मनाये। यही वजह है, कि मालदीव में एक बड़ी तादाद हिंदुस्तानियों की होती है।

जो वहां पर छुट्टी मनाने जाते हैं। कभी करीब 25000 इंडियन वहां पर रहते है। जो अपना कारोबार करते हैं। एक छोटा सा देश है। जिस के करीब 4 से 5 लाख तक की आबादी है। यह सिर्फ छोटा देश इस वजह से भी है।   पूरे एशिया में सबसे कम आबादी और सबसे कम एरिया वाले सबसे छोटा मुल्क है। चारों तरफ समुंदर है इसमें करीब छोटे-छोटे 1200 के करीब दीप है। उनको मिलाकर Maldives बना।

Maldives के लिए खतरा-

इस कहानी को आगे बढ़ाया जाए। इससे पहले दो चीजें मालदीप को लेकर जब जलवायु परिवर्तन इन सारी चीजों की बात आ रही थी। उसमें यह भी था कि जिस तरीके से सारी चीजें बदल रही है। एक वक्त ऐसा आएगा कि इस Maldives का नामो निशान मिट जाएगा। समुंदर के लहरे इसको अपने होश में ले लेगी। यह पूरी तरीके से डूब जाएगा। एक वजह यह भी है, कि मालदीव का कोई सा भी ऐसा दीप नहीं है। जो 6 फीट से ज्यादा ऊंचाई का हो। मतलब सबसे ज्यादा ऊंचाई जो है वह 6 फीट की है।

जाहिर सी बात है कि हाइट काफी कम है।  ऐसे में अगर कोई समुद्री तूफान आता है। यह पूरी तरीके से बह जाएगा। इस सब को लेकर मालदीव के नेता इन चीजों को लेकर कदम उठाते रहे। बल्कि एक कैबिनेट की मीटिंग जो मालदीव की सरकार थी। उसने दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था।  एक वक्त ऐसा आएगा कि समुंदर हमारे ऊपर होगा और हम समुंदर के नीचे होंग।

जब भी मालदीव के चुनाव होते हैं। वहां के नेता यह वादा करके चुनाव लड़ते हैं। हम यहां से अपनी जनता को कहीं और ले जाकर बसा देंगे। ताकि समुंदर के डूबने की वजह से हमारी जनता महफूज रहें।

मालदीव में नई सरकारका आगाज –

मालदीव में अंग्रेजों से आजादी के बाद शुरू के कुछ साल राजशाही रही। महाराजाओं ने वहां पर हुकूमत की। मगर कुछ वक्त के लिए। उसके बाद वहां पर डेमोक्रेसी के नाम पर एक नई सरकार आई। Abdul Gayoom वहां के पहले राष्ट्रपति बने। उसके बाद करीब 30 साल तक यह सत्ता में रहे। क्योंकि विपक्ष नाम की कोई चीज ही नहीं थी। वहां पर कोई आवाज उठाने वाला नहीं था। इसी वजह से Abdul Gayoom 30 साल तक वहां पर राष्ट्रपति रहे।

उसके बाद एक जनरलिस्ट ने वहां पर आवाज उठाई। सरकार के लिए कुछ नए कानून और सुधारों के लिए मांग की। क्योंकि बेरोजगारी बढ़ रही थी। वहां के लोगों का सिर्फ पर्यटन पर ही गुजारा होता था। जो उनके लिए सबसे बड़ा Source था। उन जनरलिस्ट का नाम Nasheed था। जिन्होंने यह कैंपियन चलाया। उसके बाद 2008 में 30 साल के बाद मोमिन अब्दुल गयूम चुनाव लड़ने के बाद वहां पर हार गए। Nasheed वहां पर चुनाव जीत गए। उन्होंने वहां पर सत्ता संभाली लेकिन वहां पर उथल-पुथल चलती रही।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom-

यह कहानी नवंबर 1988 की है जब Abdul Gayoom वहां के राष्ट्रपति थे। उनके भारत के साथ काफी अच्छे रिश्ते थे। उस वक्त हमारे यहां पर कांग्रेस की सरकार थी। राजीव गांधी यहां के प्रधानमंत्री थे। 3 नवंबर 1988 को मालदीव के प्रेसिडेंट Abdul Gayoom हिंदुस्तान को दौरे पर आना था। इस दौरे की दावत उनको राजीव गांधी ने दी थी। क्योंकि मालदीव एक छोटा सा देश है। भारत के प्रधानमंत्री ने मालदीव के राष्ट्रपति Abdul Gayoom को लाने के लिए वहां पर एक जहाज भेजा। आप इस जहाज में बैठकर भारत दिल्ली आ जाइए।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom के खिलाफ बगावत-

इस दौरे की जानकारी लोगों को पहले से ही थी। तब मालदीप में कुछ लोग बगावत पर उतरे हुए थे। Abdul Gayoom को सत्ता से हटाकर सत्ता पर कब्जा करना चाहते थे। इस विद्रोह को जो लीड कर रहे थे। वह वहां का एक कारोबारी था। उसका नाम Abdullah Latoofi था। Abdullah Latoofi और उसके साथ उसका एक दोस्त था जिसका नाम अहमद स्माइल मलिक।

इन दोनों ने मिलकर यह प्लानिंग की थी। उनकी सरकार को गिराएंगे। हम यहां पर कब्जा कर अपनी सत्ता चलाएंगे। लेकिन अपने बलबूते पर नहीं सकते थे। क्योंकि मालदीव की सेना में इनकी पूरे तरीके से सेंध नहीं लगी थी। इन्होंने पड़ोसी मुल्क श्रीलंका से श्रीलंका के कट्टरपंथी गिरोह यह एक आतंकवादी टाइप का संगठन था। जो व्यापारी Abdullah Latoofi और मलिक ने मिलकर इस ग्रुप से बात की। उससे कहा कि हम ऐसे-ऐसे सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं।

हमें यहां का तख्ता पलटना है। श्रीलंका के संगठन के 200 आतंकवादी Boat के जरिए मालदीप पहुंच जाते हैं। 3 नवंबर 1988 को यह Maldives पहुंचते हैं। यह लोग पर्यटक के भेष में वहां पर आए थे। इनके सामान के साथ सारे हथियार थे। सिक्योरिटी की चिंता को लेकर वहां पर कोई ऐसी बात नहीं थी। इसलिए कोई ज्यादा Checking भी नहीं हुई। 200 आतंकवादी मालदेव पहुंच जाते हैं। पर्यटन की शक्ल में 3 नवंबर को यहां पर इसलिए पहुंचे थे। क्योंकि वहां के राष्ट्रपति Abdul Gayoom 3 नवंबर को ही भारत का दौरा करना था। भारत सरकार ने वहां पर अपना जहाज में भेज दिया था।

राष्ट्रपति Abdul Gayoom का भारत दौरा रद्द करना-

अचानक (suddenly) भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अचानक से कोई काम आ गया। चुनाव के सिलसिले में उन्हें दिल्ली से कहीं बाहर जाना था। अब प्लेन मालदीप जा चुका था। वह प्लेन में लगभग प्लेन में बैठने ही जा रहे थे। भारत से वहां पर संदेश चला गया कि आप भारत का यह दौरा कुछ दिनों के लिए मुल्तवी कर दीजिए। क्योंकि यहां के प्रधानमंत्री Busy हैं। हम आपको एक नई तारीख बताएंगे। आप फिर भारत आ जाना। इसके बाद फिर Abdul Gayoom अपना दौरा टाल देते हैं। वह फिर वहीं मालदेव की राजधानी में रुक जाते हैं।

वह वापस अपने राष्ट्रपति हाउस में चले जाते हैं। इस दौरान में जो वहां पर बगावत करने अब्दुल्लाह लतीफी और उसके साथी की यह प्लानिंग थी। जब अब्दुल कयूम दिल्ली में रहेंगे। हम उनके पीछे यहां का तख्ता पलट कर देंगे। यहां पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन आखिरी वक्त में यह हुआ कि राजीव गांधी की वजह से मालदीव के राष्ट्रपति का दौरा रद्द हो गया। विद्रोह क्यों यह तय करना था। राष्ट्रपति के यहां होते हुए तख्तापलट करना मुश्किल है। अब आखिर में तय हुआ कि बात बहुत आगे बढ़ चुकी है।

अब श्रीलंका के जो ग्रुप हमने यहां बुलाए थे। वह 200 लोग भी यहां पर आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि अब चाहे जो हो जाए आज ही विद्रोह करना है, और तख्तापलट करना है।  3 नवंबर को ही जिन राष्ट्रपति को दिल्ली आना था। उसी दिन उनके इस दौरे के कैंसिल होने के बावजूद मालदीव में बगावत शुरू हो जाती है।

मालदीव की राजधानी में बगावत की शुरुआत-

मालदीव की राजधानी Malé में अचानक यह विद्रोही धीरे-धीरे कर वहां की जो वहां की सारी चीजें थी। सरकारी बिल्डिंग इसके अलावा टेलीफोन एक्सचेंज, बैंक इन सब पर कब्जा करना शुरू कर देते हैं। उनके साथ लड़ना शुरू कर देते हैं। काफी गोलीबारी शुरू हो जाती है और यह सब कुछ चल ही रहा था। तभी वहां के राष्ट्रपति Abdul Gayoom को पता चल गया। कि यहां पर तख्तापलट की साजिश हो रही है। वह परेशान हुए। उन्होंने फौरन US, Britain, Pakistan, Srilanka हर एक से मदद मांगी। कहा कि यहां पर हालत खराब हो गए हैं। आप हमारी मदद कीजिए।

राजीव गांधी से मदद की अपील-

उन्होंने राजीव गांधी से भी बात की और कहा यहां पर हालत खराब है। आप अपनी सेना भेजकर मालदीप को बचा लीजिए। उस वक्त जो वहां पर हमारे राजदूत थे वह दिल्ली आए हुए थे। क्योंकि प्रेसिडेंट को दिल्ली आना था। आमतौर पर जब किसी देश का राष्ट्रीय अध्यक्ष आता है। उस देश से वापस आ जाते हैं। इसी वजह से वहां के राजदूत भी दिल्ली वापस आ गए।

वह राजदूत अपने घर दिल्ली में सो रहे थे। सुबह-सुबह उनके पास मालदीप जो एंबेसी थी। उनके पास फोन आता है। वह बताते हैं कि यहां पर गोली चलने की आवाज आ रही है। विद्रोहियों ने तख्ता पलटने की कोशिश शुरु की है। सड़कों पर घूम रहे है। वह Abdul Gayoom को ढूंढ रहे हैं और विद्रोही उनको कब्जे में लेना चाहते हैं। ज्यादातर सरकारी बिल्डिंग में यहां तक के एयरपोर्ट पर कब्जा करते जा रहे हैं तो हमारे जो वहां पर राजदूत थे वह फौरन इसकी जानकारी हमारे विदेश मंत्रालय में देते हैं । विदेश मंत्रालय के Trough  यह खबर पी एम ओ में जाती है फिर इस वक्त तक राजीव गांधी दिल्ली से बाहर थे लेकिन यह खबर मिलने के बाद वह दिल्ली वापस आते हैं। इसके बाद एक मीटिंग होती है और यह तय होता है कि क्या किया जाए क्योंकि राष्ट्रपति ने इनसे मदद मांगी थी।

तो राजीव गांधी ने कहा हमें उनकी मदद करनी पड़ेगी और अब्दुल कयूम राष्ट्रपति को बचाना पड़ेगा क्योंकि उनका गहरा तंग होता जा रहा है क्योंकि जो विद्रोही थे और जो विद्रोह को लीड कर रहे थे उनका मकसद यह था कि Abdul Gayoom एक बार हाथ आ जाए उसके बाद तो सौदेबाजी चलती ही रहेगी तो इसलिए जरूरी था कि जो भी किया जाए जल्द से जल्द किया जाए। आनन-फानन में मीटिंग बुलाई गई और वहां  का जायजा लिया गया तो पता चला तो जो वहां की राजधानी का एयरपोर्ट है वह भी विद्रोही के कब्जे में चला गया है और अब यहां पर यह चीजें थी कि कहां जाए और उनकी कैसे मदद पहुंचाई जाए।

आर्मी चीफ को बुलाया गया और इनके साथ बातचीत हुई।  उनसे बात हुई कि क्या किया जाए कई लोगों को तो यह भी नहीं पता था कि मालदीव का नक्शा कैसा है और वहां का माहौल कैसा है अब यह प्लानिंग की गई कि वहां के किस एयरपोर्ट पर हमें अपने फोर्स कोआना है। यह भी पता करना था कि कौन सा एयरपोर्ट अभी तक विद्रोहियों के कब्जे में नहीं है उस वक्त राजीव गांधी ने अपने सेक्रेटरी से कहा था कि वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट से कांटेक्ट करें कि जो अक्सर मालदीव के ऊपर उड़ते हैं उनके जरिए आनन-फानन में जानकारी ली गई इसके बाद मालदीव और इसके आसपास के इलाके की जानकारी के लिए जो पर्यटन विभाग है उनसे मदद ली गई कि वहां किस शहर में कैसे पहुंचा जा सकता है। इसके बाद जब वहां के सभी एयरपोर्ट के बारे में जानकारी ली गई तो यह हुआ कि जो नक्शे में गए और उन सबको देखा गया और आखिर में यह तय हुआ कि हमारी फौज वहां पर जाएगी और वहां जाने के बाद वह ऑपरेशन को अंजाम देगी क्योंकि Malé Airport विद्रोहियों के कब्जे में था तो वहां पर सिर्फ एक ही एयरपोर्ट बचा था जिसका नाम hul-hule airport है।

उस एयरपोर्ट की खबर यह थी कि कि उसे एयरपोर्ट पर कब्जा नहीं है। पूरे तरीके से मगर यह पता नहीं था कि उस पर पूरे तरीके से कब्जा है या नहीं अब तरीका यह था कि वहां जाए और देखा जाए कि कब्जा है या नहीं और देखा जाए और फिर कुछ किया जाए अब hul-hule airport के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं कि वहां का Runway  कितना लंबा है तो उन सारी जानकारी को इकठ्ठा किया गया। अब हमारी सेना ने यह तय किया कि वहां पर हमारी embassy में जो राजदूत हैं कि अगर वह हमारे साथ चलें जो मिस्टर बनर्जी थे। जब उनसे कहा गया कि आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा तो उन्होंने उस वक्त 2 शर्ते रखी

  1. आप विदेश मंत्रालय से परमिशन लीजिए क्योंकि मैं विदेश मंत्रालय को रिपोर्ट करता हूं।
  2. दूसरा मैंने जिंदगी में कभी सुबह जो बिना सेव किए कोई काम नहीं करता तो आप मेरे लिए एक रेजर का इंतेजाम कीजिए

उनको विदेश मंत्रालय से फौरन इजाजत मिल गई क्योंकि इसमें खुद राजीव गांधी भी शामिल थे। उसके बाद जो आगरा में एयर फोर्स का अपना बेस है वहां की कैंटीन को खुलवाया गया। उसी रात को और फिर उनके लिए वहां से रेजर टूथपेस्ट चीजों का इंतजाम किया गया और वह इसके बाद तैयार हो गए।

आगरा से उड़ान भरी जाती है और इसके बाद जो इस पूरे ऑपरेशन को लीड कर रहे थे उनका नाम बुलसारा था। वह अपने पैरा कमांडो के साथ यहां से निकलते हैं। Maldives की तरफ बढ़ते हैं यह बिना रुके maldives की तरह बढ़ते हैं यह जिस वक्त maldives में लैंड करते हैं। उस वक्त वहां पर रात थी और काफी अंधेरा था। करीब 150 कमांडो एक वक्त में वहां पर उतरते हैं और नसीब अच्छा यह था कि Hul-Hule Airport पर विद्रोही का कब्जा नहीं हुआ था और उन्होंने यह भी सोचा भी नहीं था कि यहां से हम पर अटैक हो सकता है।

एयर फोर्स का Hul-Hule Airport पर लैंड कर जाता है और कमांडो नीचे उतर जाते हैं और वहीं पर एटीसी के द्वारा क्योंकि तमाम टेलीफोन और रेडियो एक्सचेंज विद्रोही के कब्जे में थी। इस बीच में वहां पर एक चीज और होती है वहां पर डिफेंस मिनिस्ट्री के जो ऑफिसर थे वह दिल्ली में बात कर रहे थे और उन्होंने फोन किया और उन्होंने कहा कि मैं यहां देख रहा हूं कि सभी सरकारी बिल्डिंग पर विद्रोहियों का कब्जा है और गोलियां चल रही है और टेलीफोन एक्सचेंज मेरे घर के सामने हैं और उस पर भी कब्जा हो चुका है और दिल्ली से उनको कहा गया कि ठीक है पर आप यह फोन मत काटना क्योंकि अगर आपने फोन कट कर दिया तो वहां के एक्सचेंज में पता चल जाएगा कि आप कहां पर बात कर रहे थे और किस बारे में बात कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने अपना फोन काटा नहीं और अपना रिसीवर ऐसे ही नीचे रख दिया। 18 घंटे तक यह फोन ऐसे ही रखा रहा था।  जब तक कि यह ऑपरेशन खत्म नहीं हो गया था यह एक बीच की बात थी फिलहाल Hul-Hule Airport पर पहुंचने के बाद एटीसी के द्वारा Abdul Gayoom वहां के जो राष्ट्रपति थे उनसे संपर्क किया जाता है और उन्हें बताया जाता है कि भारतीय सेना वहां पर आ गई है और आप बता दीजिए कि आप कहां पर हैं वह वहां से एक सेफ जगह पर चले गए थे क्योंकि उनको अपने घर पर खतरा था।

उन्होंने बताया उनके साथ कुछ गार्ड थे और उनसे कहा गया कि हमारे कुछ लोग वहां पर आ रहे हैं और आप अपने गार्ड से बता दीजिए कि आप उनको ना रोके इसके बाद वहीं से भारतीय सेना उस हाउस के लिए रवाना होती है। लेकिन वहां पहुंचने के बाद उन वार्ड तक यह मैसेज नहीं पहुंचा था कि भारतीय सेना को आने दिया जाए। वह गार्ड और कुछ समझते हैं और भारतीय सेना को रोकने लगते हैं। स्थिति यहां तक आ गई थी कि भारतीय सेना को उन पर गोली चलानी पड़ी मगर इत्तेफाक से उसी बीच में कहीं से यह मैसेज आ जाता है और वह गार्ड भारतीय सेना को अंदर जाने की इजाजत दे देते हैं उसके बाद वे राष्ट्रपति Abdul Gayoom उनको वहां से लेकर निकल जाते हैं। उस वक्त सुबह के 2:10 मिनट हुए थे जब भारतीय सेना Abdul Gayoom उनके पास उस हाउस में पहुंची थी।

बात यह थी कि Abdul Gayoom को वहां से निकालकर भारत ले जाए क्योंकि वहां के हालात सही नहीं थे लेकिन Abdul Gayoom इस बात से इनकार कर देते हैं और उन्होंने कहा कि आप मुझे यही के नेशनल सिक्योरिटी का जो Headquarter है वहां पर ले चलो और वहां पर हमारे अभी भी काफी गार्ड हैं। हमारे सेना 3:15 पर वहां से निकलती है और भारत के एंबेसी में पहुंचते हैं और देखते हैं कि ऑफिस के चारों तरफ विद्रोही के लाशें से हैं। कुछ गार्ड की भी लाशें थी और दीवारों पर अनगिनत गोलियों के निशान थी। मतलब यह कि वहां पर काफी तबाही मची थी विद्रोही के कब्जे को लेकर मगर यह सब देखकर प्रेसिडेंट Abdul Gayoom अपने आप को काबू में किए हुए थे। वहां पहुंचने के बाद आखिर में वह महफूज थे क्योंकि भारतीय सेना भी थी और उनके अपने गार्ड भी वहां मौजूद थे तो वह पहली बार यह सोच रहे थे कि अब मैं महफूज हूं यानी वह अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहे थे। उन्होंने ब्रिगेडियर बुलसारा से कहा कि वह प्रधानमंत्री राजीव गांधी से बात करना चाहते हैं सुबह ठीक 4:00 बजे सेटेलाइट फोन के जरिए क्योंकि सभी फोन पर विद्रोह में कब्जा कर रखा था तो सेटेलाइट फोन के जरिए राजीव गांधी को फोन किया गया उस वक्त राजीव गांधी जाग रहे थे। उन्होंने राजीव गांधी से शुक्रिया कहा इसके बाद जो हमारी सेना थी क्योंकि पहला काम राष्ट्रपति को सुरक्षित करना था और उन्होंने उसको सुरक्षित कर लिया था।

अब विद्रोहियों को खदेड़ना बाकी था अब भारतीय सेना के सभी जहाज और कमांडो वहां पर पहुंच चुके थे। उन सब को भी खबर मिल गई कि यह लोग यहां पर पहुंच चुके हैं और अब यहां जमना मुश्किल है। यह वहां से भागने लगे जो श्रीलंका से वहां पर आए थे वह अपनी Speed Boat से श्रीलंका भागने लगे उस वक्त भारतीय जल सेना भी एक्टिव हो चुकी थी और जो विद्रोही Boat के जरिए श्रीलंका जा रहे थे उनके साथ काफी मुठभेड़ हुई। 19 आतंकी इस मुठभेड़ में मारे गए। इधर maldives की सेना और नेशनल सिक्योरिटी की Guard थे उन्होंने इनको भगाना शुरू किया तो 48 घंटे के अंदर-अंदर maldives पूरे तरीके से शांत हो गया। वापस प्रेसिडेंट Abdul Gayoom के हाथ में कंट्रोल आ गया। जिन्होंने विद्रोह किया था उन सब को गिरफ्तार कर लिया गया । जो श्रीलंका से आए थे वह भाग गए और उनमें से कुछ मारे गए।

फिर पूरी दुनिया में इस ऑपरेशन के बारे में पता चला यहां तक कि अमेरिका से लेकर ब्रिटेन तक और काफी देशों ने भारतीय सेना और सरकार की काफी तारीफ की किस तरीके से  वक्त पर जाकर एक देश को तख्ता पलटने से और उसके राष्ट्रपति को अगवा होने से बचाया। एक-दो देश ऐसे भी थे जो इस ऑपरेशन को लेकर नाराज हुए जिनमें से एक श्रीलंका भी था श्रीलंका का यह कहना था किसी एक इलाके में भारतीय सेना का ऑपरेशन करना गलत है तो इस ऑपरेशन के जरिए भारतीय सेना ने दिखाया था कि हम सिर्फ अपने ही देश में नहीं बल्कि दूसरे देश में जाकर भी दूसरों की मदद कर सकते हैं और कामयाबी से कर सकते हैं इसीलिए जब भी Operation Cactus की बात आती है तो यह भारतीय सेना और भारत के लिए एक गौरव वाली चीज है। किस तरीके से इस ऑपरेशन को अंजाम देते हैं और पूरे सही तरीके से अंजाम देते हैं उसके बाद 2008 तक राष्ट्रपति Abdul Gayoom सत्ता में रहे।

D.B Cooper जिसने Plane Hijack किया। एक शख्स जो प्लेन को हाईजैक करता है,और प्लेन के बदले मे फिर वो पैसे वसूलता है। फिर वो पैसे लेकर गायब हो जाता है, और किसी के हाथ नहीं आता। अब उसे ज़मीन निगल गयी या आसमान खा गया ये ऐसी ही कहानी है।

25 नवंम्बर को अमेरिका में थैंक्सगिविंग डे मनाया जाता है, और ये कहानी 24 नवम्बर की है। अमेरिका में एक Oregon State है। Oregon में एक शहर है जिसका नाम Portland है। ये कहानी Portland से ही शुरू होती है। Portland International Airport पर एक शख्स पहुँचता है। दोपहर का वक्त था क्योंकि अगले दिन थैंक्सगिविंग डे था तो तो ज्यादातर लोग पहले ही घर पर आ चुके थे। इस लिए यह एयरपोर्ट भी खाली था। जिस तरह से सभी एयरपोर्ट पर अलग-अलग Airline होती है। उसी तरह वहाँ पर भी नार्थ वेस्ट एयरलाइन का काउंटर था।

वो नार्थ वेस्ट एयरलाइन के काउंटर पर जाता है। और एक टिकट किसी दूसरे शहर की बुक करा लेता है। इस शख्स की उम्र करीब 40-45 साल थी। टिकट लेने के बाद ये प्लेन में सवार हो जाता है। इत्तेफाक से इसकी सीट प्लेन में सबसे सबसे पीछे की तरफ थी। पिछले दरवाजा वही पर था। शायद उसे ऐसी ही सीट की तलाश थी।

वह एक attendant को अपनी तरफ इशारा करके बुलाता है और उस Attendant का नाम फ्लोरेंस था । उसको बुला कर वह उसे एक पर्ची देता है पर बोलता कुछ नहीं फ्लोरेंस को लगा कि शायद यह कोई आवारा है और अपना फोन नंबर दे रहा है और फ्लोरेंस ने कोई इंटरेस्ट नहीं लिया और उस पर्चे को अपने बैग में रख लिया । इसने देखा कि उस फ्लोरेंस ने उसे पढ़ा नहीं तो थोड़ी देर के बाद उसे फिर बुलाता है और फिर उससे कहता है अगर आपने वह पर्ची पढ़ ली तो ठीक नहीं तो मैं बता देता हूं कि मेरे पास एक बम है और मैं उसका इस्तेमाल कर सकता हूं अब जैसे ही यह बात सुनती है जाहिर सी बात है वह घबरा जाती है क्योंकि प्लेन काफी सीट खाली थी क्योंकि इसमें कुल 34 मुसाफिर थे ।
लगभग उसमें डेढ़ सौ पैसेंजर बैठ सकते थे जब वो घबरा जाती है ।

उसके बाद वह उसको बैठाता है और एक दूसरा खत निकालता है अब वह दूसरी पर्ची उसको देता है सभी कुछ कैपिटल लेटर में लिखा हुआ था यह टाइप किया हुआ था और उसमें से दो लाइन लिखी हुई थी कि मैं इसका इस्तेमाल कर सकता हूं अब जाहिर सी बात है फ्लोरेंस पढ़ने के बाद घबरा जाती है और पसीने पसीने हो जाती है और उससे कहता है कि तुमने यह लेटर पढ़ लिया है । अब तुम मेरे कब्जे में हो और यह प्लेन हाईजैक हो चुका है । इसके बाद यकीन दिलाने के लिए वह कहता है। बैठो मैं तुम्हें कुछ दिखाता हूं वह जो यह बड़ा बैग लेकर चढ़ा था जाहिर सी बात है ज्यादातर लोग बैग ऊपर पर रख देते हैं पर इसने बैग को ऊपर नहीं रखा था । अपने ही पास रखा था और बराबर की खाली सीट पर रख दिया था । वह  बैग उठाता है और उसे खोलकर फ्लोरेंस को दिखाता है । उसे देखकर फ्लोरेंस घबरा जाती है उसके अंदर काफी वायर और सिलेंडर टाइप का कुछ रखा हुआ था । वह बम जैसा ही दिख रहा था अब फ्लोरेंस को यकीन हो जाता है ।

अब उसके बाद वह फ्लोरेंस को एक और पर्ची देता है और कहता है कि अब तुम्हें मालूम हो गया है । अब तुम सब मेरे कब्जे में हो और प्लेन हाईजैक हो चुका है तो अपने पायलट को जाकर मेरा मैसेज दे दो कि मुझे क्या चाहिए । उसे वह उस पर्ची में लिख कर देता है जो उसकी डिमांड थी

  1. दो लाख अमेरिकी डॉलर।
  2. चार पैराशूट।
  3. और इस प्लेन में इंधन भरवाना।

अगर यह तीन मांगे मान ली गई तो ठीक है वरना वह उस प्लेन को उड़ा देगा । पर्ची लेकर फ्लोरेंस पायलट के पास जाती है । उस प्लेन के जो कैप्टन विलियम्स प्लेन के पायलट उसको को पढ़ते हैं तो घबरा जाते हैं । पूरी डिटेल मालूम करते हैं वह बताती है। वह कोई रिस्क नहीं लेना चाह रहे थे । उसके बाद कैप्टन विलियम्स जहां पर इस प्लेन को जाना था । उसके एयर ट्रेफिक कंट्रोल को संपर्क करते हैं और बताते हैं कि ऐसा ऐसा हो गया है । एक पैसेंजर है उसका नाम D.B Cooper है। इसके पास एक बैग है और बैग में बम है । उसकी डिमांड दो लाख अमेरिकी डॉलर चार पैराशूट और जहाज में ईंधन भरवाने की है। वरना पैसेंजर समेत पूरे प्लेन को उड़ा देगा।

एटीसी में जैसे ही यह खबर पहुंचती है पूरे एयरपोर्ट में हड़कंप मच जाता है। उसके बाद एफबीआई और बाकी तमाम एजेंसियां पुलिस और एयरपोर्ट सिक्योरिटी को अलर्ट पर रखा जाता है। बाकी एजेंसी पोर्टलैंड एयरपोर्ट से पैसेंजर की जानकारी निकालते हैं । सब कुछ होता रहा और सोचा कि अब क्या किया जाए जब तक D.B Cooper कहता है कि जब तक उसकी मांग पूरी नहीं की जाएगी तो यह हवाई जहाज एयरपोर्ट में लैंडिंग नहीं करेगा क्योंकि उसे पता था कि अगर प्लेन वहां पर लैंड कर गया तो वह पकड़ा जाएगा।  वह डायरेक्ट पायलट से कहता है कि अगर तुमने प्लेन को लैंड कराने की कोशिश की तो वह प्लेन को उड़ा देगा अब नीचे बातचीत हो रही है।   उसकी एक डिमांड और थी कि वे दो लाख  डॉलर उसको 20-20 के नोट में चाहिए।

20 से बड़ा कोई भी नोट ना हो अब यह सारी डिमांड वहां पहुंची और अफरातफरी में यहां पर डिसाइड यह किया गया कि एक बार वह नीचे आ जाए और उसको पैसे दे दिया जाए । वह जहां कहीं भी लैंड करेगा उसको वहां पर पकड़ लेंगे । उसकी मांग पूरी कर दी जाए और उसके बाद शहर के अलग-अलग बैंकों से 20-20 के नोटों को इकट्ठा किया गया। इसके अलावा चार पैराशूट को का इंतजाम करने को कहा गया।एटीसी के जरिए से मैसेज पायलट तक भेज दिया गया  कि उसकी सभी मांग मान ली गई है।

करीब 5:25 पर यह खबर पायलट को दी जाती है कि उसकी बात मान ली गई है। पायलट D. B. Cooper  को बताता है। D. B. Cooper इसके बाद तैयार हो जाता है। D. B. Cooper कहता है कि अब Seattle Airport में प्लेन को लैंड किया जाए।  शाम के 5:39 पर यह हवाई जहाज Seattle Airport पर लैंड कर जाता है । लेकिन इसकी डिमांड यह भी थी कि इस हवाई जहाज को एक अलग रनवे पर खड़ा किया जाए। साथ में प्लेन की जितनी भी खिड़किया थी उन सब पर इसने कवर चढ़ा दिया ताकि कोई बाहर से ना देख सके। यह सारी चीजें हो गई इसके बाद पहली चीज यह होती है कि उसने जो चार पैराशूट मंगाए थे कि वह आर्मी एयरफोर्स के नहीं होने चाहिए बल्कि जो पब्लिक Use करती है। वह पैराशूट होने चाहिए तो फिर उन पैराशूट का भी इंतजाम किया जाता है। 20-20 के डॉलर की शक्ल में दो लाख अमेरिकी डॉलर को लेकर इसी एयरलाइंस का जो Seattle Airport पर जो मैनेजर था क्योंकि इसके शर्त थी कोई कोई पुलिस या आर्मी वाला कोई भी पैसा लेकर ना आए नहीं तो वह हवाई जहाज को उड़ा देगा।

रिस्क लेना भी मुनासिब नहीं समझा गया और मैनेजर को दो लाख डॉलर और पैराशूट लेकर हवाई जहाज के अंदर भेजा गया। वह आता है D. B. Cooper के हवाले करता है उसके बाद उससे बातचीत करने के लिए भी प्रार्थना की जाती है कि नीचे ग्राउंड पर बात करें मगर वह मना कर देता है। उसे वापस भेज देता है। अब बात इंधन की थी और इंधन भरना शुरू हो जाता है तब तक सारे मुसाफिर उसके अंदर बैठे रहते हैं इसके बाद जब इंधन भर जाता है तो बदले में जो 35 मुसाफिर सबको यह Seattle Airport पर उतरने की इजाजत दे देता है। प्लेन से एक-एक कर सभी मुसाफिर नीचे उतर जाते हैं।  साथ में 2 क्रू member को भी यह नीचे जाने की इजाजत दे देता है।  जिसमें से 1 फ्लोरेंस थी जिसे पहले इसने पर्ची दी थी। अब प्लेन में सिर्फ 5 क्रू member बचते हैं Pilot और Co-Pilot समेत और यह खुद था।

सभी को नीचे उतारने के बाद क्योंकि इंधन भर चुका था और यह पायलट से कहता है कि हवाई जहाज को उड़ाया जाए पायलट के पास कोई चारा था नहीं उसके बाद Plane एयरपोर्ट के रनवे से उड़ता है। इसके बाद FBI और बाकी एजेंसी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। क्योंकि D.B Cooper अंदर ही था वह प्लेन को उड़ा सकता था। प्लेन में मुसाफिर के अलावा भी 5 लोग मौजूद थे। इसीलिए उन्होंने रिस्क नहीं लिया और सोचा कि कहीं पर तो यह जाकर उतरेगा तब हम इसे पकड़ लेंगे एफबीआई ने जितने भी डॉलर दिए थे उन सब के नंबर अपने पास लिख लिए थे । स्पेशल तौर पर उन्होंने जितने भी नोट दिए थे वह सब L-Series के दिए थे ताकि अगर कोई भी इन नोट को खर्च करेगा तो उनका पता चल जाएगा । 7:40 पर अब प्लेन एयरपोर्ट से टेक ओवर कर जाता है।

जैसे ही यह टेकओवर करता है, D.B Cooper पायलट से कहता है उसकी पहली बात तो यह कि जब भी हवाई जहाज उड़ेगा तो 10000 किलोमीटर की ऊंचाई से ऊपर नहीं जाएगा दूसरी यह कि इसकी स्पीड Minimum होगी यानी कम से कम होगी। तीसरी यह के हवाई जहाज के पीछे के दरवाजा खोल दो इसके बाद यह पायलट से कहता है कि आप प्लेन को मेक्सिको की तरफ लेकर चलो तो पायलट प्लेन को मेक्सिको के रुट पर लेकर चलता है।

जिस स्पीड और ऊंचाई पर को पढ़ने प्लेन को उड़ाने के लिए कहा था उसमें ईंधन का खर्च ज्यादा था तो पायलट D.B Cooper को बताता है कि अगर इस तरीके से हम जाएंगे तो मैक्सिको पहुंचने से पहले हमें प्लेन के अंदर दोबारा ईंधन भरवाना पड़ेगा। इसने पायलट से कहा कि कोई दूसरा ऑप्शन बताओ तब वह बताता है कि मेक्सिको से पहले एक रेनू जाना है यह नवादा में है। वहां पर हम लैंड कर सकते हैं। Cooper थोड़ी देर सोचता है और फिर कहता है कि ठीक है आप इसको रेनू के रुट पर ही ले लो तो यह रेनू के रूट पर जाते हैं। जब रोड पर प्लेन डाइवर्ट हो गया थोड़ी देर के बाद थोड़ी अचानक D.B Cooper हुकुम देता है कि जितने क्रू मेंबर बचे हैं जिनमें से एक इंजीनियर भी था उन सब से कहता है कि आप कॉन्पैक्ट में चले जाएं तो Pilot और Co-Pilot already कॉन्पैक्ट में था जो तीन बाहर बजे थे उन तीनों को भी को D.B Cooper ने कॉन्पैक्ट में भेज दिया । अब पूरे प्लेन में पीछे सिर्फ अकेला D.B Cooper ही बचा था।

उसने कहा कि आप कि आप इसे अंदर से बंद कर लो और कोई भी बाहर नहीं आएगा। अगर कोई बाहर आया तो बहुत बुरा होगा। सब कॉन्पैक्ट के अंदर चले गए अब प्लेन के पीछे सिर्फ D.B Cooper हैं, प्लेन उड़ रहा था। करीब 8:10 पर पायलट को लगता है कि प्लेन में पीछे से एयर प्रेशर बढ़ रहा है और प्लेन का बैलेंस बिगड़ रहा है । यह जब मुमकिन है जब प्लेन के अंदर बाहर से हवा आ रही हो और यह नामुमकिन है फिर भी पायलट सब कुछ चेक करता है उसके बाद जब उसे लगता है कि शायद कुछ गड़बड़ है और को पायलट डरते डरते कॉन्पैक्ट का दरवाजा खोलता है। तो देख कर चौक जाता है। देखता कि प्लेन के अंदर बहुत तेज हवा आ रही है। पीछे का दरवाजा खुला हुआ है। वह भागता है। किसी तरीके से उस दरवाजे को बंद करता है।

बंद करने के बाद चारों तरफ देखता है और वापस कॉन्पैक्ट में आता है। पीछे का दरवाजा बंद करने के बाद प्लेन का बैलेंस फिर से बन चुका था। इसके बाद प्लेन अपनी Normal स्पीड में चलने लगा। प्लेन के अंदर जब तक उसे D.B.Cooper नहीं दिखाई दिया।  उसे लगा कि शायद वह किसी सीट के नीचे छुपा हुआ होगा क्योंकि D.B Cooper ने Co-Pilot पायलट से कहा गया था कि कोई भी कंपैक्ट से बाहर नहीं निकलेगा। इस वजह से पायलट ने उसे देखने की ज्यादा कोशिश भी नहीं की और अब प्लेन रेनू के लिए उड़ान भरने लगता है। उसे वहां पर इंधन भरवाना था। इसके बाद रात 10:15 पर यह प्लेन रेनू एयरपोर्ट पर लैंड करता।

इस दौरान में जब यह प्लेन Seattle Airport से उड़ा  तब एयर फोर्स के जो फाइटर थे। इस प्लेन के ऊपर एक इस के नीचे जेट फाइटर प्लेन को इस तरीके से उड़ा रहे थे। किसी को यह पता ना चले अगर वह देखे भी कि हम उनका पीछा कर रहे हैं ताकि जहां पर भी यह लैंड करें हम उसको वहां पर दबोच लेंगे। एयरफोर्स के यह दो प्लेन भी उसके साथ साथ चल रहे थे क्योंकि रेनू एयरपोर्ट पर पहले ही खबर दी जा चुकी थी कि एक प्लेन हाईजैक हो चुका है। इसलिए वहां पर भी सब चौकस थे। जब वह वहां पर उतरता है तो उसको अचानक चारों तरफ से घेर लिया जाता है कमांडोज और सभी दस्ते वहां पर पहुंच जाते हैं एफबीआई की टीम भी वहां पहुंच जाती है। एयरफोर्स की सिक्योरिटी भी वहां पहुंच जाती है और पैरा मिलिट्री गॉड भी। इसके बाद प्लेन का दरवाजा खुलता है और Pilot और Co-Pilot पायलट और क्रू मेंबर भी एक-एक करके नीचे उतरते हैं अब सिर्फ अब प्लेन के अंदर सिर्फ D.B Cooper ही था।

कमांडो उसे पकड़ने के लिए एहतियात के साथ प्लेन के अंदर घुसते हैं और पूरा प्लेन छान मारते हैं मगर D.B Cooper का कुछ पता नहीं चलता।  प्लेन के अंदर पिछली सीट के पास सिर्फ दो पैराशूट मिले D.B Cooper ने चार मांगे थे। जिनमें से दो वहां पड़े थे और दो गायब थे ।उसके बाद एयर फोर्स के जो फाइटर प्लेन उनके पीछे थे उनसे पता किया गया तो उन पायलट ने बताया कि हमें पूरे रास्ते में कोई भी इस हवाई जहाज से कूदता हुआ नहीं दिखा।  हालांकि उसमें यह भी था कि कई जगह पर बादल और रात का अंधेरा भी था। अब सभी हैरान थे कि प्लेन के अंदर सब कुछ है मगर वह जिसने प्लेन को हाइजैक किया था और जो पैसे उसने लिए थे वह गायब हैं। इसके बाद फिर ढूंढना शुरू किया गया कि यह कहां जा सकता है इसके बाद दोनों एयरपोर्ट के बीच इतने अभी ग्राउंड का इलाका था। वहां जाकर उसको देखा गया वहां पर जो नदिया थी नदिया को सर्च किया गया लंबी तलाशी ली गई इस तलाशी के दौरान दो इंसानों के कंकाल मिले जिससे एक केस और खुलकर सामने आ गया उनमें से एक कंकाल किसी औरत का था जिसकी मौत काफी पहले हो चुकी थी। उसके डीएनए से उसका पता किया गया । इस को मारकर इस नदी में फेंक दिया गया था तो यह सारी कोशिश जारी रही लेकिन ना तो D.B Cooper पर का कोई पता था और ना ही D.B Cooper लाश मिली।

FBI ने माना कि जिस तरीके से वह हवाई जहाज से बाहर की तरफ कूदा था।  रात का अंधेरा था तो उसके बचने की कोई चांसेस नहीं लेकिन सबूत के तौर पर उसकी लाश और वह पैसे नहीं मिले लंबी छानबीन चलती रही कई कई सौ लोगों ने कई कई किलोमीटर तक के जंगल छान मारे यहां तक की नदियां भी छान मारी लेकिन वह शख्स नहीं मिला।

अब इसकी तफ्तीश की गई कि उसने भी D.B Cooper के नाम से जो टिकट लिए थे। उसका  नाम असली था या नकली था। जो प्लेन का स्टाफ था उनसे पूछ कर उसका Scatch बनाया गया । इसमें 800 से करीब लोगों को गिरफ्तार किया गया । पूछताछ की गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ तो इस तरीके से लगातार इन्वेस्टिगेशन जारी रही लेकिन इसका कोई पता नहीं चला।

इस दौरान में करीब बहुत सालों के बाद एक जगह से एक लड़के को दो पैकेट मिलते हैं। जिस पैकेट में कुछ डॉलर थे और वह सारे 20-20 के डॉलर थे। जब एफबीआई तक यह बात पहुंची यह उसी रुट पर था जहां रेनू का एयरपोर्ट था। यह पता चला कि जो नोट उस लड़के को मिले हैं उसके सीरियल नंबर और जो नोट D.B Cooper को दिए गए थे दोनों आपस में मैच कर रहे थे। इसका मतलब यह था कि मैं पैकेट उसी के थे मगर बाकी के पैकेट नहीं मिले। उस पूरे इलाके को भी छान मारा गया और ढूंढने की कोशिश की गई लेकिन वह भी नहीं मिला और फिर इसके आगे क्या हुआ यह आज तक किसी को पता नहीं क्योंकि उस लड़के को पैसे मिलने के बाद उस लड़के का उनसे क्या लिंक था यह कोई जानकारी नहीं मिली।

करीब 46 साल के बाद 2016-17 FBI ने अपनी हार मान ली। उसने कहा कि हम इस Case को सॉल्व नहीं कर सकते। हमने हमने जितने भी जोर लगाने थे।  हमने सब कुछ कर लिया लेकिन हमें नहीं मालूम D.B Cooper  कौन है।  उसका असली नाम है कि नहीं कहां से आया है कहां गया।  इसके बारे में कोई जानकारी नहीं और वह पैसे कहां गए यह भी मालूम नहीं तो इस तरीके से यह अमेरिका के इतिहास में सबसे बड़ा हवाई रहस्य बना हुआ है। किसी Commercial Plane  हाईजैकिंग और फिरौती को लेकर यह इकलौता मामला है !

इस कहानी मुंबई के डॉन Manya Surve से जुडी है। पहली ये की मुंबई का नाम पहले बॉम्बे था। लोग कहते है कि बॉम्बे में पहले भी भी एनकाउंटर हुआ था मगर ऑफिसियल में ये पहला एनकाउंटर था। दूसरी ये कि ये कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड से भी जुड़ी हुई है। जब हम अंडरवर्ल्ड कि बात करते है तो आजकल लोग दाऊद इब्राहिम का ही नाम लेते है। लेकिन जब मुंबई में डॉन नाम चला था ये जब कि बात है। लोग कहते है कि Haji Mastan मुंबई का पहला डॉन है। बहुत से लोग Karim Lala, वरदा राजन का नाम लेते है। लेकिन हकीकत में अगर पुरे इतिहास को देखा जाये तो हिस्दुस्तान में डॉन शब्द जो शख्स लेकर आया वो Karim Lala था। करीम लाला को शेरखान के नाम से भी जाना जाता है। करीम लाला मुंबई का ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान का भी पहला डॉन था। जबकि करीम लाला का हिंदुस्तान से कोई लेना देना नहीं था वो तो अफगानिस्तान में पैदा हुआ था।

करीम लाला अफगानिस्तान में रईस घराने में पैदा हुआ था।लेकिन 1940 के आस पास पेशावर को होते हुए कारोबार करने के लिए मुंबई आ गया था। लेकिन वो कम वक्त में ज्यादा पैसे कमाना चाहता था। धीरे-धीरे उसमे मुंबई में अपना कारोबार शुरू कर दिया लेकिन कारोबार कि आड़ में उसने 2 नंबर का  धंदा भी शुरू कर दिया जिससे जी उसे ज्यादा आमदनी हो। जिसमे वो हीरे, सोने कि स्मगलिंग कर रहा था। इस धंदे स उसे काफी पैसा मिला इसलिए उसने शराब, जुआ वगैरह का धंदा भी शुरू कर दिया । उस का वो कारोबार भी चल पड़ा।

इस दौरान मुंबई में एक और शख्स था जिसका नाम हाजी मस्तान था। वो भी इस तसकरी के कारोबार में अपना हाथ आजमाना चाह रहा था। लेकिन हाजी मस्तान को पता था कि यहाँ करीम लाला का काफी दबदबा है। उस वक्त अंडरवर्ल्ड में खून खराबा कम हुआ करता था। इस लिए हाजी मस्तान ने सोचा क्यों न आपस में मिल कर काम किया जाये। इसके बाद उसने करीम लाला से दोस्ती कर ली और अपना अपना इलाका बाँट लिया।

इस बीच एक तीसरा नाम भी था वरदा राजन जो साउथ से मुंबई आया था। वो भी इस तरह के कारोबार में शामिल था। वरदा राजन को भी लगा कि वो इन सब से लड़ाई मोल लेकर कारोबार नहीं कर सकता । इसलिए उसने भी करीम लाला से हाथ मिलाया और अब ये सभी तीन इलाको में अपना अपना काम कर रहे थे।

लेकिन इन तीनो में करीम लाला सबसे ज्यादा दबदबा था। ये सब चलता रहा और करीम लाला ज्यादा ताकतवर होता चला गया। करीम लाला का बॉलीवुड में भी काफी दबदबा था। जंजीर फिल्म में प्राण ने शेरखान का जो रोल किया था वो किसी हद तक करीम लाला का ही रोल था। एक बार किसी ने हैलना के पैसे देने से मना कर दिया था, तब दिलीप कुमार ने एक खत करीम लाला को लिखा था जो हैलना लेकर गयी थी। उसके बाद करीम लाला के जरिये हैलना के पैसे वापस मिल गए।

एक बात ये भी है, कि Karim Lala ने किसी घर पर कब्ज़ा किया था जिसके बाद उसे अदालत से समन आ गए थे। इसके बाद जब करीम लाला को कोर्ट में पेश किया गया तो जब वो कोर्ट पहुंचा तो उस वक्त कोर्ट की जज एक महिला थी। उस वक्त जितने भी लोग अदालत में बैठे हुए थे यहाँ तक कि वकील भी करीम लाला को देखकर खड़े हो गए। उसके बाद जज ने करीम लाला को विटनेस बॉक्स में बुलाया। जज का पहला सवाल ये था कि आप कौन है। करीम लाला ने जज कि तरफ देखा और कहा ये काला कोर्ट पहने हुए ये महिला कौन  है जो उसे नहीं जानती। इस पर सभी लोग जो वहां मौजूद थे हंस पड़े।

लेकिन इन तीनो (करीम लाला, हाजी मस्तान,वरदा राजन ) के बाद 80 के दसक में एक शख्स की एंट्री होती है जो अंडरवर्ल्ड का डॉन बनने जा रहा था। जिसका नाम शाबिर कास्कर था। ये दाऊद इब्राहिम का बड़ा भाई था। लेकिन अब वक्त बदल चुका था। जैसे पहले सभी इलाको को बाँट कर काम किया करते थे। शाबिर कास्कर ऐसा नहीं था। वो ये मानता था की अगर हमें आगे निकलना निकलना है तो हमें इन सबसे लड़ कर निकलना होगा। हालाँकि हाजी मस्तान ने बीच में इनकी सुलह कराने की कोशिस की थी। लेकिन करीम लाला का जो गैंग था वो पठान गैंग के नाम से मशहूर था। मुंबई में एक तरह से पठान गैंग का ही राज था। लेकिन उस वक्त इतना खून ख़राबा नहीं था। मगर 80 के दशक में जब शाबिर कास्कर की एंट्री होती है, तो फिर गैंग वॉर शुरू हो जाती है। फिर वे एक दूसरे के लोगो को मारने लगते है। एक वक्त ऐसा आया करीम लाला को लगा की ये ऐसे नहीं मानेंगे । करीम लाला ने एक बार दाऊद इब्राहिम को अगवा कराकर बहुत मार दी थी।

उसके बाद इनकी दुश्मनी चलती रही। अब पठान गैंग और कास्कर Family में लड़ाई चलती रही। दाऊद उस वक्त पुरे मुंबई का डॉन बनना चाहता था। हाजी मस्तान ने एक बार इनकी आपस में सुलह भी करा दी थी। मगर पठान गैंग दाऊद बढ़ते दबदबे से खुश नहीं था और वो दाऊद को सबक सीखना चाहता था।

इसी दौरान एक चौथे चेहरे की एंट्री होती है। जिसका नाम मनोहर अर्जुन सुर्वे था जो महाराष्ट्र के रत्नागिरी में पैदा हुआ था। वो मुंबई में अपने ताऊ के पास रहता है। उसने B.A में एडमिशन लिया हुआ था। जो मुंबई के कॉलेज में पढ़ रहा था और उसने 75 % के साथ B.A पास किया था। लेकिन उसका एक सौतेला भाई जो क्राइम की दुनिया से ताल्लुक रखता था तो मनोहर अर्जुन सुर्वे भी धीरे-धीरे क्राइम के रास्ते पर चल पड़ा। इसी दौरान वो अपने सौतेले भाई के साथ मिल कर कही पर लड़ाई कर लेता है। जिससे वहाँ पर एक शख्स की मौत हो जाती है। उसके क़त्ल के जुर्म में पुलिस मनोहर और उसके भाई को गिरफ्तार कर लेती है। अदालत इस जुर्म में इनको उम्र कैद की सजा सुना देती है। उस वक्त उम्र कैद की सजा 14 साल की हुआ करती थी। इन लोगो को मुंबई की जेल में नहीं रखा जाता बल्कि  पुणे की ‘Yerawada Central Jail’ में रखा जाता है।

लेकिन उस जेल में और भी गैंग थी जिसकी वजह से से मनोहर की वहाँ पर मार पीट हो जाती है, और इनको वहाँ से निकाल कर रत्नागिरी जेल में भेज दिया जाता है। 9 साल जेल में बिताने के बाद एक बार मनोहर अर्जुन सुर्वे को वहाँ से भागने का मौका मिल जाता है, और वो वहाँ से भाग निकलता है। जेल से भागने के बाद वो सीधे मुंबई पहुँच जाता है । अब वो मुंबई में अपना गैंग बनाना चाहता है। वो दाऊद की गैंग में शामिल होना चाहता था मगर उसे शामिल नहीं किया गया। यही जवाब उसे पठान गैंग की तरफ से मिला। मगर ये छोटी-छोटी वारदात करता रहा और ये कुछ लोगो को मार भी देता है। बैंक में चोरी, यहाँ तक के सरकारी खजाने को भी नहीं छोड़ता। अब मनोहर सुर्वे का नाम होने लगा। अब उसके दोस्त उसे मानिया सुर्वे के नाम से बुलाने लगे और उसका नाम मानिया सुर्वे ही पड़ गया। Manya Surve के किस्से जब पठान गैंग तक पहुंचते है तो पठान गैंग उस वक्त दाऊद से समझौता तो कर चुकी थी। मगर वो दाऊद को सबक सिखाना चाहती थी। पठान गैंग सोचती है कि हाजी मस्तान से हमारा वादा हो चुका है तो क्यों न किसी नए बन्दे को काम शोम्पा जाये जो दाऊद के बड़े भाई शब्बीर कास्कर को ठिकाने लगा सके। इसके बाद मानिया सुर्वे को शब्बीर कास्कर को मारने की सुपारी दे दी गयी। Manya Surve अंडरवर्ल्ड में अपनी पहचान बनाने के लिए फौरन तैयार हो जाता है, और वो दाऊद के भाई की सुपारी ले लेता है।

शब्बीर कास्कर मुंबई में एक सिद्धि विनायक मंदिर के पास जाया करता था और वो कभी-कभी पास के ही पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरवाया करता था। इसी के बाद 12 फरवरी 1981 को मानिया सुर्वे अपने आदमी को लेकर उस पेट्रोल पंप पर चला जाता है, और वहाँ पर शब्बीर कास्कर का इंतजार करता है। कुछ देर बाद शब्बीर कास्कर वहाँ पर आ जाता है। तभी Manya Surve और उसके आदमी शब्बीर को घेर लेते है और उस पर अँधा धुंद फायरिंग शुरू कर देते है। शब्बीर कास्कर कि वही पर मौत हो जाती है। सुबह में ये खबर पुरे मुंबई में आग कि तरह फेल जाती है।

जाहिर सी बात है कि दाऊद का पहला शक पठान गैंग पर ही जाता है, इस पर पठान गैंग भी घबरा जाता है। मगर धीरे-धीरे पता चलता है कि ये काम मानिया सुर्वे नाम के किसी नए आदमी ने किया है। अब यहाँ से मानिया और दाऊद कि दुश्मनी शुरू हो जाती है। लेकिन मानिया इसके बाद काफी हावी हो चुका था और उसका कद बढ़ चुका था। अब उसने पुलिस वालो पर भी हमला करना शुरू कर दिया और उसने अपना अलग गैंग बना लिया। इस गैंग ने अब उन दोनों Gango को पीछे छोड़ना शुरू कर दिया। अब इन दोनों Gango को लगा कि अब उनकी जमीन कम होती जा रही है। मानिया ने ज्यादा ही खून ख़राब शुरू कर दिया था। जिस वजह से मुंबई पुलिस भी परेशान आ गयी थी।

इससे पहले पुलिस 80-81 दशक के बीच दाऊद और पठान गैंग के बीच होने वाले खून खराबे से भी परेशान थी। अब Manya Surve ने भी जगह ले ली थी। अब पुलिस तीन तरफ से घिर चुकी थी। इन सब से बचने के लिए पुलिस ने कड़े कदम उठाए और सभी गैंग के पास अपना सन्देश भेज दिया।

सबसे पहले Manya Surve को ठिकाने लगाने कि प्लानिंग बनाई गयी। इसके बाद एक स्पेशल टीम तैयार कि गयी। इस टीम को लीड करने वाल Isaque Bagwan थे। प्लानिंग ये थी कि मानिया का एनकाउंटर किया जाये। इसके बाद मानिया सुर्वे के लोगो को उठाना शुरू कर दिया गया और कुछ को मारा भी गया। लेकिन मानिया सुर्वे गायब हो गया और वो मुंबई छोड़ कर भाग गया। बाद में मानिया मुंबई में आया मगर अलग अलग जगह पर रहने लगा।

खतरनाक इतना था कि अगर उसको पता चल जाता था कि उस पर हमला होने वाला है तो वो पुलिस वालो पर भी हमला कर देता था। लेकिन दाऊद के भाई के क़त्ल को लगभग एक साल बीत चुका था। Manya Surve के काफी लोग पकडे गए। लेकिन मानिया का कोई सुराग नहीं मिल रहा था। दाऊद अपने भाई का बदला लेने के लिए बेताब था। उसे सबूत के साथ पता चल गया था कि उसके भाई को मारने वाला मानिया है और मरवाने वाला पठान गैंग है। इसी बीच दाऊद और पठान गैंग के बीच मुठभेड़ भी हुई  जिसमे दर्जनों लोग मारे गए। जिन लोगो पर भी दाऊद को शक था वो एक-एक  करके सब को मारता गया। लेकिन मानिया उसके हाथ नहीं लग रहा था। लोग ये भी कहते है कि उस वक्त दाऊद कि मुंबई पुलिस में काफी अच्छी जान पहचान थी। पठान गैंग का दबदबा बढ़ रहा था और पुलिस इस दबदबे को काम करना चाहती थी। यहाँ पर एक खेल शुरू होता है। मुंबई पुलिस दाऊद के जरिये पठान गैंग को ख़तम करना चाहती थी। इसी लिए पुलिस ने दाऊद कि गैंग को प्रमोट करना शुरू कर दिया। यही पर पुलिस ने गलती कि थी।पठान गैंग का तो धीरे-धीरे खात्मा हो गया मगर दाऊद अब पुलिस के लिए सर दर्द बन चुका था।

अब क्योंकि दाऊद कि मुंबई पुलिस में अच्छी पकड़ थी और दाऊद को किसी भी कीमत पर Manya Surve चाइये था। इसी बीच दाऊद के एक मुखबिर ने 11 जनवरी 1982 मुंबई पुलिस को एक खबर दी कि आज मानिया सुर्वे दोपहर 1:30 बजे वाडला एरिया में अम्बेडकर जक्सन के पास एक कार से आयगा और वो वह पर अपनी गर्ल फ्रेंड को लेने आ रहा है उसे लेकर वो चला जायगा। उसकी गर्ल फ्रेंड एक ब्यूटी पॉर्लर में काम करती है। पुलिस को मानिया कि गर्ल फ्रेंड का तो पता था मगर ये नहीं पता था कि वो कौन है।

Manya Surve की मौत-

खबर मिलते ही क्राइम ब्रांच की पुरी टीम तीन हिस्सों में वह पर फेल जाती है और वक्त का इंतजार करती है। करीब 1:30 बजे के करीब मानिया सुर्वे वहाँ पर आता है। चूँकि पुलिस के पास उसकी तस्वीर मौजूद थी तो पुलिस उसे देखते ही पहचान लेती है। मगर Manya Surve पुलिस वालो को सादी वर्दी में देखकर फौरन पहचान लेता है कि ये उसी के लिए आई है। इससे पहले कि वो अपना रिवाल्वर निकलता Isaque Bagwan और उसके आदमी उस पर गोली चला देते है।  उसके सीने पर 5 गोली लगती है और एक गले पर लगती है। मानिया वही पर ढेर हो जाता है। पुलिस उसको उठाकर वैन में डाल लेती है।

वही पर 12 मिनट कि दूरी पर एक हॉस्पिटल था।मगर पुलिस वह तक पहुंचने में 30 मिनट लगा देती है। शायद पुलिस भी नहीं चाहती थी कि मानिया कि हॉस्पिटल में जाकर जान बच जाये । मानिया कि हॉस्पिटल पहुंचने से पहले मौत हो जाती है। मानिया सुर्वे कि मौत से सबसे ज्यादा फायदा दाऊद को हुआ । क्योंकि दाऊद को लग रहा थी कि कही मानिया आगे चल कर उसके लिए कोई मुशीबत न बन जाये।

अब मानिया कि मौत के बाद पठान गैंग और दाऊद कि गैंग में खून ख़राब बढ़ चुका था और यही से दाऊद का कद बढ़ने लगा क्योंकि दाऊद एक-एक करके पठान गैंग के आदमी को मरने लगा। हाजी मस्तान बीच में आया मगर दाऊद ने उसकी भी न सुनी अब हाजी मस्तान भी इससे दूर हो गया। करीम लाला कि उम्र करीब 70 साल कि हो गयी थी। अब करीम के भाई ही सब सम्भाल रहे थे। दाऊद ने अपने भाई का बदला लेने के लिए करीम लाला के छोटे भाई को भी मार दिया। अब इनमे दुश्मनी तेज़ हो गयी थी और खून ख़राबा बढ़ चुका था। करीब 90 साल कि उम्र में सन 2002 में करीम लाला कि मौत हो गयी। दाऊद इब्राहिम 1993 में इंडिया को छोड़  कर भाग गया था अब उसका सही से कुछ पता नहीं है।

ये कहानी एक अजीब कहानी है। क्योंकि ये कहानी इंग्लैंड शहर की है। वहाँ जो केस हुआ वो एक अजीब हादसा था। क्योंकि इंग्लैंड की सड़को पर एक कंटेनर दौड़ रहा हो और कई शहर पार कर चुका हो।  ये कहानी कुछ ऐसी ही कहानी है। ये कोई पुरानी नहीं बल्कि हाल ही की कहानी है। जो कंटेनर इंग्लैंड की सड़क पर दौड़ रहा था जब उसकी तलाशी ली गयी तो उसमे एक नहीं दो नहीं बल्कि 39 लाशें मिली। ये एक अजीब दाश्तान थी। बल्कि इस कंटेनर को चलता फिरता कब्रिश्तान कह सकते है। ब्रिटैन पुलिस की हालिया में हुए केस की सबसे बड़ी तफ्शीस है। लेकिन एक साथ 39 क़त्ल की तफ्शीस करना जब मुश्किल है जब आपको उन लाशो ने नाम का भी न पता हो।

लेकिन पूरी कहानी कुछ यूँ है, लंदन से करीब 32 किमी दूर एक इलाका है जिसे ग्रेस कहते है। ये इंडस्ट्रीज इलाका है। 23 अक्टूबर 2019 की दोपहर लगभग एक बजे एक लाल रंग का ट्रक जिससे एक सफ़ेद रंग का कंटेनर भी जुड़ा था। ये इस इंडस्ट्रीज एरिया में आकर खड़ा होता है। पुलिस को ये अजीब लगता है तो पुलिस ड्राइवर के पास जाती है और पूछ ताछ करती है। फिर जैसे ही कंटेनर को पीछे से खोलती है तो चौंक जाती है। पुलिस देखती है की कंटेनर के अंदर कुछ लाशे रखी है। जब उन लाशो को गिना जाता है तो वे पूरी 39 लाशें थी जिनमे 38 बालिग़ की  बल्कि एक ना बालिग़ बच्चे की लाश थी।

ये एक AC कंटेनर था और ये कंटेनर पूरी तरह से बंद था । उसका तापमान उस वक्त -25 डिग्री था। अब सवाल ये उठता है-

  1. क्या मौत अंदर ठण्ड की वजह से हुई?
  2. क्या मौत अंदर दम घुटने से हुई?
  3. क्या इनको मार कर इनकी लाशो को अंदर कंटेनर में रखा गया?

लंदन पुलिस इसकी तफ्शीस कर रही थी लेकिन पुलिस को कुछ ऐसा नहीं मिला जिससे पता चले की इस कहानी के पीछे क्या मामला है। अब सबसे बड़ा सबूत जो था वो उस ट्रक का ड्राइवर था। जब उस ड्राइवर को पकड़ा गया और उससे पूछताछ की गयी तो उसने अपना नाम ‘Mo’ Robinson बताया। ‘Mo’ Robinson आयरलैंड का था और यही इस ट्रक को लेकर आ रहा था। जब कंटेनर के अंदर की लाशो को देखा गया तो ऐसा लगा की शायद ये लाशे कंटेनर में 2-3 दिन की रखी हुई है।

अब पूरी जांच की जाती है। जब शुरूआती जाँच की गयी तो पता चला ये ट्रक 22 अक्टूबर को ग्रेस आया था और इसके बाद वहीँ से पुलिस ने लासे बरामंद की। ये ट्रक यहाँ कैसे आया इसके बारे में जब पुलिस ने तफ्शीस की तो वहाँ की सभी CCTV फुटेज देखी गयी मगर इस Truck का सही रुट नहीं मालूम चला। मगर ये पता चला था की ये ट्रक शायद आयरलैंड से गुजरा है और ये बात सामने आई की ये ट्रक बुल्गारिया से होते हुए Grays पहुंचा है। अब बुल्गारिया से ग्रेस कैसे पहुंचा? तो पता चला ये ट्रक बुल्गारिया से फ्रांस पहुंचा और फ्रांस के रास्ते आयरलैंड पहुंचा । आयरलैंड के बाद ये ट्रक लंदन पहुंचा।

छान बीन से पता चला इस ट्रक का रजिस्ट्रेशन नंबर भी बुल्गारिया का है। ये जिसके नाम पर रजिस्टर था वो कंपनी आईरिस कंपनी आयरलैंड की थी। अब सवाल ये थे की ये लाशें बुल्गारिया के लोगो की है? फिर बुल्गारिया के लोग इस कंटेनर में क्या कर रहे है? जब ये बात मीडिया में आई तो बुल्गारिया के अधिकारियो ने टीवी चैनेलो के जरिये बताया की ये ट्रक 2017 में आयरलैंड के लिए बुल्गारिया से बाहर निकला था उसके बाद से ये भी बुल्गारिया वापस नहीं आया।

जब पुलिस ने बुल्गारिया की एम्बेसी में पता किया तो उन्होंने बताया ये जिन लोगो की लाशें मिली है वे बुल्गारिया के नहीं है। तो फिर ये लोग कौन थे? फिलहाल लंदन पुलिस ने लोगो से अपील की है की कोई जो इस कंटेनर के बारे में जानता हो या किसी ने इसे कही और पर देखा हो तो वो पुलिस को खबर कर दे ताकि पुलिस सही जानकारी तलाश कर सके। क्योंकि पुलिस को अगर ट्रक का सही रुट मालूम हो जाये तो वो इस केस की जड़ तक पहुंच सकती है।

जो इस ट्रक का ड्राइवर है पुलिस ने उससे पूछ ताछ की शायद वो कुछ सच बता सके। मगर पुलिस को अभी उससे भी कोई सही जानकारी नहीं मिली। शायद वो भी इस खेल का एक मोहरा हो सकता है।

मगर इसकी एक वजह हो सकती है, मगर इसके बारे में अभी कोई पुख्ता सबूत नहीं आये। वो वजह ये की शायद ये लोग चुपके से ब्रिटैन आ रहे हो। उसकी वजह ये है, 2010 में  डोअर में 58 चीनी नागरिको की लाशें मिली थी और वे सभी टमाटर के ट्रक में छुपकर आ रहे थे चूँकि ट्रक पूरी तरह से बंद था तो उन सभी की दम घुटने से मौत हो गयी थी। मानव तस्कर लोग इनको दूसरे मुल्क में चोरी से शरहद पार करा रहे थे।

इससे भी बड़ा हादसा 2011 में हुआ जब ऑस्ट्रेलिया की एक सड़क पर एक कंटेनर मिला जब पुलिस वहाँ पहुंची तो वहाँ पर 71 लाशे मिली थी। जब उनकी जाँच की गयी तो पता चला उनको भी एक मुल्क से दूसरे मुल्क में चोरी से भेजा जा रहा था और उनकी मौत हो गयी।