दिल्ली पुलिस का एक अफसर किसी केस की तफ्तीश के लिए कश्मीर जाता है। कश्मीर में उसकी बीएसएफ के एक अफसर से मुलाकात होती है। वहां पर उससे दिल्ली के बारे में बातें होती है। आतंकवाद को लेकर वहां पर बातें होती है। इसके बाद एक आतंकवादी जो एनकाउंटर में मारा गया। उसकी डायरी मिलती है। इस डायरी को वह पुलिस अफसर देखता है। इस डायरी को पढता है। बहुत सारी ऐसी डायरी थी। उसकी इन्हीं डायरो में से एक डायरी के आखिरी पन्ने पर एक ईमेल था। दिल्ली पुलिस का वह अफसर उस ईमेल आईडी को लेकर दिल्ली चला आता है। उस ईमेल आईडी के बाद आने वाले दिनों में जो कुछ होता है। पुलिस छानबीन में यह अपने आप में एक मिसाल है। कैसे दिल्ली में एक बड़ा हमला होने से बच गया। यह Delhi Police crack a code & foil terror attack at India Gate की कहानी है।

इस कहानी की जड़ में इंडिया गेट है। इंडिया गेट बहुत खूबसूरत जगह है। कितनी बार हम इंडिया गेट पर गए हैं। अगर आप इंडिया गेट गए हो इंडिया गेट के आसपास काफी सुरक्षा रहती है। मगर पहले ऐसा नहीं था। 2003 से पहले जो इंडिया गेट है। उसके बिल्कुल नीचे तक आप जा सकते थे। इंडिया गेट को हाथ से छू कर भी दे सकते थे। लेकिन इस एक कहानी ने इंडिया गेट की पूरी तस्वीर बदल कर रख दी।

इंडिया गेट को अगर आप करीब से देखें तो तकरीबन 70000 सोल्जर्स के उस पर नाम लिखे हुए हैं। जो अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। यह तकरीबन 1914 से लेकर 1921 तक अंग्रेजो के खिलाफ जंग थी। उन्हीं में शहीद हुए लोगों के नाम यहाँ लिखे हुए हैं। इसीलिए इसको वॉर मेमोरियल कहते हैं। 1921 में इंडिया गेट बनना शुरू हुआ था। 1931 में बन कर तैयार हो चुका था।

दिल्ली पुलिस में एक स्पेशल डिपार्टमेंट है। जिस तरीके से सभी राज्य की पुलिस में अलग स्पेशल सेल होता है। कहीं पर सीआईडी, एटीएस एसटीएफ होता है। मगर दिल्ली पुलिस में एक स्पेशल सेल है। 1986 में स्पेशल सेल को बनाया गया था। उसकी वजह यह थी कि तब कश्मीर में आतंकवाद बढ़ रहा था। दिल्ली में भी खतरा हो सकता है, तो आतंकवाद से निमटने के लिए दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल सेल बनाई गई।

उसी स्पेशल सेल के अफसर की यह कहानी है। इस स्पेशल सेल में एक इंस्पेक्टर प्रदीप कुशवाहा हुआ करते थे। यह बात 2002 की है। जब पार्लियामेंट अटैक हो चुका था। इसका कनेक्शन सीधा कश्मीर से जुड़ा हुआ था।

2002 सर्दियों में स्पेशल टीम के इंस्पेक्टर प्रदीप कुशवाहा किसी केस के बारे में कश्मीर जाते हैं। कश्मीर जाने के बाद वह वहां के तमाम लोकल पुलिस से मिलते हैं। BSF से भी मिलते हैं। इसी दौरान बीएसएफ के एक डिप्टी कमांडर से प्रदीप कुशवाहा की मुलाकात होती है। उस मुलाकात के दौरान जो डिप्टी कमांडर कुछ एनकाउंटर कर चुका था। जब प्रदीप कुशवाहा वहां पहुंचे तो उससे पहले उसने वहां पर एंकाउंटर किए थे। जिसमें दो टेरेरिस्ट मारे गए थे। उसमें से एक टेररिस्ट के पास से कुछ डायरी बरामद हुई थी।

क्योंकि प्रदीप कुशवाह दिल्ली से गए हुए थे। उस डिप्टी कमांडर ने उन डायरी को भी दिखाना शुरू किया। प्रदीप कुशवाहा ने उन डायरियो को ध्यान से देखा। कई ऐसी डायरी थी जिनको प्रदीप कुशवाहा ने पढ़ा।  एक डायरी पर आकर उनकी नजर रुक जाती है। एक डायरी का आखिरी पन्ना था। उस आखिरी पन्ने पर एक ईमेल आईडी थी।

उन्होंने इस ईमेल आईडी को नोट किया। वापस दिल्ली आ गए। उस वक्त स्पेशल सेल के जो Head नीरज कुमार थे। जो बाद में कमिश्नर बने। करीब 2 साल तक यह DCP रहे। वहां से लौटने के बाद प्रदीप कुशवाह उस ईमेल आईडी पर काम करना शुरू कर देते हैं। क्योंकि उन्हें कुछ शक था। जो ईमेल आईडी वह लेकर आए थे। वह ईमेल xxxx@hotmail.com थी।

उस ईमेल आईडी के आईपी के जरिए वह पता लगाने की कोशिश करते हैं। आईपी का सीधा मतलब यह है, कि कहां से मैसेज भेजा गया और कहां भेजा गया। वह उस आईपी ऐड्रेस को ट्रेस करना शुरू कर देते हैं। शुरू में तो ऐसा लगा कि यह सब ऐसे ही है। जब उन्होंने ट्रेस करना शुरू किया। उनको एक अजीब सी चीज पता चली। वह यह पता चला कि इस आईपी एड्रेस को दिल्ली में कोई शख्स किसी अलग-अलग साइबर कैफे से इस्तेमाल कर रहा है। जब उन्होंने इस साइबर कैफे के बारे में पता करना शुरू किया।

पहला जो पता चला कि इस ईमेल से एक मेल किया गया है। जो पहाड़गंज से किया गया है। 3 फरवरी को दूसरा मेल किया गया। वह दरियागंज के एक कैफे से किया गया। इसके ठीक 3 दिन बाद 7 फरवरी को तीसरा मेल किया गया। यह मोती बाग से किया गया था। फिर एक-दो दिन बाद ऐसे ही मेल आए। वह जो कुछ भी कर रहा था। वह सब सेंट्रल दिल्ली लोकेशन के थे।

प्रदीप कुशवाहा यह सब जानकारी अपने सर को देते हैं। उनको भी इस बारे में शक हो जाता है। इसके बाद दिल्ली के स्पेशल सेल ने सीरियस लेकर इसकी जांच करना शुरू कर दी। अब धीरे-धीरे यह पता चला कि कि जो भी यह मेल कर रहा है। वह एक कैफे में सिर्फ एक बार ही जाता है। तमाम कैफे का दौरा किया गया।  2002 में सीसीटीवी कैमरे का इतना दौर नहीं था। तो कोई खास कामयाबी नहीं मिली। मगर इससे एक चीज तो पता चल गई थी, कि कुछ ना कुछ तो गड़बड़ है।

उस मेल को पढ़ने के बाद तो ऐसा लग रहा था। जैसे कोई अपनी गर्लफ्रेंड से बात कर रहा है। क्योंकि इसमें ऐसे ही मैसेज लिखे हुए थे। मगर एक मेल आया। जिसमें लिखा हुआ था।

इसमें एक मैच के बारे में लिखा हुआ था। क्या आपके पास फुटबॉल है? इस फुटबॉल का क्या करना है? आप बेहतर जानते हो और मैच की तारीख आपको जल्दी बता देंगे। यह मेल उसमें लिखा हुआ था। इसके बाद फिर एक मेल आता है। आपकी जिम्मेदारी है। मैच की तारीख फिक्स होने तक खिलाड़ियों का ध्यान रखना। आपके जिममें है, कि कोई बात होगी तो क्या करना है। आप अच्छी तरह जानते हैं।

इसके बाद फिर एक मेल आता है। मैच की तारीख तय हो गई है। वर्ल्ड कप का फाइनल 25 को तय हुआ है। टाइम वही है। बेस्ट ऑफ लक।इस सब में चाचू नाम का एक शब्द बार-बार लिखा हुआ रहा था। जब उसको डिकोड करने की कोशिश की गई। पता चला यह चाचू  कोई और नहीं बल्कि जकी उर रहमान लखवी है। जकी उर रहमान लश्कर-ए-तैयबा का मास्टरमाइंड था।

जब पता चला कि यह चाचू जकी उर रहमान लखवी है। टेंशन बढ़ गई। जरूर कुछ गड़बड़ है। यह कुछ प्लान कर रहा है। पुलिस अपनी छानबीन कर रही थी। इसी दौरान एक और मेल आता है। इस बार का मेल स्पेशल सेल का भी दिमाग घुमा कर रख देता है। वह इसलिए इस बार जो पूरा मेल था। वह कोड में था। उसमें कुछ भी नहीं लिखा हुआ था। सिर्फ चित्र बने हुए थे। जैसे:- .0123456789.0123598746.256.364.56 ऐसा करके यह पूरा एक मैसेज था। अब इसमें एक भी अल्फाबेट नहीं था। सिर्फ न्यूमेरिकल ही था।

अब स्पेशल सेल को लगा कि अगर इस कोड को डिकोड न किया गया तो गड़बड़ हो जाएगी। नीरज कुमार कमिश्नर के पास गए। कहा कि एक मैसेज है। जो डिकोड नहीं हो रहा। जो डिकोड करना बहुत जरूरी है। उस वक्त यूएसए में एक मास्टर माइंड थे। जो इस कोड को डिकोड कर सकते थे। इस कोड को यूएस में भेजा गया। उन्होंने वहां से अपने चार्ज बताएं। कितने रुपए लगेंगे एक बिल भेज दिया। यह बिल नीरज कुमार, जो डीसीपी थे। उन्होंने पुलिस कमिश्नर को दिया। वह अच्छा खासा पैसा था। कमिश्नर ने कहा इतनी जल्दी तो Approval नहीं मिल सकता। क्योंकि इसके लिए होम मिनिस्ट्री से भी परमिशन लेनी पड़ेगी। इसमें थोड़ा वक्त भी लगेगा। इतना वक्त नहीं था।

इधर नीरज कुमार अपने तरीके से उसको डिकोड करने में लगे हुए थे। मगर नाकाम रहे। उधर मिनिस्ट्री की तरफ से डॉलर में पैसे देने की मंजूरी नहीं मिली थी।

यह सारी चीजें चल रही थी। अचानक 19 या 20 फरवरी 2003 की बात है। प्रदीप कुशवाहा के दफ्तर में एक दोस्त आता है। जो उनके स्कूल के वक्त का था। वह इधर बेरोजगार था। कोई काम नहीं मिल रहा था।

वह सीधा प्रदीप कुशवाहा से मिलने के लिए पहुंच गया। प्रदीप कुशवाहा उस वक्त काफी परेशान थे। क्योंकि वह इस केस को हैंडल कर रहे थे। इस खतरे का भी अंदाजा था। पता नहीं दिल्ली में क्या होगा। लेकिन यह पता नहीं चल रहा था कि क्या होगा, कब होगा और कहां होगा।क्योंकि एक मैसेज है, उसको डिकोड करना है।

इसी परेशानी के दौरान उनका दोस्त उनके पास दफ्तर पहुंच जाता है। विवेक ठाकुर नाम था। बातचीत के थोड़ी देर बाद विवेक ठाकुर को एहसास हो जाता है। उसका दोस्त परेशान है। वह पूछता है, कि क्या बात है। प्रदीप कुशवाह ने बताया कि ऐसे-ऐसे बात है। प्रदीप कुशवाहा को भी पता था। यह कंप्यूटर का जानकार है। उन्होंने बताया कि एक मैसेज है। जो डिकोड नहीं हो पा रहा। मंत्रालय से इसकी परमिशन नहीं दे रहा कि इसको यूएसए में डिकोड कराया जा सके।

अचानक विवेक ठाकुर कहता है। वह मैसेज क्या है। मुझे दिखाओ मैं कोशिश करता हूं। प्रदीप कुशवाहा कहते हैं, कि यह नहीं हो पाएगा। मैंने पूरी कोशिश कर ली है।

ठाकुर बोलता है। कोई बात नहीं कम से कम एक बार मुझे देकर तो देखो। ठाकुर उसमें लग जाता है। कई घंटे बीत गए। वह बार-बार कहता रहा कि मैं इसको कर दूंगा पर हो नहीं रहा था। इधर नीरज कुमार भी काफी परेशान थे। क्योंकि वक्त बिलकुल नहीं था। वह प्रदीप कुशवाहा से बार-बार पूछ रहे हैं।

इसी उसमें लगभग शाम हो जाती है। प्रदीप कुशवाह ऑफिस से निकल कर बाहर आते हैं। उनको पुलिस मुख्यालय में बुलाया जाता है। जो आईटीओ के पास है। मगर इनका दफ्तर उस वक्त अशोक विहार था।

प्रदीप कुशवाहा ऑफिस से बाहर आते हैं। देखते हैं कि उनका दोस्त अभी बैठा हुआ है। वह उस कोड को हल करने की कोशिश कर रहा है। अब वह से पूछते हैं, कि कुछ हुआ। वह बोला कि हुआ तो नहीं पर इसको मैं कर दूंगा। वह कहते हैं, कि जब तक होना जाए तो मुझे मत बताओ कि कर दूंगा।

प्रदीप कुशवाहा कहते हैं, तुम इसमें कोशिश करो। मैं पुलिस मुख्यालय जा रहा हूं। विवेक ठाकुर कहता है, कि मैं भी साथ चलता हूं। क्योंकि मुझे लगता है, कि मैं 40 से 45 मिनट में इसको हल कर दूंगा। प्रदीपकुशवाहा उसको अपनी गाड़ी में बैठा लेते हैं। ट्राफिक में पहुंचते-पहुंचते पुलिस मुख्यालय आ जाता है। तब तक कुछ नहीं हुआ था। वह दोनों गाड़ी से उतरते हैं। वह तब भी लगा हुआ था। जैसे ही गाड़ी से उतरकर पुलिस मुख्यालय की सीढ़ी पर चढ़ते हैं। विवेक ठाकुर चीखते हुए कहता है। मैंने कर दिया प्रमोद कुशवाहा को यकीन नहीं हुआ था। वह कहते हैं, कि बताओ कि यह क्या है।

वह फिर बताता है। उसने बताया कि यह जो भी नंबर है। यह दरअसल इस तरीके से काम कर रहा है। यह जीरो जो है, उन्होंने अंग्रेजी के ‘A’ के लिए लिया है। 1 जो है, वह ‘B’ के लिए लिया है। 3 जो है, वह ‘C’ के लिए लिया है। इस तरीके से यह ‘J’ तक जाते हैं। जो 9 नंबर थे। जैसे ही ‘K’ आता है। वह फिर से जीरो हो जाता है। फिर जो ‘L’ होगा वह 1 हो जाएगा। जो ‘M’ होगा वह 2 हो जाएगा। इसके बाद जैसे ही ‘U’ आएगा वह जीरो हो जाएगा।

इन शब्द में ऐसा कुछ नहीं था। सिर्फ हर शब्द के बाद एक पॉइंट लगा हुआ था। उसके बाद जब उसने उसको डिकोड किया और अंडर लाइन किया। वह INDIA GATES लिखा हुआ था। शायद उनकी एक स्पेलिंग मिस्टेक थी। वह दरअसल INDIA GATE लिखा हुआ था।

दूसरा जो उभर कर आया। वह 25 फरवरी 2003 आया। इनका जो टारगेट था। वह 25 फरवरी 2003 को इंडिया गेट पर हमला करना था। इंडिया गेट से पार्लियामेंट के दूरी मुश्किल से 2 किलोमीटर होगी।

इसके बाद खुलासा हुआ। प्रदीप कुशवाहा को यकीन हुआ। यही दरअसल इसका कोड था। वह खुशी के मारे भागते हुए नीरज कुमार के पास पहुंचते हैं। नीरज कुमार को बताते हैं, कि इस कोड का डिकोड ये है।

जो बेरोजगार शख्स अपने दोस्त से मिलने के लिए यूं ही आता है। उसने ऐसा काम कर दिया था। जिसके लिए होम मिनिस्ट्री भी तैयार नहीं थी। इसका एक लंबा प्रोसेस था। उसको एक आम इंसान ने हल कर दिया। इस पर नीरज कुमार काफी खुश हुए। यह जानकारी उन्होंने कमिश्नर को दी। यह बात 21 फरवरी की थी। 22 फरवरी को गृह मंत्रालय को पूरी जानकारी दी गई। लालकृष्ण आडवाणी उस वक्त गृहमंत्री थे। शाम को आडवाणी ने एक मीटिंग बुलाई। जिसमें नीरज कुमार को भी बुलाया गया। यह लोग वहां पहुंचे। इन्होंने उस मेल का पूरा चैन उनको बताया। सारी चीजें उनके सामने रखी।

यह बैठक 22 फरवरी की रात तक चली थी। 23 फरवरी की सुबह जब लोग उठकर इंडिया गेट पहुंचे। उन्होंने पहली बार इंडिया गेट का ऐसा नजारा देखा था। वह इसलिए कि 23 की सुबह में ही इंडियन आर्मी को इंडिया गेट के आसपास तैनात कर दिया गया था।

इंडिया गेट के करीब जाने पर आम लोगों को मना ही कर दिया गया था। जैसे ही 23 फरवरी को इंडिया गेट की सुरक्षा बढ़ाई गई। उसके बाद उसी दिन शाम से यह जो ईमेल आईडी प्रदीप कुशवाह कश्मीर से लेकर आए थे। उस शाम के बाद उस ईमेल आईडी पर दोबारा कोई मेल नहीं आया।

इससे यह समझा गया कि इंडिया गेट की सुरक्षा को देखकर आतंकियों को पता चल गया। शायद पुलिस और सरकार को हमले की जानकारी मिल गई है। उन्होंने इस हमले को रद्द कर दिया। इस ईमेल आईडी को भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया। उसके बाद 23 फरवरी के बाद से इस ईमेल आईडी पर कोई भी मेल नहीं आया।

इस तरीके से एक पुलिस अफसर किसी और काम से कश्मीर जाता है। वहां से एक ईमेल लेकर आता है। इस ईमेल पर आए किसी कोड को उसका दोस्त डिकोड कर देता है। दिल्ली में हमला होने से बच जाता है।

“Delhi Police crack a code & foil terror attack at India Gate”

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